Patna High Court Rape Case Verdict: निचली अदालतें पोस्ट ऑफिस नहीं, न्याय का विवेकशील मंच हैं

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निचली अदालतों पर पटना हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
Highlights
  • • दुष्कर्म केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला • सहमति और अपराध के बीच स्पष्ट रेखा • निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल • जमानत व्यवस्था पर सख्त संदेश • न्यायिक सुधार की जरूरत पर जोर

दुष्कर्म से जुड़े एक अहम मामले में पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी ने न केवल निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की मौजूदा जड़ता को भी उजागर कर दिया है। न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव द्वारा की गई टिप्पणी सिर्फ एक फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे न्यायिक तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय बन गई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आरोप तय करते समय ट्रायल कोर्ट को यांत्रिक रवैया नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि यह परखना अनिवार्य है कि अभियोजन के पास ऐसा प्रथम दृष्टया साक्ष्य है भी या नहीं, जो मुकदमे को आगे बढ़ाने योग्य हो।

Patna High Court Rape Case Verdict: सहमति और दुष्कर्म के बीच की संवेदनशील रेखा

भागलपुर जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए दुष्कर्म के दोषसिद्धि आदेश को निरस्त करते हुए पटना हाईकोर्ट ने केस को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यस्क स्त्री और पुरुष के बीच परस्पर सहमति से लंबे समय तक चले संबंध को केवल इस आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता कि शादी का वादा किया गया था और बाद में विवाह नहीं हो सका।

यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में “शादी का वादा” और “सहमति” के प्रश्नों पर कई मामलों में न्यायिक असंतुलन देखने को मिला है। हाईकोर्ट ने यह संकेत दिया कि हर मामले में परिस्थितियों, साक्ष्यों और संबंधों की प्रकृति की गहन समीक्षा आवश्यक है, न कि भावनात्मक या दबाव आधारित निर्णय।

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Patna High Court Rape Case Verdict: निचली अदालतों की यांत्रिक कार्यप्रणाली पर कठोर टिप्पणी

Patna High Court Rape Case Verdict: निचली अदालतें पोस्ट ऑफिस नहीं, न्याय का विवेकशील मंच हैं 1

न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव ने कहा कि निचली अदालतों को आरोप तय करते समय “पोस्ट ऑफिस” की तरह काम नहीं करना चाहिए। अदालतों का दायित्व है कि वे अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री की गहराई से जांच करें और यह तय करें कि क्या वह सामग्री मुकदमे की कसौटी पर टिक पाएगी।

वर्तमान स्थिति यह है कि कई निचली अदालतों में पुलिस द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को बिना जांच-पड़ताल के स्वीकार कर लिया जाता है। इससे निर्दोष व्यक्तियों को वर्षों तक मुकदमे झेलने पड़ते हैं, जबकि न्याय का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाता है।

Patna High Court Rape Case Verdict: पूर्व मामलों से उजागर होती न्यायिक खामियाँ

न्यायिक प्रणाली की इस खामी के उदाहरण पहले भी सामने आते रहे हैं। हाल ही में एक नाबालिग बच्चे को निचली अदालत ने जेल भेज दिया, क्योंकि पुलिस ने उसे बालिग बताकर पेश किया था। मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने न केवल बच्चे को रिहा किया, बल्कि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से पाँच लाख रुपये मुआवजा वसूलने का आदेश भी दिया।

इसी तरह किशनगंज का वह मामला भी याद किया जाता है, जहाँ एक दुष्कर्म पीड़िता को अदालत में शोर मचाने के आरोप में जेल भेज दिया गया था। व्यापक जनविरोध के बाद हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप किया, युवती को रिहा कराया और संबंधित मजिस्ट्रेट को दंडित किया। ऐसे अनेक उदाहरण न्यायिक तंत्र की गंभीर कमियों की ओर इशारा करते हैं।

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Patna High Court Rape Case Verdict: जमानत व्यवस्था और बढ़ता न्यायिक बोझ

निचली अदालतों द्वारा जमानत और अग्रिम जमानत देने में दिखाई जा रही हिचकिचाहट भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। हाल ही में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू को यह कहना पड़ा कि तीन से सात साल की सजा वाले मामलों में भी निचली अदालतें जमानत देने से बच रही हैं, जिसके कारण हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं की बाढ़ आ गई है।

हाईकोर्ट का अधिकांश समय जमानत मामलों में ही खर्च हो रहा है, जो न्यायिक व्यवस्था की असंतुलित कार्यप्रणाली को दर्शाता है। जब निचली अदालतें अपने विवेकाधिकार का सकारात्मक प्रयोग नहीं करतीं, तो उच्च न्यायालयों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है।

Patna High Court Rape Case Verdict: न्यायपालिका में सुधार की अपरिहार्य आवश्यकता

देश में पाँच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि आम आदमी के विश्वास, समय और जीवन की कीमत है। अदालतें अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाई हैं। दशकों तक मुकदमों का खिंचते रहना, नवाचार की कमी और मानवीय संवेदना का अभाव न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

अब समय आ गया है कि टाइम-बाउंड फैसलों का नियम लागू हो, न्यायाधीशों के प्रदर्शन के आधार पर पदोन्नति और दायित्व तय हों, और न्यायपालिका आम नागरिक की पीड़ा से जुड़े। अन्यथा ऐसी टिप्पणियाँ बार-बार दोहराई जाती रहेंगी कि निचली अदालतें पोस्ट ऑफिस की तरह काम कर रही हैं।

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