भारत के इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्वों की असमय मृत्यु को लेकर आज भी प्रश्नचिह्न लगे हुए हैं। इन मौतों के कारणों को लेकर न तो ठोस निष्कर्ष सामने आए और न ही संतोषजनक जांच हुई। लेकिन जब बात देश के प्रधानमंत्री की हो, तब सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं। लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में हुई मृत्यु केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और प्रशासनिक पारदर्शिता की भी परीक्षा थी।
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: ताशकंद की रात और उठते सवाल
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: कमरे की व्यवस्था और पोस्टमार्टम पर सवाल
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: गायब दस्तावेज़ और संदिग्ध मौतें
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: परिवार और करीबी नेताओं की आशंकाएँ
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खुफिया एजेंसियाँ
- Lal Bahadur Shastri Death Mystery: जांच का अभाव और लोकतंत्र पर प्रश्न
यह संयोग नहीं कि शास्त्री जी की मृत्यु के साथ नेताजी सुभाषचंद्र बोस, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय और ललित नारायण मिश्र जैसे नाम स्वतः स्मृति में उभर आते हैं। इन सभी मामलों में एक समानता है—असामान्य परिस्थितियाँ और अधूरी जांच।
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: ताशकंद की रात और उठते सवाल
शास्त्री जी की मृत्यु को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि उनके निधन का स्पष्ट और प्रमाणिक कारण आज तक सामने क्यों नहीं आया। जबकि उनके साथ निजी चिकित्सक मौजूद थे, फिर भी कोई मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। यह तथ्य अपने आप में असहज करने वाला है।
ताशकंद यात्रा में भारत सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री भी मौजूद थे, इसके बावजूद रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया। यदि मृत्यु स्वाभाविक थी, तो उसे प्रमाणित करने में इतनी हिचक क्यों दिखाई गई—यह प्रश्न लगातार उठता रहा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सोने से पहले उन्हें एक गिलास दूध दिया गया था। दूध पीने के तुरंत बाद उनके सीने में तेज दर्द हुआ, सांस लेने में कठिनाई हुई और वे कोमा में चले गए। इसके बावजूद उस व्यक्ति से पूछताछ तक नहीं की गई जिसने दूध दिया था। बाद में उसका पाकिस्तान चले जाना और भारत सरकार द्वारा उसकी पेंशन का भुगतान जारी रहना, संदेह को और गहरा करता है।
यह भी पढ़े : https://livebihar.com/swami-vivekananda-nationalism-vedanta-india/
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: कमरे की व्यवस्था और पोस्टमार्टम पर सवाल

जिस कमरे में शास्त्री जी को ठहराया गया था, वहां न तो कॉल बेल थी और न ही नजदीक कोई टेलीफोन कनेक्शन। यह व्यवस्था एक प्रधानमंत्री के लिए असामान्य मानी जाती है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिनिधिमंडल और प्रधानमंत्री को अलग-अलग स्थानों पर ठहराया जाना भी सवाल खड़े करता है।
ताशकंद में पोस्टमार्टम न कराने की सलाह किसने दी—यह आज भी रहस्य है। मृत्यु के बाद उनका शरीर नीला पड़ जाना, किसी सामान्य हार्ट अटैक की धारणा को कमजोर करता है। इसके बावजूद न तो तत्काल जांच हुई और न ही बाद में किसी स्वतंत्र आयोग का गठन किया गया।
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: गायब दस्तावेज़ और संदिग्ध मौतें
शास्त्री जी के निजी सामान—थर्मस, लाल डायरी और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुएँ—परिवार को कभी नहीं मिलीं। उनके पुत्र अनिल शास्त्री के अनुसार, लाल डायरी हमेशा उनके पिता के पास रहती थी और उसमें महत्वपूर्ण बातें दर्ज होती थीं। उसका गायब होना संयोग नहीं माना जा सकता।
इतना ही नहीं, शास्त्री जी के विश्वस्त नौकर की बाद में एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उनके निजी डॉक्टर आर. एन. चुग की भी सड़क दुर्घटना में जान चली गई। इन घटनाओं ने संदेह की परतों को और मोटा किया।
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: परिवार और करीबी नेताओं की आशंकाएँ
भारत सरकार और सोवियत सरकार द्वारा दिए गए कुछ स्पष्टीकरणों से शास्त्री जी का परिवार संतुष्ट नहीं हुआ। उनके करीबी मित्र और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह ने भी स्पष्ट कहा था कि शास्त्री जी की मृत्यु सामान्य नहीं थी और इसकी जांच होनी चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश कुमार सिंह ने 2015 में प्रकाशित लेख में अनिल शास्त्री के हवाले से कई गंभीर आरोपों का उल्लेख किया। लोकसभा में निर्दलीय सांसद धर्मेश देव द्वारा लगाए गए आरोपों ने इस मामले को और विवादास्पद बना दिया।
Do Follow us. : https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खुफिया एजेंसियाँ
आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी बिशन टंडन द्वारा लिखी पुस्तकों में यह उल्लेख मिलता है कि विदेशी खुफिया एजेंसियाँ भारत में सक्रिय थीं। इंदिरा गांधी द्वारा उच्च अधिकारियों की बैठक में दिए गए बयान और बाद में सार्वजनिक हुई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है।
1985 में गोपनीयता से मुक्त हुई रिपोर्टों और 1967 की आंतरिक जांच से यह संकेत मिलता है कि भारत की राजनीति विदेशी प्रभाव से अछूती नहीं थी। इन तथ्यों ने शास्त्री जी की मृत्यु को लेकर उठने वाले संदेहों को ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान किया।
Lal Bahadur Shastri Death Mystery: जांच का अभाव और लोकतंत्र पर प्रश्न
इतने वर्षों बाद भी इस मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच न होना, भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर प्रश्न है। यदि देश के प्रधानमंत्री की मृत्यु के कारणों को स्पष्ट नहीं किया जा सका, तो आम नागरिक किससे न्याय की उम्मीद करे?
शास्त्री जी जैसे ईमानदार, सादगीपूर्ण और राष्ट्रनिष्ठ नेता यदि पूरा जीवन जीते, तो संभव है कि भारत की राजनीतिक दिशा कुछ और होती। उनकी मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक संभावना की मृत्यु थी।
Do Follow us. : https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

