Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : पीड़ितों का शस्त्र न बन जाए उमर-शरजील की हिरासत

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उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
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  • . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : शरजील इमाम और उमर खालिद के पक्ष में वामपंथी राजनीति ?. . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : क्या अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों को दबाया जा रहा . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : दंगों में जो हिंदू मारे गए उनका क्या ? . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : षड्यंत्रकारियों का मकसद ट्रंप की भारत यात्रा को निरस्त कराना . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : दिल्ली दंगों को लेकर नए विमर्श गढ़ने की कोशिश . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जारी दुष्प्रचार . Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : वामपंथी वैचारिकी के खिलाफ तार्किक हमला जरूरी

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil :छह साल पहले राजधानी दिल्ली के उत्तरी-पूर्वी हिस्से के जाफराबाद और मौजपुर में हुए दंगों पर राजनीति थम नहीं रही है। राजनीति तब भी खूब हुई, जब 23 फरवरी 26 फरवरी 2020 के बीच हुए दंगों का घाव बिल्कुल हरा था। इस बार इन दंगों पर राजनीति की वजह पांच जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से आया एक आदेश है, जिसमें इन दंगों के पांच आरोपियों गुलफिशां फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, शादाब अहम और मोहम्मद सलीम खान को जमानत दे दी गई है। इस आदेश को लेकर राजनीति ही नहीं हो रही, प्रकारांतर से देश की सबसे बड़ी अदालत भी निशाने पर है। सर्वोच्च अदालत ने इन दंगों के आरोपी शरजील इमाम उमर खालिद को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। इस फैसले के खिलाफ सोशल मीडिया पर इन दोनों आरोपियों के पक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ बयानबाजी तेज हो गई।

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : शरजील इमाम और उमर खालिद  के पक्ष में वामपंथी राजनीति ?

वामपंथी वैचारिकी की एक खासियत है। वह अपने पक्ष में अकादमिक तर्क गढ़ने में माहिर रही है। अपने लिहाज के तथ्यों को चुनकर उसके हिसाब से वह तर्क गढ़ने और अपने पक्ष में माहौल बनाने के साथ ही अपनी वैचारिकी के लोगों को पीड़ित दिखाने में वह हमेशा आगे रहती रही है। शरजील इमाम और उमर खालिद  के पक्ष में वामपंथी वैचारिकी उसी तरह से उमड़ पड़ी है। वह दोनों के बारे में यह राय बनाने की भरपूर और प्रभावी कोशिश कर रही है कि दोनों दंगाई नहीं, दंगे के शातिर षड्यंत्रकारी नहीं, बल्कि वे प्रखर बुद्धिजीवी हैं।

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : क्या अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों को दबाया जा रहा

वामपंथी वैचारिकी यह साबित करने की भी कोशिश कर रही है कि दोनों चूंकि अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम समुदाय से हैं, और चूंकि केंद्र में हिंदुत्ववादी सत्ता है। इसलिए अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों को दबाया और प्रताड़ित किया जा रहा है। वामपंथी वैचारिकी और उसकी बुद्धिजीवी जमात यह विमर्श खड़ा करने की कोशिश कर रही है कि हिंदुत्ववादी सत्ता के इशारे पर अदालत मुस्लिम समुदाय के निर्दोष बुद्धिजीवियों को बलि का बकरा बना रही है।

यह विमर्श खड़ा करके वामपंथी वैचारिकी और उसकी बुद्धिजीवी जमात दरअसल दंगाईयों को पीड़ित के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही है। दिलचस्प यह है कि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत को नकारने के लिए जहां सर्वोच्च न्यायालय को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं बाकी पांच आरोपियों को जमानत दिए जाने के आदेश को जबरदस्ती नेपथ्य में धकेलने की कोशिश की जा रही है।

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Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : दंगों में जो हिंदू मारे गए उनका क्या ?

वामपंथी वैचारिकी के इस विमर्श का पूरा मकसद यह भुलाना है कि 2020 के दिल्ली दंगे हिंदू-मुस्लिम दंगे नहीं थे। इस विमर्श का लक्ष्य यह भी भुलाना है कि इन दंगों में अधिसंख्य हिंदू समुदाय के लोग मारे गए थे। इस विमर्श का यह भी मकसद है कि इन दंगों के दौरान आईबी के मासूम अधिकारी अंकित शर्मा की हुई हत्या को सामान्य अपराध दिखाने की कोशिश हो रही है। इन दंगों में आधिकारिक रूप से 53 लोग मारे गए थे। दंगा खत्म होने के बाद कई लाशें नाले में बहती मिलीं। जिस तरह उस दौरान दंगे के एक आरोपी आम आदमी पार्टी के तत्कालीन पार्षद ताहिर हुसैन के घर पत्थर, हथियार और बड़ी-सी गुलेल मिली, उससे  तो यही साबित होता है कि दिल्ली के ये दंगे हिंदू समाज को सबक सिखाने की मुस्लिम समाज के कुछ दंगाइयों की कोशिश थी।

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : षड्यंत्रकारियों का मकसद ट्रंप की भारत यात्रा को निरस्त कराना

इन दंगों की टाइमिंग को भी भुलाना आसान नहीं है। जब ये दंगे हुए थे, उसके कुछ ही दिन बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप का भारत दौरा हुआ था।  दंगा के षड्यंत्रकारियों का मकसद ट्रंप की भारत यात्रा को निरस्त कराना, भारतीय राज व्यवस्था को बदनाम करना और इसके जरिए भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाना था।

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : दिल्ली दंगों को लेकर नए विमर्श गढ़ने की कोशिश

शरजील इमाम और उमर खालिद के पक्ष में उठती आवाजों का प्रतिकार भी जरूरी है। इन आवाजों की पोल खोलना भी जरूरी है। भला हो कि हिंदुत्ववादी मानस इन दिनों बेहद सचेत हो चुका है। निश्चित तौर पर इसकी वजह मुस्लिम तुष्टिकरण की हकीकत का सामने आना तो है ही, केंद्रीय सत्ता में मोदी की अगुवाई में हिंदुत्ववादी ताकतों का प्रभावी बनना भी है। दिल्ली दंगों को लेकर नए विमर्श गढ़ने की कोशिशें होती रहेंगी। जरूरत यह है कि इसका लगातार उचित प्रतिकार तो होते ही रहे, हिंदुत्व विरोधी नैरेटिव के खिलाफ आक्रामक राष्ट्रवादी विमर्श लगातार उठता रहे। इसी अंदाज में होना यह चाहिए कि दिल्ली दंगों को लेकर बार-बार यह कहा जाना चाहिए कि ये हिंदुओं के खिलाफ खुराफाती और शांति विरोधी मुस्लिम सिरफिरों के सुनियोजित अपराध थे। जिसमें 53 लोगों की मौत हुई। इनमें ज्यादातर हिंदु थे। दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए।

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Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जारी दुष्प्रचार

दिल्ली दंगों पर जब बात हो रही है तो यह भी बताने की कोशिश होनी चाहिए कि दंगे में मरने वालों और घायलों में भी ज्यादातर हिंदू ही थे। इसकी भी बार-बार चर्चा होनी चाहिए कि इन दंगों में सिर्फ और सिर्फ हिंदू समुदाय की ही दुकानों और हिंदू समुदाय के ही मकानों को लक्ष्य बनाकर नुकसान पहुंचाया गया। यह भी बताने की कोशिश लगातार जारी रहनी चाहिए कि इन दंगों का एक मकसद तत्कालीन नागरिकता संबंधी कानून में संसद द्वारा किया गया संशोधन भी था। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जारी दुष्प्रचार भी था।

Politics on Delhi Riots and Umar-Sharjil : वामपंथी वैचारिकी के खिलाफ तार्किक हमला जरूरी

जमानत पर बाहर आए ये पांचों आरोपी लगातार पाडकास्ट कर रहे हैं, समाचार माध्यमों को साक्षात्कार दे रहे हैं। इसके जरिए वे जेल जीवन की विद्रूपताओं को उजागर तो कर ही रहे हैं, राजव्यवस्था को पक्षपाती साबित करने की कोशिश भी कर रहे हैं। जमानत पाए आरोपियों के इन कार्यों का मकसत असल में हिंदुत्ववादी विचारधारा, भारतीय राज्य व्यवस्था और न्याय व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना है। राष्ट्रवादी ताकतों को अगर इन ताकतों पर पार पाना है तो वामपंथी वैचारिकी के खिलाफ तार्किक हमला करना होगा, भावनात्मक नहीं।

निष्कर्षः

लगातार ऐसा जवाबी विमर्श खड़ा होता रहा तो मुस्लिम समुदाय के शांति विरोधी और अपराधी और दंगाई समर्थक वर्ग की मंशा का खुलासा करना आसान होगा। लगातार जारी ऐसे विमर्श की वजह से हिंदुत्व विरोधी ताकतें जहां एक्सपोज होंगी, वहीं उनके खिलाफ आम मानस उठ खड़ा होगा। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के जरिए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली राजनीतिक धाराएं भी इससे एक्सपोज होंगी। इस प्रक्रिया के लगातार जारी रहने के चलते एक दौर ऐसा भी आएगा, जब छद्म विमर्शकारों के सामने सच को पूरी हकीकत के साथ स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पडेगा।

फिलहाल यह जान लेना चाहिए कि जिन पांच आरोपियों को सर्वोच्च अदालत ने जमानत दी है, उन्हें दो-दो लाख के निजी मुचलके पर रिहा किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने इन आरोपियों की जमानत मंजूर करते वक्त बारह कड़ी शर्तें लगाई हैं। अदालत ने कहा है कि ये आरोपी किसी रैली में हिस्सा नहीं ले सकते और पोस्टर नहीं बांट सकते। अदालत ने ताकीद की है कि वे किसी भी कीमत पर अपने खिलाफ चल रहे मामले को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेंगे।

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