पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: शहर में संघर्ष और गांव से जुड़ाव
रमेश ठाकुर पिछले तीस वर्षों से पटना में रह रहा है। किशोर उम्र में काम की तलाश में वह पटना आया और यहीं का हो गया। मूल रूप से वह सीतामढ़ी जिले के चोटही गाँव का रहने वाला है। जाति से नाई, और पेशे से अपनी मेहनत पर खड़ा एक साधारण मजदूर-वर्ग का व्यक्ति। पटना में वह स्वतंत्र रूप से एक छोटे से डेरे में रहता है, जिसका किराया ढाई हजार रुपये है। कमरा छोटा है और बाथरूम सामूहिक—लेकिन यही उसके लिए शहर में जीने की जगह है।
- पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: शहर में संघर्ष और गांव से जुड़ाव
- पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: वोट देने के लिए संघर्ष और रेल की देरी
- पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: गाँव चोटही की जातीय संरचना और सामाजिक तस्वीर
- पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: रीगा सीट का चुनाव और जाति आधारित वोटिंग पैटर्न
- पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: लालू यादव को लेकर बदला गाँव का नजरिया
दिन का भोजन वह किसी ढाबे या रेस्तरां में कर लेता है, जबकि रात का खाना स्वयं पकाता है। अपनी कमाई में से एक बड़ा हिस्सा वह नियमित रूप से गाँव भेजता है, ताकि बच्चों की पढ़ाई चल सके। परिवार को पटना में रखने लायक कमाई उसके पास नहीं, इसलिए वह अकेले रहकर अपनी जिम्मेदारियों को निभा रहा है। उसके अनुसार, गाँव में कुछ सरकारी सुविधाएँ जरूर मिलती हैं, लेकिन परिवार की बड़ी जिम्मेदारी वही उठाता है।
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पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: वोट देने के लिए संघर्ष और रेल की देरी
11 नवंबर को उसके गाँव में मतदान था। उसका गाँव सीतामढ़ी जिले के रीगा विधानसभा क्षेत्र में आता है। उसने पहले से तय कर लिया था कि चाहे जितनी मुश्किल हो, वोट देकर ही लौटेगा। बस से जाने में 70 रुपये, लेकिन रेल से केवल 40 रुपये लगते—और यह 30 रुपये का फर्क उसके लिए मायने रखता था। इसलिए उसने रेल को चुना।
लेकिन रेल ने धोखा दे दिया—बहुत देर से चली। गाँव पहुँचते-पहुँचते शाम के पाँच बज चुके थे। वह सीधे मतदान केंद्र की ओर भागा। सौभाग्य से वोटरों की लाइन अभी भी लगी हुई थी। उसकी पत्नी पहले ही उसकी पर्ची लेकर बूथ पर खड़ी थी। अंततः रमेश ने राहत की सांस ली और मतदान कर दिया।
पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: गाँव चोटही की जातीय संरचना और सामाजिक तस्वीर
चोटही गाँव बिल्कुल भारत के उन आम गाँवों जैसा है, जहाँ जातीय संरचना सामाजिक माहौल का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यह इलाका नेपाल की सीमा से लगा है। गाँव में ऊँची कही जाने वाली किसी भी जाति का एक भी घर नहीं है। कभी पाँच मुस्लिम परिवार थे, लेकिन वे बाद में अन्य मुस्लिम-बहुल गाँव में चले गए, अब कोई मुस्लिम नहीं बचा।
गाँव में सबसे अधिक यादव रहते हैं। दलित समुदाय में केवल चमार जाति मौजूद है। ठाकुर की नाई जाति के केवल चार घर हैं। सबसे प्रभावशाली और सम्पन्न समुदाय सूढ़ी हैं—जमीन और समृद्धि दोनों उन्हीं के पास ज्यादा हैं। गाँव के सबसे अधिक जोत वाले परिवार के पास तीस बीघे जमीन है, और वह सूढ़ी समुदाय का है। यादवों में अधिकांश के पास एक बीघा से भी कम जमीन है, किसी भी यादव के पास पाँच बीघे से ज्यादा नहीं।
सूढ़ी लोग पढ़ाई पर पैसा खर्च करते हैं। बच्चे बाहर पढ़ने भी जाते हैं। नाई, लोहार और कुर्मी जाति भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चों को शिक्षित करते हैं। लेकिन यादवों के बारे में ठाकुर का मानना है कि वे जमीन खरीदने पर ज्यादा ध्यान देते हैं, पढ़ाई पर कम।
व्यवहार में सभी जातियों के बीच मेल-जोल है, लेकिन वोट के समय मतभेद खुलकर सामने आते हैं—और इस बार कुछ ज्यादा ही आए।
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पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: रीगा सीट का चुनाव और जाति आधारित वोटिंग पैटर्न
रीगा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के बैद्यनाथ प्रसाद (सूढ़ी जाति) उम्मीदवार थे। कांग्रेस के उम्मीदवार टुन्ना सिंह ऊँची जाति से थे। यादव पुरुषों का पूरा वोट कांग्रेस के पक्ष में गया, लेकिन महिलाओं का वोट बँट गया। कुछ यादव महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया, क्योंकि उनके अनुसार भाजपा सरकार ने उनकी मदद की है।
गाँव में लोग नीतीश कुमार को भाजपा का हिस्सा ही समझते हैं।
लोग कहते हैं:
“नीतीश बाबू मोदी के हनुमान हैं।”
“ऊपर मोदी, नीचे नीतीश—राम-घनश्याम की जोड़ी है।”
ठाकुर के अनुसार इस बार “नौ जातियों” ने भाजपा को वोट दिया—यह संख्या प्रतीकात्मक थी। मुसलमान और यादवों का वोट कांग्रेस की ओर गया।
पटना में रमेश ठाकुर की कहानी: लालू यादव को लेकर बदला गाँव का नजरिया
पहले पूरा गाँव लालू यादव को वोट देता था। लेकिन ठाकुर के अनुसार अब हालात बदल गए। उसने कहा:
“पहले लालू भी गरीब थे और हम भी। अब लालू गरीब नहीं हैं।
पहले सबके नेता थे, अब केवल यादवों के नेता हैं।”
ठाकुर का मानना है कि लालू यादव का राजनीति में प्रभाव अब खत्म हो चुका है:
“लालू का दीया बुता गया सरजी। अब हमेशा के लिए खत्म।”
लालू यादव के स्वास्थ्य पर भी उसने चिंता जताई और कहा कि उन्हें अब आराम करना चाहिए।
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