One Person Dictatorship World Politics 2026: डर, देवत्व और लोकतंत्र का सबसे ख़तरनाक मोड़

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वैश्विक राजनीति में बढ़ती व्यक्ति-केन्द्रित सत्ता
Highlights
  • • आधुनिक तानाशाही के नए रूप • व्यक्ति-पूजा और संस्थागत पतन • वैश्विक उदाहरण और खतरे • नागरिक चेतना क्यों ज़रूरी

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत को लोकतंत्र का स्वर्ण युग कहा गया था। वैश्वीकरण, इंटरनेट और खुले संवाद ने यह भरोसा दिलाया था कि सत्ता अब व्यक्ति से निकलकर संस्थाओं में बसेगी। लेकिन समय के साथ यह उम्मीद टूटती दिखाई दे रही है। आज राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता धीरे-धीरे संस्थाओं से फिसलकर एक चेहरे में सिमटती जा रही है। यह परिवर्तन अचानक नहीं है, बल्कि भय, असुरक्षा और भावनात्मक राष्ट्रवाद के सहारे धीरे-धीरे गढ़ा गया यथार्थ है।

One Person Dictatorship World Politics 2026 और व्यक्ति-पूजा की राजनीति

One Person Dictatorship World Politics 2026: डर, देवत्व और लोकतंत्र का सबसे ख़तरनाक मोड़ 1

आधुनिक राजनीति में तानाशाही अब बंदूक या सैनिक बूटों के साथ नहीं आती। आज सत्ता कथाओं के सहारे बनती है। नेता स्वयं को राष्ट्र की अंतिम उम्मीद के रूप में प्रस्तुत करता है और जनता से यह अपेक्षा करता है कि उस पर सवाल न उठाए जाएँ। यह वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र पहली बार हारता है।

इतिहास में तानाशाह जनता के विरोध से डरते थे, लेकिन आज की सत्ता जनता की तालियों से ताकत पाती है। सोशल मीडिया ने सत्ता को आईना दिखाने के बजाय उसे लोकप्रियता का मंच बना दिया है। असहमति रखने वाले को देशद्रोही, एजेंट या अभिजात वर्ग का प्रतिनिधि बताकर बाहर कर दिया जाता है। यह तानाशाही थोपी नहीं जाती, बल्कि स्वीकृति के साथ चुनी जाती है।

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One Person Dictatorship World Politics 2026 में संस्थाओं का पतन

One Person Dictatorship World Politics 2026: डर, देवत्व और लोकतंत्र का सबसे ख़तरनाक मोड़ 2

सबसे खामोश लेकिन सबसे ख़तरनाक हिंसा संस्थाओं के कमजोर होने से शुरू होती है। पहले न्यायपालिका को धीमा कहा जाता है, फिर मीडिया को पक्षपाती और विश्वविद्यालयों को अप्रासंगिक ठहराया जाता है। इसके बाद सत्ता यह संदेश देती है कि इन सबकी ज़रूरत नहीं — एक व्यक्ति ही पर्याप्त है।

जब संस्थाएँ कमजोर होती हैं, तो व्यक्ति देवता बन जाता है। देवताओं से सवाल नहीं पूछे जाते। भय की राजनीति इसी जमीन पर फलती है — बाहरी दुश्मन, आंतरिक गद्दार, सांस्कृतिक पतन और आर्थिक असुरक्षा का डर दिखाकर नागरिकों से उनकी स्वतंत्रता छीनी जाती है।

वैश्विक उदाहरण और One Person Dictatorship World Politics 2026

One Person Dictatorship World Politics 2026: डर, देवत्व और लोकतंत्र का सबसे ख़तरनाक मोड़ 3

यह प्रवृत्ति केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है। हंगरी में विक्टर ऑर्बन ने खुले तौर पर उदार लोकतंत्र को असफल घोषित किया। रूस में सत्ता का केंद्रीकरण इतना गहरा हो चुका है कि राष्ट्र और व्यक्ति के बीच अंतर धुंधला हो गया है। चीन में नेतृत्व को संस्थागत सीमाओं से मुक्त कर दिया गया, जिससे सत्ता आजीवन हो गई।

यहाँ तक कि लोकतंत्र का प्रतीक माने जाने वाले अमेरिका में भी संस्थाओं पर अविश्वास और व्यक्ति-केन्द्रित राजनीति ने यह साबित कर दिया कि कोई भी लोकतंत्र भीतर से फिसल सकता है, यदि नागरिक संस्थाओं से अधिक किसी चेहरे पर भरोसा करने लगें।

One Person Dictatorship World Politics 2026 के पीछे जनता की मनःस्थिति

One Person Dictatorship World Politics 2026: डर, देवत्व और लोकतंत्र का सबसे ख़तरनाक मोड़ 4

लोकतंत्र से मोहभंग, धीमी न्याय प्रक्रिया, बढ़ती असमानता और भ्रष्टाचार ने लोगों को थका दिया है। नागरिक कहने लगते हैं कि उन्हें स्वतंत्रता नहीं, समाधान चाहिए। यही वह क्षण है जहाँ सत्ता भय बेचती है और बदले में आज़ादी खरीद लेती है।

सोशल मीडिया ने संवाद को कम और ध्रुवीकरण को अधिक बढ़ाया है। नेता देवता बनते हैं और आलोचक शत्रु। जब संसद, मीडिया और अदालतें निर्भीक नहीं रहतीं, तो एक व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सर्वशक्तिमान बन जाता है।

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One Person Dictatorship World Politics 2026: समाधान कहाँ है?

हर तानाशाही अपने चरम पर सबसे शक्तिशाली दिखती है, लेकिन भीतर से खोखली होती है। इसका समाधान किसी और मज़बूत नेता में नहीं, बल्कि मज़बूत संस्थाओं में है। स्वतंत्र मीडिया, सक्रिय नागरिक समाज और असहमति के सम्मान के बिना लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है।

इतिहास गवाह है कि तानाशाही का पतन तभी शुरू होता है जब नागरिक सवाल पूछना बंद नहीं करते। असली लड़ाई सत्ता से नहीं, चेतना से है।

दुनिया एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ यह तय होना है कि नागरिक बने रहना है या भक्त। जिस दिन लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं, उसी दिन एक व्यक्ति इतिहास, राष्ट्र और भविष्यसब पर कब्ज़ा कर लेता है।

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