मैंने यह लेख लिखने की शुरुआत इस मंशा से की थी कि साफ-साफ बताऊँ कि आखिर किस पीड़ा और किस सोच के साथ मैंने कांग्रेस छोड़ने का निर्णय लिया। लेकिन बात सिर्फ मेरे व्यक्तिगत फैसले तक सीमित नहीं है। यह फैसला कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व शैली, खासकर राहुल गांधी की लीडरशिप और उनके आसपास बने सत्ता-केंद्र को लेकर गहरी असहमति का नतीजा है।
आज यह स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि कांग्रेस से अलग होने का मेरा निर्णय राहुल गांधी के पार्टी चलाने के तौर-तरीकों से उपजी निराशा से जुड़ा है। यह कहना भी जरूरी है कि यह असहमति पार्टी से नहीं, बल्कि नेतृत्व के आसपास बैठे कुछ लोगों की सोच और रणनीति से है।
Rahul Gandhi Leadership और कांग्रेस में वास्तविक सत्ता संरचना
अक्सर यह सवाल उठता है कि जब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, तो फिर राहुल गांधी पर सवाल क्यों? मेरी समझ में यह सवाल वही लोग उठाते हैं जो या तो वास्तविक स्थिति से अनजान हैं या जानबूझकर भ्रम पैदा करना चाहते हैं।
आज की तारीख में कांग्रेस का हर बड़ा फैसला, हर नियुक्ति और हर राजनीतिक रणनीति राहुल गांधी की सहमति से तय होती है। इसमें कोई अस्वाभाविकता भी नहीं है, क्योंकि देशभर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भरोसा नेहरू-गांधी परिवार में रहा है और वर्तमान समय में राहुल गांधी उसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह भी सच है कि जब तक सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बीच किसी मुद्दे पर सार्वजनिक मतभेद सामने नहीं आते, तब तक कांग्रेस में सत्ता का केंद्र राहुल गांधी ही रहेंगे।
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Rahul Gandhi Leadership के नाम पर गुटबाजी कैसे बढ़ी
मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि राहुल गांधी के आसपास बैठे कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ में उन्हें कांग्रेस की वास्तविक स्थिति को गलत तरीके से समझाया। ऐसे लोगों की रणनीति साफ रही—
वे नेता जो राहुल गांधी के राजनीति में आने से पहले स्थापित हो चुके थे, उन्हें धीरे-धीरे किनारे किया जाए।
इसी सोच के तहत युवा कांग्रेस और एनएसयूआई को पूरी तरह राहुल गांधी के अधीन रखा गया। पुराने, अनुभवशील नेताओं को हटाकर उन्हीं जातीय और सामाजिक वर्गों से नए चेहरे आगे बढ़ाए गए, जो राहुल गांधी के अलावा किसी और को नेता मानने को तैयार नहीं थे।
इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के भीतर एक शक्तिशाली गुट बन गया। सत्ता के आसपास रहना चाहने वालों की भी इसमें कोई कमी नहीं रही। यह राजनीति की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
Rahul Gandhi Leadership पर मेरी सबसे बड़ी गलतफहमी
एक समय ऐसा भी था जब मैंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राहुल गांधी किसी एक गुट के नेता नहीं हैं, वे पूरी कांग्रेस के नेता हैं। उस समय मैं पार्टी में महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहा था और एक राष्ट्रीय अख़बार को इंटरव्यू में यही बात कही थी।
आज लगता है कि उस समय मेरी समझ अधूरी थी। राहुल गांधी को पूरी कांग्रेस ने तो अपना नेता मान लिया, लेकिन कांग्रेस के हर वर्ग को राहुल गांधी का अपना बनना अभी बाकी है।
Rahul Gandhi Leadership: नेतृत्व परिवर्तन और संगठन का अस्तित्व
किसी भी संस्था में जब नेतृत्व बदलता है, तो प्रशासनिक स्तर पर कुछ उथल-पुथल स्वाभाविक होती है। लेकिन जब यह उथल-पुथल संस्था के अस्तित्व पर सवाल खड़े करने लगे, तब चिंता जरूरी हो जाती है।
आज स्थिति यह है कि राहुल गांधी के आसपास मौजूद लोगों को उन कांग्रेस नेताओं से खतरा महसूस होता है, जिनके पास अपने क्षेत्र में जनता का वास्तविक समर्थन है। यही सोच कांग्रेस को कमजोर कर रही है।
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Rahul Gandhi Leadership: राहुल गांधी को लेकर मेरी राय स्पष्ट है
मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं राहुल गांधी का विरोधी नहीं हूँ। वे पढ़े-लिखे, शिष्टाचार वाले और संवेदनशील व्यक्ति हैं। यदि उन्हें मौका मिले और वे प्रधानमंत्री बनें, तो वे एक सफल प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं।
मेरी समझ के अनुसार, यदि कांग्रेस को पूर्ण बहुमत भी मिल जाए, तब भी केवल 40 प्रतिशत संभावना है कि राहुल गांधी स्वयं प्रधानमंत्री बनेंगे। 60 प्रतिशत संभावना यह है कि वे अपने किसी विश्वासी को यह जिम्मेदारी सौंपेंगे।
Rahul Gandhi Leadership: कांग्रेस छोड़ना विश्वासघात नहीं है
अक्सर कहा जाता है कि पार्टी ने आपको बहुत कुछ दिया, फिर बुरे समय में आपने पार्टी छोड़ दी। लेकिन राजनीति में लेन-देन एकतरफा नहीं होता। चाहे व्यक्ति सांसद हो, विधायक हो या साधारण कार्यकर्ता—सबने पार्टी को कुछ न कुछ दिया होता है।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ कांग्रेस ने नेहरू-गांधी परिवार को सब कुछ दिया। सच यह है कि नेहरू-गांधी परिवार की कई पीढ़ियों ने कांग्रेस और देश दोनों को बहुत कुछ दिया है।
मेरी असहमति पार्टी से नहीं, बल्कि नेतृत्व के आसपास बैठे कुछ लोगों की सोच से है।
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