उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची ने राजनीतिक गलियारों में हलचल जरूर पैदा की है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह हलचल किसी सच्चाई के सामने आने से है या फिर चुनावी बेचैनी की उपज है। आंकड़ों को ध्यान से देखा जाए तो यह साफ होता है कि यह कवायद अचानक नहीं, बल्कि मतदाता सूची को शुद्ध और भरोसेमंद बनाने की एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है।
- UP SIR Draft Voter List Analysis: कितने नाम कटे और क्यों
- UP SIR Draft Voter List और सबसे ज्यादा वोट कटने वाले जिले
- UP SIR Draft Voter List Controversy: बंगाल में क्यों बढ़ा विवाद
- UP SIR Draft Voter List और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी
- UP SIR Draft Voter List और पारदर्शिता की प्रक्रिया
- UP SIR Draft Voter List: लोकतंत्र के लिए क्यों जरूरी है यह प्रक्रिया
UP SIR Draft Voter List Analysis: कितने नाम कटे और क्यों
विशेष गहन पुनरीक्षण से पहले उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 15 करोड़ 44 लाख थी। पुनरीक्षण के दौरान 2 करोड़ 89 लाख नाम सूची से हटाए गए। इसके बाद राज्य में कुल मतदाता संख्या घटकर लगभग 12 करोड़ 55 लाख रह गई।
कटे हुए नामों के पीछे जो कारण सामने आए, वे चौंकाने के साथ-साथ व्यवस्था की कमजोरी भी उजागर करते हैं। करीब 46 लाख से अधिक ऐसे मतदाता पाए गए, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी लेकिन नाम अब तक सूची में दर्ज थे। इसके अलावा 2 करोड़ 17 लाख से ज्यादा मतदाता ऐसे थे, जो स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर शिफ्ट हो चुके हैं। वहीं 25 लाख से अधिक नाम ऐसे निकले, जो एक ही व्यक्ति के एक से ज्यादा जगह दर्ज होने के कारण डुप्लीकेट पाए गए।
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UP SIR Draft Voter List और सबसे ज्यादा वोट कटने वाले जिले
ड्राफ्ट सूची के आंकड़ों में जिलेवार अंतर भी साफ दिखाई देता है। राजधानी लखनऊ में करीब 30 प्रतिशत नाम कटे। गाजियाबाद में यह आंकड़ा लगभग 28 प्रतिशत तक पहुंच गया। बलरामपुर में 26 प्रतिशत, कानपुर शहर और मेरठ में 25 प्रतिशत से अधिक नाम सूची से हटाए गए।
प्रयागराज में 24 प्रतिशत से ज्यादा, गौतम बुद्ध नगर और आगरा में करीब 23 प्रतिशत नाम कटे। शाहजहांपुर में भी 21 प्रतिशत से अधिक नाम हटाए गए हैं। इन आंकड़ों ने यह संकेत दिया है कि शहरी इलाकों में स्थानांतरण और डुप्लीकेट नामों की समस्या ज्यादा गंभीर रही है।
UP SIR Draft Voter List Controversy: बंगाल में क्यों बढ़ा विवाद
एसआईआर को लेकर विवाद सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहा। जिन राज्यों में दूसरे चरण में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हुई, वहां भी असंतोष की आवाजें उठने लगीं। खासकर पश्चिम बंगाल में इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग ले लिया है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुनरीक्षण में इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर और डेटा मैपिंग पर सवाल उठाए हैं। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि कई ऐसे मतदाताओं के नाम गायब हैं, जो पात्र हैं और जिनका अस्तित्व वास्तविक है। इस पर चुनाव आयोग का कहना है कि हर नाम हटाने के पीछे तय प्रक्रिया और दस्तावेजी आधार मौजूद है।
UP SIR Draft Voter List और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी
चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि ड्राफ्ट सूची अंतिम नहीं है। यह एक मसौदा है, जिस पर 6 फरवरी तक दावा और आपत्ति दर्ज की जा सकती है। जिन मतदाताओं के नाम सूची में नहीं हैं, उन्हें अपना मताधिकार वापस पाने का पूरा अवसर दिया जा रहा है।
यहां राजनीतिक दलों की भूमिका भी अहम हो जाती है। दावा-आपत्ति दाखिल कराने, नामों की जांच कराने और मतदाताओं को जागरूक करने की जिम्मेदारी केवल आयोग की नहीं, बल्कि पार्टियों की भी है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस बात पर सवाल उठा चुका है कि जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों की सक्रियता क्यों कम होती जा रही है।
UP SIR Draft Voter List और पारदर्शिता की प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों को हर स्तर पर शामिल किया गया। प्रदेशभर में 5.76 लाख से अधिक बूथ लेवल एजेंटों ने सत्यापन प्रक्रिया में भाग लिया। इसके अलावा 1,546 से ज्यादा बैठकों के जरिए दलों को हर चरण की जानकारी दी गई।
आयोग का साफ कहना है कि बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी भी मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जाएगा। अंतिम सूची तैयार करने से पहले हर आपत्ति और दावे की जांच की जाएगी।
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UP SIR Draft Voter List: लोकतंत्र के लिए क्यों जरूरी है यह प्रक्रिया
मतदाता सूची का शुद्धिकरण किसी एक चुनाव या एक राज्य तक सीमित मुद्दा नहीं है। यह हर लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होती है। यदि मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नाम सूची में बने रहें, तो चुनाव की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होना तय है।
सबसे अहम बात यह है कि यह अंतिम सूची नहीं है। यह केवल ड्राफ्ट है। अब यह चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और जनता—तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से पूरी हो, ताकि चुनावी भरोसा कमजोर न पड़े और लोकतंत्र मजबूत बना रहे।
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