21वीं सदी में अमेरिकी साम्राज्यवाद

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कभी-कभी मन किसी खाली कमरे जैसा हो जाता है।
खिड़कियां खुली हैं, रोशनी भी है, पर भीतर न कोई रौशनी न कोई आवाज।
ऐसे क्षणों में हम घबरा जाते हैं—
“आज कुछ लिख नहीं पा रहा हूं”,
“आज सोच क्यों नहीं पा रहा ?”
पर सच यह है कि
विचारों का न आना भी मन की एक स्थिति है, असफलता नहीं।
हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वहां उत्पादक बने रहना एक दबाव बन चुका है।
हर दिन कुछ कहना है, कुछ सोचना है, कुछ साबित करना है।
लेकिन मन कोई मशीन नहीं है—
वह मौसम की तरह है।
कभी बसंत, कभी शीत, और कभी गहरी धुंध।
आज आपके मन में धुंध है।
यह धुंध बुरी नहीं है।
बिहार की सर्द सुबहों की तरह—
जब कुछ दिखता नहीं,
पर सब कुछ मौजूद होता है।
ऐसे समय में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि
हम खुद से नाराज हो जाते हैं।
हम अपने ही भीतर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
जबकि यह समय विराम का होता है,
पराजय का नहीं।
इतिहास गवाह है—
सबसे गहरे विचार
अक्सर चुप्पी से जन्म लेते हैं।
गौतम बुद्ध ने ज्ञान
किसी शोर में नहीं पाया।
कबीर ने साखियां
भीड़ में नहीं रचीं।
प्रेमचंद ने पात्र
तब गढ़े जब वे भीतर बहुत कुछ सह रहे थे।
आज आप भी कुछ सह रहे हैं—
एक खालीपन।
और खालीपन कभी व्यर्थ नहीं होता।
खाली कटोरा ही
पानी से भरता है।
आज अगर आप कुछ नहीं पूछ रहे,
तो यह भी एक प्रश्न है—
जो शब्दों में नहीं,
अनुभव में पूछा जा रहा है।
इस अवस्था में
कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती।
बस रहने की।
न लिखना भी लिखने की तैयारी है।
न सोचना भी सोच का बीज है।
आज का दिन कोई मांग नहीं करता आपसे।
वह बस कहता है—
“थोड़ी देर खुद के साथ बैठो।”
मोबाइल बंद करिए,
खिड़की से बाहर देखिए,
या बस चाय का कप पकड़ कर
खामोशी को महसूस कीजिए।
कल जब विचार आयेंगे,
वे और भी ईमानदार होंगे,
क्योंकि वे
इस मौन से होकर आए होंगे।
आज अगर आपने कुछ नहीं मांगा,
तो भी आपने समय बर्बाद नहीं किया।
आपने मन को सांस लेने दी।
और यह
आज के दौर में
सबसे रचनात्मक काम है।

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