Nitish Kumar Bharat Ratna: भारत रत्न नीतीश कुमार! मांझी के समर्थन से बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश

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नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग पर मांझी का समर्थन
Highlights
  • • नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग तेज • केसी त्यागी के पत्र के बाद मांझी का खुला समर्थन • बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा संदेश • सामाजिक न्याय और सुशासन की विरासत पर चर्चा

Nitish Kumar Bharat Ratna की मांग पर मांझी का बड़ा बयान

नीतीश कुमार को भारत रत्न दिए जाने की मांग एक बार फिर बिहार और देश की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गई है। जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी की पहल के बाद अब केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने खुलकर समर्थन दिया है। मांझी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बिहार की राजनीति में गठबंधन, नेतृत्व और विरासत को लेकर बहस तेज है।

मांझी ने सोशल मीडिया पर लिखे अपने संदेश में कहा कि “भारत रत्न नीतीश कुमार जी… ये शब्द सुनने में कितना अच्छा लगेगा।” उनका यह बयान न सिर्फ समर्थन का संकेत है, बल्कि एनडीए के भीतर नीतीश कुमार की स्वीकार्यता और राजनीतिक कद को भी दर्शाता है।

Nitish Kumar Bharat Ratna को लेकर केसी त्यागी का पत्र और ऐतिहासिक संदर्भ

औपचारिक मांग 8 जनवरी 2026 को सामने आई, जब जदयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा। इस पत्र में त्यागी ने 30 मार्च 2024 का उल्लेख किया, जब केंद्र सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किया था।

त्यागी ने पत्र में लिखा कि जिस तरह चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर ने किसानों, वंचितों और पिछड़े वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष किया, उसी परंपरा को नीतीश कुमार आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने नीतीश कुमार को “समाजवादी आंदोलन का बचा हुआ अनमोल रत्न” बताते हुए कहा कि उनका योगदान केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय और सुशासन की मिसाल है।

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Nitish Kumar Bharat Ratna पर मांझी का समर्थन क्यों है अहम

Nitish Kumar Bharat Ratna: भारत रत्न नीतीश कुमार! मांझी के समर्थन से बिहार की राजनीति में बड़ा संदेश 1

जीतन राम मांझी का समर्थन इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि वे बिहार की राजनीति के सबसे वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। मांझी स्वयं बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और बाद में जदयू से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। बावजूद इसके, वे आज भी एनडीए का हिस्सा हैं और उनकी पार्टी के मंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हैं।

ऐसे राजनीतिक इतिहास के बावजूद मांझी का खुला समर्थन यह संकेत देता है कि नीतीश कुमार की प्रशासनिक और सामाजिक भूमिका को दलगत सीमाओं से ऊपर स्वीकार किया जा रहा है। यह समर्थन केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

Nitish Kumar Bharat Ratna और जीवित रहते सम्मान की बहस

केसी त्यागी ने अपने पत्र में इस तर्क को भी मजबूती से रखा कि भारत रत्न केवल मरणोपरांत दिया जाना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब जीवित रहते हुए भी महान नेताओं को यह सम्मान मिला है।

यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नीतीश कुमार का राजनीतिक और प्रशासनिक योगदान अभी भी जारी है। बिहार में सड़क, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पंचायत व्यवस्था और सामाजिक संतुलन जैसे क्षेत्रों में उनके कार्यों का प्रभाव लंबे समय तक देखा जाएगा।

Nitish Kumar Bharat Ratna से जुड़ा राजनीतिक संदेश

इसका असर केवल सम्मान तक सीमित नहीं रहेगा। यह बिहार की राजनीति में एक नई धुरी तय कर सकता है। यह संदेश जाएगा कि सामाजिक न्याय, सुशासन और संतुलित राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है।

साथ ही यह भी माना जा रहा है कि इस मांग से एनडीए और जदयू के रिश्तों में नई ऊर्जा आएगी। मांझी का समर्थन इस दिशा में पहला संकेत माना जा रहा है।

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Nitish Kumar Bharat Ratna: सम्मान से आगे विरासत की लड़ाई

नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग सिर्फ एक सम्मान की बात नहीं है, बल्कि यह उनकी राजनीतिक विरासत को स्थायी रूप देने का प्रयास भी है। बिहार की राजनीति में जहां अक्सर तात्कालिक लाभ हावी रहते हैं, वहीं नीतीश कुमार की छवि एक दीर्घकालिक सोच वाले नेता की रही है।

इस बात को भी रेखांकित करती है कि आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि विरासत और योगदान के मूल्यांकन की दिशा में भी बढ़ सकती है।

कुल मिलाकर, जीतन राम मांझी का समर्थन यह दर्शाता है कि नीतीश कुमार का कद सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहा। यह मांग सामाजिक न्याय, सुशासन और राजनीतिक संतुलन की उस विरासत को रेखांकित करती है, जिसे नीतीश कुमार ने दशकों में गढ़ा है। अब निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं।

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