पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहाँ सत्ता, संघर्ष, कानून और जनभावना—चारों धाराएँ आपस में टकराती दिखाई दे रही हैं। यह टकराव केवल किसी एक दल की हार-जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की शासन शैली, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और भविष्य की दिशा को तय करने वाला निर्णायक मोड़ बनता जा रहा है। लंबे समय तक राजनीतिक संतुलन साधने में सफल रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने अब चुनौतियाँ कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी हो चुकी हैं। आने वाला विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक आत्मा की परीक्षा बन चुका है।
West Bengal Politics Crisis 2026: केंद्र–राज्य टकराव और कानूनी दबाव की राजनीति
केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, अदालतों की टिप्पणियाँ और कानूनी प्रक्रियाएँ बंगाल की राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रही हैं। हालिया अदालती टिप्पणियों ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि राज्य सरकारें केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज में कहाँ तक हस्तक्षेप कर सकती हैं।
इन घटनाओं ने ममता बनर्जी की उस राजनीतिक छवि को आंशिक रूप से प्रभावित किया है, जिसमें वे स्वयं को संघीय ढांचे की रक्षक और केंद्र के दबाव के विरुद्ध संघर्षरत नेता के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं। चुनाव से पहले लंबी कानूनी लड़ाइयाँ जनता का ध्यान विकास से हटाकर आरोप-प्रत्यारोप की ओर मोड़ देती हैं, जिसका सीधा असर राजनीतिक माहौल पर पड़ता है।
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West Bengal Politics Crisis 2026: ममता बनर्जी की ताकत और कमजोरियाँ

वाम मोर्चे के लंबे शासन के बाद ममता बनर्जी का उदय एक जनआंदोलन के रूप में हुआ था। उन्होंने न केवल वर्षों पुराने राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ा, बल्कि खुद को आम जनता, गरीबों और हाशिए पर खड़े वर्गों की आवाज के रूप में स्थापित किया। शुरुआती वर्षों में उनकी सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाओं के जरिए जनविश्वास भी अर्जित किया।
लेकिन समय के साथ सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण, संगठन पर मजबूत पकड़ और विरोध के प्रति असहिष्णुता जैसे आरोप भी उभरने लगे। प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल, विपक्षी आवाजों का दमन और चुनावी हिंसा की घटनाएँ उनकी सरकार की सबसे बड़ी कमजोरियों के रूप में सामने आई हैं। यही कारण है कि ममता बनर्जी की लोकप्रियता के बावजूद असंतोष की परतें भी धीरे-धीरे गहराती जा रही हैं।
West Bengal Politics Crisis 2026: भाजपा की रणनीति और बढ़ता राजनीतिक आधार
भाजपा ने बंगाल की इन्हीं कमजोरियों को अपने राजनीतिक आधार के रूप में विकसित करने की रणनीति अपनाई है। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से पार्टी ने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया और राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार विरोध तथा सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया।
हालाँकि विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन यह भी सच है कि भाजपा अब बंगाल की राजनीति में एक स्थायी शक्ति के रूप में उभर चुकी है। मत प्रतिशत और सामाजिक आधार में हुई वृद्धि यह संकेत देती है कि भाजपा लंबे खेल की रणनीति पर काम कर रही है। महाराष्ट्र और बिहार में मिली हालिया राजनीतिक सफलताओं ने पार्टी के आत्मविश्वास को और बढ़ाया है।
West Bengal Politics Crisis 2026: विकास, कानून-व्यवस्था और जनचिंताएँ
बंगाल में विकास का मुद्दा बीते कुछ वर्षों में राजनीतिक शोर के बीच दबता चला गया है। उद्योग, निवेश और रोजगार जैसे बुनियादी प्रश्न पीछे छूटते दिखाई देते हैं। कभी औद्योगिक और बौद्धिक राजधानी माना जाने वाला यह राज्य आज पूंजी पलायन, बंद होती इकाइयों और युवाओं के पलायन की समस्या से जूझ रहा है।
इसके साथ ही कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल, चुनावी हिंसा और प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह राज्य की छवि को गंभीर नुकसान पहुँचा रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और सामाजिक असंतुलन भी जनचर्चा का विषय बन चुके हैं। इन मुद्दों पर सरकार का रुख अक्सर रक्षात्मक दिखाई देता है, जबकि विपक्ष इन्हें आक्रामक तरीके से भुनाने में जुटा है।
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West Bengal Politics Crisis 2026: जनता के हाथ में अंतिम फैसला
बंगाल की राजनीति आज भावनात्मक अपील और पहचान आधारित विमर्श के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता अब विकास, स्थिरता और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देगी, या फिर भावनात्मक राजनीति एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभाएगी।
आगामी विधानसभा चुनाव बंगाल की जनता के लिए आत्ममंथन का अवसर हैं। यह चुनाव केवल सरकार चुनने का नहीं, बल्कि राज्य की लोकतांत्रिक आत्मा, सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की दिशा तय करने का माध्यम बन चुका है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि अंतिम शब्द जनता का होता है—और बंगाल में अगली चाल किसकी होगी, यह अब मतदाता तय करेंगे।
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