हिंदी के संदर्भ में जब राजभाषा और राष्ट्रभाषा जैसे शब्द सामने आते हैं, तो यह फर्क केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भावनात्मक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर तक फैल जाता है। भारत में हिंदी को लेकर एक बड़ा वर्ग आज भी इसे राष्ट्रभाषा मानता है, जबकि संवैधानिक रूप से यह राजभाषा है। यही कारण है कि हर साल सितंबर के आते ही सरकारी दफ्तरों में राजभाषा पखवाड़ा या राजभाषा माह को लेकर विशेष गतिविधियां शुरू हो जाती हैं।
इसी सितंबर महीने में अब पड़ोसी देश चीन भी अपनी भाषा को लेकर एक बड़ा कदम उठाता नजर आ रहा है, लेकिन दोनों देशों के भाषायी उत्साह और दिशा में बुनियादी फर्क साफ दिखाई देता है।
- Hindi Language Debate: भारत में हिंदी की स्थिति और सितंबर का भाषायी उत्साह
- Hindi Language Debate: चीन का कदम,मंदारिन को राष्ट्रभाषा के रूप में और मजबूत करने की तैयारी
- Hindi Language Debate: आर्थिक उदारीकरण और भाषा,भारत-चीन का अलग रास्ता
- Hindi Language Debate: आंकड़े जो चीन की भाषायी मजबूती दिखाते हैं
- Hindi Language Debate: चिंता और विरोध,अल्पसंख्यक भाषाओं का सवाल
- Hindi Language Debate: भारत के लिए संकेत और भविष्य की उम्मीद
Hindi Language Debate: भारत में हिंदी की स्थिति और सितंबर का भाषायी उत्साह
भारत में सितंबर का महीना हिंदी के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखता है। इस दौरान सरकारी संस्थानों में हिंदी कार्यशालाएं, प्रतियोगिताएं और पुरस्कार समारोह आयोजित किए जाते हैं। लेकिन इन आयोजनों के पीछे एक अधूरी आकांक्षा भी छिपी रहती है—हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने की।
हालांकि समय के साथ यह मांग कमजोर होती नजर आ रही है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो हिंदी की तुलना में अंग्रेजी को ज्यादा व्यावहारिक और अवसर देने वाली भाषा मानता है। शिक्षा, नौकरी और तकनीक के क्षेत्र में अंग्रेजी की बढ़ती पकड़ ने हिंदी के विस्तार को सीमित कर दिया है।
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Hindi Language Debate: चीन का कदम,मंदारिन को राष्ट्रभाषा के रूप में और मजबूत करने की तैयारी
भारत के उलट चीन ने अपनी भाषा को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। चीन ने सितंबर के तीसरे सप्ताह को ‘राष्ट्रीय सामान्य भाषा और लिपि संवर्धन एवं प्रचार सप्ताह’ के रूप में मनाने का कानूनी फैसला किया है।
27 दिसंबर को चीन की सर्वोच्च विधि निर्माता संस्था, राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थायी समिति ने इससे संबंधित कानून पारित किया। यह कानून पुराने राष्ट्रीय भाषा कानून में संशोधन के बाद लाया गया है, जिसमें लिखित और मौखिक—दोनों प्रकार की मानक मंदारिन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
Hindi Language Debate: आर्थिक उदारीकरण और भाषा,भारत-चीन का अलग रास्ता
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि तेज आर्थिक विकास के साथ अंग्रेजी का विस्तार स्वाभाविक है। चीन ने भी अंग्रेजी शिक्षा में निवेश किया है और दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों में अपने अध्ययन केंद्र स्थापित किए हैं।
लेकिन फर्क यह है कि चीन ने यह सब अपनी भाषा की कीमत पर नहीं किया।
1978 में देंग झिआओपिंग ने आर्थिक खुलेपन की नींव रखी। भारत में भी 1980 के दशक से उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई और 1991 के बाद यह नीति निर्णायक मोड़ पर पहुंची। आज चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन वहां अंग्रेजी ने मंदारिन को पीछे नहीं छोड़ा। भारत में स्थिति इसके उलट दिखाई देती है, जहां अंग्रेजी का वर्चस्व लगातार बढ़ता गया।
Hindi Language Debate: डिजिटल युग और भाषा कानून का नया स्वरूप
चीन का नया भाषायी कानून केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि तकनीक और डिजिटल दुनिया से सीधा जुड़ा हुआ है।
ऑनलाइन फिल्में, वेब सीरीज, गेमिंग, डिजिटल प्रकाशन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अब मानक मंदारिन और मानकीकृत चीनी अक्षरों का उपयोग अनिवार्य होगा।
इसके साथ ही सरकारी वेबसाइटों, मोबाइल एप्लिकेशन और सार्वजनिक सेवाओं में भी राष्ट्रीय मानक भाषा के प्रयोग को जरूरी बनाया गया है। अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों और सम्मेलनों में भी विदेशी भाषाओं के साथ मानक चीनी भाषा को शामिल करने पर जोर दिया गया है।
Hindi Language Debate: आंकड़े जो चीन की भाषायी मजबूती दिखाते हैं
चीन की भाषायी नीति को वहां के सामाजिक आंकड़े भी मजबूती देते हैं।
• 80 प्रतिशत से अधिक आबादी मंदारिन बोलने में सक्षम है
• साक्षरता दर 97 प्रतिशत से ज्यादा है
• 95 प्रतिशत से अधिक लोग मानक चीनी अक्षरों का उपयोग करते हैं
• इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 112 करोड़ से अधिक है
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कानून का लक्ष्य केवल भाषा प्रचार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना बताया गया है।
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Hindi Language Debate: चिंता और विरोध,अल्पसंख्यक भाषाओं का सवाल
हालांकि इस कानून को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं। चीन के स्वायत्त क्षेत्रों जैसे तिब्बत और शिनजियांग में पहले से ही मातृभाषा और सांस्कृतिक शिक्षा को लेकर असंतोष रहा है।
आलोचकों का मानना है कि मानक भाषा को सख्ती से लागू करने से स्थानीय भाषाओं पर दबाव बढ़ सकता है। तिब्बत में पहले ही मातृभाषा आंदोलन के दमन के उदाहरण मौजूद हैं, जिससे इस नए कानून के दुरुपयोग की आशंका और गहरी हो गई है।
Hindi Language Debate: भारत के लिए संकेत और भविष्य की उम्मीद
फ्रांस ने 1994 में अंग्रेजी के अनावश्यक प्रयोग पर रोक लगाकर अपनी भाषा को प्राथमिकता दी थी। चीन अब उसी दिशा में एक और कदम आगे बढ़ता दिख रहा है।
भारत की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में ऐसे किसी कानून की कल्पना फिलहाल कठिन लगती है। फिर भी चीन के इस भाषायी बोध से यह उम्मीद जरूर की जा सकती है कि भारत में भी एक दिन भाषा को लेकर आत्मविश्वास और स्पष्ट दृष्टि विकसित होगी।
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