New Year: नई उड़ान या वही अधूरी ज़िम्मेदारियाँ? 2026 के रन-वे पर भारत का आत्ममंथन

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विकास की उड़ान के साथ सामाजिक जिम्मेदारी की जरूरत
Highlights
  • • 2026 के संदर्भ में विकास बनाम ज़मीनी हकीकत • बेरोजगारी और आर्थिक गैर-बराबरी पर सवाल • महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी • गिग वर्कर्स व छोटे कारोबारियों की चुनौतियां • पर्यावरण और विकास का टकराव

बीती रात देशभर में जश्न का माहौल था। होटलों, मॉलों और क्लबों में लोग नए साल का स्वागत करने के लिए उमड़े पड़े थे। रोशनी, संगीत और उत्सव के शोर में एक और भारत भी था—जो सड़कों, फुटपाथों और रैन बसेरों में ठिठुरती रात काट रहा था। यह वही भारत है, जो विकास की चमक में अक्सर ओझल हो जाता है। हम 2026 के रन-वे पर उतरने के लिए उड़ान भर चुके हैं, लेकिन सवाल यही है—क्या हमने अपने कर्तव्यों की पेटी सच में बांधी है?

New Year: विकास की ऊंची उड़ान और ज़मीन का स्याह सच

बीते वर्षों में सरकारों ने विकास की उजली तस्वीर पेश की है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सकल घरेलू उत्पाद की दर उत्साहजनक बताई जा रही है और भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की बातें हो रही हैं।

लेकिन ऊंची उड़ान के दौरान नीचे की ज़मीन को देखना भी उतना ही जरूरी है। बेरोजगारी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। आर्थिक गैर-बराबरी बढ़ती दिख रही है, जहां अमीर और अमीर होता जा रहा है, वहीं गरीब और अधिक संघर्षशील होता जा रहा है। विकास के आंकड़े मजबूत हैं, मगर समाज का बड़ा वर्ग आज भी बुनियादी ज़रूरतों के लिए जूझ रहा है।

New Year: सांप्रदायिकता, लोकतंत्र और नागरिक जिम्मेदारी

बीते वर्ष में सांप्रदायिकता ने समय-समय पर सिर उठाया। लोकतंत्र की असली परीक्षा केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों के संतुलन से होती है। सवाल यह है कि क्या हम एक नागरिक के रूप में अन्याय के खिलाफ खड़े हुए? क्या प्रभावशाली लोगों को कठघरे में लाने के लिए पीड़ितों के साथ मजबूती से खड़े रहे?

लोकतांत्रिक मर्यादाएं तभी मजबूत होती हैं जब सरकार और समाज दोनों अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों को समझें। लोकतंत्र केवल सत्ता का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जवाबदेही का भी नाम है।

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New Year, महिलाओं की सुरक्षा: अब भी अनसुलझा सवाल

New Year: नई उड़ान या वही अधूरी ज़िम्मेदारियाँ? 2026 के रन-वे पर भारत का आत्ममंथन 1

यह एक कड़वी सच्चाई है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई है। यौन हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आती रहीं। कुछ मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिनमें न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही राहत मिली।

यह स्थिति केवल कानून व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी आईना है। क्या हम एक समाज के रूप में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को लेकर सच में संवेदनशील हो पाए हैं? या फिर हम केवल खबरों तक सीमित रह जाते हैं?

New Year: गिग वर्कर्स और छोटे कारोबारियों की अनसुनी पीड़ा

हाल के दिनों में संसद में गिग-वर्कर्स का मुद्दा उठा। ये वे लोग हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर ग्राहकों तक सेवाएं पहुंचाते हैं। तकनीकी कारणों से थोड़ी देरी होने पर उन्हें कंपनियों के दबाव और ग्राहकों के गुस्से—दोनों का सामना करना पड़ता है।

हालांकि सरकार ने वेतन, सेवा शर्तों और चिकित्सा सुविधा को लेकर कदम उठाए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनके अधिकार अब भी अधूरे हैं। दूसरी ओर, छोटे दुकानदार ऑनलाइन कारोबार और मॉल संस्कृति के आगे संघर्ष कर रहे हैं। आर्थिक विकास की दौड़ में ये वर्ग पीछे छूटता जा रहा है।

New Year: भ्रष्टाचार, शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष संतुलन

भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख और प्रशासनिक अनुशासन सकारात्मक संकेत हैं। शिक्षा नीतियों में बदलाव भी भविष्य की दिशा तय करते हैं। पाठ्यक्रमों में इतिहास और संस्कृति को लेकर किए गए संशोधन तभी सार्थक होंगे, जब वे समावेशी और संतुलित दृष्टिकोण के साथ लागू हों।

धर्मनिरपेक्ष ढांचे की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि किसी भी समुदाय को सांप्रदायिक उफान की कीमत न चुकानी पड़े।

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New Year: पर्यावरण, प्रदूषण और विकास का विरोधाभास

देश की राजधानी समेत कई शहरों में प्रदूषण जानलेवा स्तर पर पहुंच चुका है। वायु और जल की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। गुरु नानक देव जी का संदेश—‘पवन गुरु, पाणी पिता, माता धरति महतु’—आज पहले से ज्यादा प्रासंगिक है।

विकास का अर्थ केवल आंकड़े नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, साफ पानी और सुरक्षित भविष्य भी है। अगर पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है, तो विकास की सारी उड़ानें अर्थहीन हो जाएंगी।

New Year: 2026 का संकल्प: समावेशी विकास की ज़रूरत

नए साल में देश को सरकार और समाज—दोनों के साझे प्रयासों की जरूरत है। तरक्की की चमक के साथ-साथ उन चेहरों को भी देखना होगा जो इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं। बेरोजगार, गरीब और वंचित वर्ग की तस्वीर को विकास की कहानी का हिस्सा बनाना ही सच्ची प्रगति होगी।

नव वर्ष के साथ हमें केवल संकल्प नहीं, बल्कि दायित्वबोध की भी अंगड़ाई लेनी होगी। हम कर्तव्य पथ पर उतर चुके हैं—अब यह हम पर है कि यह उड़ान सही दिशा में जाती है या नहीं।

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