Congress Political Psychology: स्वतंत्रता आंदोलन से आत्ममुग्धता तक, कांग्रेस के मानस की पड़ताल

आपकी आवाज़, आपके मुद्दे

6 Min Read
बंगाल चुनाव 2026 में ममता बनर्जी बनाम बीजेपी
Highlights
  • • स्वतंत्रता आंदोलन से सत्ता-केंद्रित राजनीति तक कांग्रेस का मानस • इंदिरा गांधी दौर में केंद्रीकरण और नियंत्रण की मानसिकता • 2014 के बाद नकार और विरोध की राजनीति • आत्मविनाश की ओर बढ़ती राष्ट्रीय विपक्षी भूमिका

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज जिस दयनीय राजनीतिक अवस्था में दिखाई देती है, वह केवल चुनावी हारों या संगठनात्मक विफलताओं का परिणाम नहीं है। यह एक गहरे मानसिक, वैचारिक और नैतिक क्षरण की कहानी है, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के बाद सत्ता में प्रवेश के क्षण से ही दिखाई देने लगती हैं। समय के साथ यह क्षरण इतना गहरा होता चला गया कि आज कांग्रेस स्वयं यह दावा करने की स्थिति में भी नहीं रह गई है कि उसका राजनीतिक मानस कभी स्पष्ट, अनुशासित और दीर्घकालिक सोच से संचालित था।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कांग्रेस के पास एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य था। औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति के लिए संवाद, जन-आंदोलन और नैतिक दबाव जैसे साधन तय थे। वैचारिक विविधता के बावजूद राष्ट्रीय उद्देश्य सर्वमान्य था। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो उस दौर में कांग्रेस का “ईगो”—अर्थात यथार्थ से संतुलन बनाने वाली शक्ति—मजबूत था। लेकिन यह संतुलन अस्थायी था, और इसके भीतर छिपी दिशाहीनता धीरे-धीरे उजागर होती चली गई।

Congress Political Psychology: स्वतंत्रता आंदोलन से आत्ममुग्धता तक, कांग्रेस के मानस की पड़ताल 1

Congress Political Psychology: सत्ता में प्रवेश और मानसिक रूपांतरण

1947 के बाद कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम से निकलकर सत्ता-प्रबंधन की दुनिया में दाखिल हुई। यही वह मोड़ था जहां पार्टी का मानस मूल रूप से बदलने लगा। सत्ता-सुख, प्रशासनिक प्रभुत्व और ‘अहं’ का विस्तार हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दिखाई देने वाली प्रवृत्तियां सत्ता के साथ और तीव्र होती चली गईं।

वंशानुगत राजनीति को व्यवस्थित रूप से अमल में लाया गया और धीरे-धीरे पार्टी और देश के बीच की रेखा धुंधली होने लगी। यह वह दौर था जब कांग्रेस स्वयं को भारत का पर्याय मानने लगी। इंदिरा गांधी के तेज़ और एकांगी निर्णय इस मानसिक अवस्था के प्रतीक थे। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह वह अवस्था थी जहां “सुपरईगो”—नैतिक नियंत्रण—कमज़ोर पड़ने लगा और “नार्सिसिज़्म”आत्ममुग्धता—प्रमुख हो गया।

Congress Political Psychology: स्वतंत्रता आंदोलन से आत्ममुग्धता तक, कांग्रेस के मानस की पड़ताल 2

यह भी पढ़े : https://livebihar.com/bihar-politics-congress-mlas-jdu-defection-update/

Congress Political Psychology: 1969 से आपातकाल तक, नियंत्रण का स्थायी संस्कार

1969 से 1975 का दौर कांग्रेस के मानस में निर्णायक मोड़ लेकर आया। पार्टी विभाजन, अत्यधिक केंद्रीकरण और अंततः आपातकाल—इन घटनाओं ने कांग्रेस के संगठनात्मक लोकतंत्र को लगभग समाप्त कर दिया। “हाई कमांड संस्कृति” का जन्म हुआ और पार्टी के अवचेतन में नियंत्रण-प्रियता स्थायी रूप से दर्ज हो गई।

आपातकाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अब लोकतंत्र को साधन और सत्ता को साध्य मानने लगी है। यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं थी, बल्कि मानसिक रूपांतरण था। असहमति को खतरा और संस्थाओं को बाधा मानने की प्रवृत्ति इसी दौर की देन है।

Congress Political Psychology: स्वतंत्रता आंदोलन से आत्ममुग्धता तक, कांग्रेस के मानस की पड़ताल 3

Congress Political Psychology: 1990 का दशक और पहचान का संकट

1990 के दशक में कांग्रेस एक अजीब मानसिक अवस्था में पहुंच गई। वह न तो स्पष्ट समाजवादी रह गई, न ही आत्मविश्वास से भरी उदारवादी पार्टी बन सकी। आर्थिक सुधार मजबूरी में स्वीकार किए गए, वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ नहीं।

उभरती सामाजिक और सांस्कृतिक राजनीति को समझने के बजाय उसका उपहास किया गया। इससे जमीनी समाज से संवाद कमजोर होता गया। मनोविज्ञान की भाषा में यह “आइडेंटिटी क्राइसिस” था—एक ऐसी अवस्था जब कोई संगठन स्वयं नहीं जानता कि वह वास्तव में है क्या।

Congress Political Psychology: 2014 का आघात और नकार का दौर

Congress Political Psychology: स्वतंत्रता आंदोलन से आत्ममुग्धता तक, कांग्रेस के मानस की पड़ताल 4

2014 की हार कांग्रेस के मानस के लिए गहरे आघात की तरह थी। लेकिन इस आघात से आत्ममंथन के बजाय पार्टी ने चुना—इंकार, दोषारोपण और प्रतिक्रियात्मक राजनीति। हर सरकारी कदम का विरोध, चाहे वह राष्ट्रीय हित में ही क्यों न हो, उसकी पहचान बन गया।

सेना, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास का नैरेटिव गढ़ा गया। यह दर्शाता है कि पार्टी का “ईगो” टूट चुका है और आवेग, क्रोध तथा प्रतिशोध—अर्थात “इड”—हावी हो चुका है।

Do Follow us : https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr

Congress Political Psychology: आत्मविनाश की ओर बढ़ती राजनीति

आज कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह भारत को अपने राजनीतिक पुनरुत्थान का साधन मानने लगी है। यदि भारत मजबूत दिखे तो असहजता, और यदि संकट में दिखे तो अवसर की तलाश—यह मानसिकता किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए आत्मघाती है।

मनोवैज्ञानिक शब्दों में यह “सेल्फ-डिस्ट्रक्टिव बिहेवियर” है। इसके दीर्घकालिक परिणाम केवल चुनावी पराजय तक सीमित नहीं रहेंगे। राष्ट्रीय विमर्श विषाक्त होगा, लोकतंत्र के प्रति विश्वास कमजोर पड़ेगा और विपक्ष की भूमिका निर्माणात्मक न रहकर विघटनकारी बनती चली जाएगी।

Congress Political Psychology: सुधार की शर्तें और ऐतिहासिक विकल्प

कांग्रेस की दुर्गति से उबरने की संभावना तभी बन सकती है जब वह वंशानुगत राजनीति से मानसिक दूरी बनाए, भारत को पार्टी से बड़ा माने और विरोध को राष्ट्र-विरोध नहीं, राष्ट्र-निर्माण का औजार समझे।

अन्यथा इतिहास में उसका स्मरण स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के रूप में तो रहेगा, लेकिन आधुनिक भारत की आवश्यकताओं को समझने में विफल एक राजनीतिक संगठन के रूप में भी दर्ज होगा।

Do Follow us : https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

Share This Article