Congress historical irrelevance: कांग्रेस की ऐतिहासिक अप्रासंगिकता: मोदी युग में सत्ता नहीं, संदर्भ से बाहर होती पार्टी

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ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
Highlights
  • • कांग्रेस की स्थिति अब चुनावी हार से आगे बढ़ चुकी है • मोदी ने कांग्रेस को हराया नहीं, उसके नैरेटिव को तोड़ा • वंशवाद कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है • आज की राजनीति ‘मोदी बनाम विकल्प’ की हो चुकी है • कांग्रेस का संकट नेतृत्व, विचार और संगठन—तीनों स्तरों पर

Congress historical irrelevance: पराजय से आगे की स्थिति — जब कोई दल समय से बाहर हो जाए

भारतीय राजनीति में पराजय कोई नई बात नहीं है। अनेक राजनीतिक दल सत्ता से बाहर होकर भी समय के साथ पुनः उभरे हैं। लेकिन कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब कोई पार्टी केवल सत्ता नहीं, बल्कि इतिहास की धुरी से खिसक जाती है। आज कांग्रेस उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।

अब यह कहना अपर्याप्त है कि कांग्रेस चुनाव हार रही है। अधिक यथार्थवादी आकलन यह है कि कांग्रेस राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होती जा रही है। यह अप्रासंगिकता आकस्मिक नहीं है और न ही इसे केवल नरेंद्र मोदी की चुनावी कुशलता का परिणाम कहा जा सकता है। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसमें कांग्रेस की विरासत, उसका एजेंडा और उसका आत्मबोध—तीनों जनता से क्रमशः कटते चले गए।

नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को हराया नहीं, ढांचा खोल दिया

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नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे निर्णायक विशेषता यह रही कि उन्होंने कांग्रेस को केवल चुनावी चुनौती नहीं दी, बल्कि उस राजनीतिक ढांचे को उजागर कर दिया, जिस पर दशकों तक कांग्रेस की सत्ता टिकी रही।

कांग्रेस स्वयं को लंबे समय तक ‘संस्थाओं की संरक्षक’, ‘धर्मनिरपेक्षता की नैतिक प्रहरी’ और ‘राष्ट्र की स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता’ के रूप में प्रस्तुत करती रही। मोदी ने इन दावों को आक्रामक शोर के बिना, लेकिन ठोस राजनीतिक नैरेटिव के साथ जनता के सामने खोल दिया। यह टकराव वैचारिक से अधिक नैतिक और संरचनात्मक था।

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Congress historical irrelevance: कांग्रेस की मूल समस्या — सत्ता से नहीं, समय से बाहर

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कांग्रेस की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह सत्ता से बाहर नहीं, बल्कि समय से बाहर हो चुकी है। आज का भारत जिस आत्मविश्वास, आकांक्षा और निर्णय क्षमता के साथ आगे बढ़ रहा है, कांग्रेस की राजनीति उससे मेल नहीं खाती।

आज का मतदाता सहानुभूति नहीं, डिलीवरी चाहता है। उपदेश नहीं, निर्णय चाहता है। इसके उलट कांग्रेस का राजनीतिक व्याकरण आज भी शिकायत, अपराधबोध और नैतिक श्रेष्ठता के पुराने मुहावरों में उलझा हुआ है। वह अब भी स्वयं को उस दौर में देखती है, जब सत्ता उसका स्वाभाविक अधिकार थी।

वंशवाद — जो कभी ताकत था, आज कमजोरी है

जिस वंशवाद को कभी ‘अनुभव की निरंतरता’ कहा गया, वही आज कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। मोदी ने वंशवाद के प्रश्न को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न बना दिया।

आज यह मुद्दा सत्ता के अधिकार से जुड़ा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक न्याय से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस की वैचारिक नींव कमजोर पड़ती है।

Congress historical irrelevance: राजनीति का केंद्र बदल चुका है

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मोदी युग की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि भाजपा चुनाव जीत रही है, बल्कि यह है कि कांग्रेस अब राजनीति का संदर्भ बिंदु नहीं रही। आज केंद्रीय संघर्ष ‘भाजपा बनाम कांग्रेस’ नहीं, बल्कि ‘मोदी बनाम विकल्प’ बन चुका है।

यह एक मौलिक बदलाव है। दशकों तक कांग्रेस सत्ता में हो या विपक्ष में, राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रही। आज पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस का होना या न होना, राष्ट्रीय बहस के लिए अनिवार्य नहीं रहा।

एजेंडा दिवालियापन और भविष्य की भाषा का अभाव

कांग्रेस का संकट केवल नेतृत्व का नहीं, बल्कि एजेंडा का दिवालियापन है। वह आज भी ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना चाहती है, जिनकी सामाजिक ऊर्जा समाप्त हो चुकी है। उसकी भाषा में भविष्य नहीं, अतीत की पीड़ा है।

इसके विपरीत मोदी ने विकास, राष्ट्रीय पहचान, प्रशासनिक दृढ़ता और वैश्विक भूमिका को एक साझा कथा में पिरोया। कांग्रेस इस कथा का न तो प्रभावी खंडन कर पाई और न ही कोई वैकल्पिक भविष्य-कथा रच सकी।

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Congress historical irrelevance: वापसी संभव है, लेकिन पुराने ढांचे के साथ नहीं

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राजनीति में ‘असंभव’ शब्द खतरनाक होता है। इतिहास गवाह है कि मृतप्राय मानी गई शक्तियां भी लौट आई हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि पुराने एजेंडे के साथ कांग्रेस की वापसी असंभव है।

यदि कांग्रेस को लौटना है, तो उसे नेतृत्व, विचारधारा और संगठन—तीनों स्तरों पर स्वयं को पुनर्परिभाषित करना होगा। वंशवाद से मुक्ति, स्पष्ट राष्ट्रीय एजेंडा और भविष्य की भाषा इसके अनिवार्य तत्व होंगे।

Congress historical irrelevance: पराजय नहीं, ऐतिहासिक चेतावनी

इतिहास भावनाओं से नहीं, प्रासंगिकता से चलता है। जो राजनीतिक शक्तियां समय के साथ स्वयं को नहीं ढाल पातीं, वे धीरे-धीरे स्मारक बन जाती हैं—पूजनीय, लेकिन अप्रभावी।

आज कांग्रेस की स्थिति को केवल ‘पराजय’ कहना वास्तविकता का अपमान होगा। यह पराजय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अप्रासंगिकता की चेतावनी है। असली प्रश्न यह नहीं कि कांग्रेस अगला चुनाव जीतेगी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या वह आने वाले भारत की भाषा सीख पाएगी।

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