भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां सब कुछ बोल रहा है—सत्ता, विपक्ष, मीडिया और सोशल मीडिया—लेकिन नागरिक चुप होता जा रहा है। यह चुप्पी सहमति की नहीं, बल्कि थकान, भ्रम और असमंजस की उपज है। लोकतंत्र का मूल तत्व केवल मतदान नहीं, बल्कि सतत संवाद, प्रश्न और उत्तरदायित्व है। दुर्भाग्यवश आज प्रश्न पूछना असुविधाजनक और उत्तर देना वैकल्पिक बनता जा रहा है।
- Contemporary India Democracy Crisis और राजनीति का बदला स्वरूप
- Contemporary India Democracy Crisis में मीडिया की भूमिका
- Contemporary India Democracy Crisis और सोशल मीडिया का प्रभाव
- Contemporary India Democracy Crisis और आर्थिक-सामाजिक यथार्थ
- Contemporary India Democracy Crisis और पहचान की राजनीति
- Contemporary India Democracy Crisis में नागरिक की भूमिका
Contemporary India Democracy Crisis और राजनीति का बदला स्वरूप
स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक राजनीति से लेकर आज की इवेंट-मैनेजमेंट आधारित राजनीति तक भारतीय राजनीति ने लंबी यात्रा तय की है। आज चुनाव विचारधाराओं के संघर्ष से अधिक नैरेटिव कंट्रोल की लड़ाई बन चुके हैं। कौन सा मुद्दा उठेगा और कौन सा दबेगा, यह अब राजनीतिक दलों से अधिक डिजिटल एल्गोरिद्म और मीडिया रणनीति तय कर रही है। इससे सत्ता को चुनौती कम और शोर अधिक मिलता है, जो लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता है।
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Contemporary India Democracy Crisis में मीडिया की भूमिका
भारतीय मीडिया कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता था। आज वह खड़ा तो है, लेकिन उस पर विश्वास की दरारें स्पष्ट दिखती हैं। टीआरपी और क्लिक की दौड़ में समाचार सूचना कम और उत्तेजना अधिक बन गए हैं। स्टूडियो बहसें निर्णय पहले और तथ्य बाद में तय करती हैं। बड़ा प्रश्न यह नहीं कि मीडिया सत्ता से सवाल क्यों नहीं करता, बल्कि यह है कि क्या दर्शक अब सवाल सुनना भी चाहते हैं।

Contemporary India Democracy Crisis और सोशल मीडिया का प्रभाव
सोशल मीडिया ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया है, लेकिन जिम्मेदारी की कमी ने अफवाह और भावनात्मक उकसावे को बढ़ाया है। इससे सार्वजनिक विवेक कमजोर हुआ है और संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है।
Contemporary India Democracy Crisis और आर्थिक-सामाजिक यथार्थ
सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई आज भी बड़ा प्रश्न है। विकास के दावों के साथ-साथ रोजगार की अनिश्चितता, असंगठित क्षेत्र की पीड़ा और मध्यम वर्ग का दबाव भी उतना ही वास्तविक है। शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल कमजोर पड़ रहा है, जिससे युवा भारत की आकांक्षाएं अधर में लटकती दिखती हैं।
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Contemporary India Democracy Crisis और पहचान की राजनीति
धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र फिर से राजनीति के केंद्र में हैं। विविधता भारत की ताकत रही है, लेकिन जब इसे विभाजन का औजार बनाया जाता है, तो समाज का ताना-बाना कमजोर होता है। असहमति को साजिश और प्रश्न को देशद्रोह मानने की प्रवृत्ति खतरनाक संकेत है।
Contemporary India Democracy Crisis में नागरिक की भूमिका
लोकतंत्र सरकार से नहीं, नागरिक चेतना से जीवित रहता है। सवाल पूछना, तथ्य जांचना और सत्ता से जवाबदेही मांगना ही लोकतंत्र की असली सेवा है। भारत संकट में है, लेकिन समाधान की क्षमता भी रखता है। आवश्यकता न अंधे समर्थन की है, न अंधे विरोध की—बल्कि सचेत भागीदारी की।
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