अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर बड़े और दूरगामी बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। अमेरिका का विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से औपचारिक रूप से बाहर निकलना और ईरान के खिलाफ दबाव की नई रणनीति अपनाना केवल दो अलग-अलग फैसले नहीं हैं, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की बदली हुई सोच को दर्शाते हैं। इस घटनाक्रम का असर अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह रणनीतिक चिंता और अवसर—दोनों का संकेत है।
डब्ल्यूएचओ से दूरी और मध्य-पूर्व में शक्ति प्रदर्शन यह बताता है कि अमेरिका अब बहुपक्षीय संस्थाओं और परंपरागत कूटनीति के बजाय राष्ट्रीय हित-केंद्रित और दबाव आधारित नीति को प्राथमिकता दे रहा है। यही वजह है कि दुनिया एक बार फिर अनिश्चित और बहुध्रुवीय दौर की ओर बढ़ती दिख रही है।
US Iran Tension WHO Exit और मध्य-पूर्व में अमेरिकी रणनीति
अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह फिलहाल ईरान के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई से बचना चाहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दबाव कम होगा। इसके उलट, मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को बढ़ाया जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र में युद्धपोतों, सैन्य अड्डों और सहयोगी देशों के साथ संयुक्त गतिविधियों को “डिटरेंस स्ट्रैटेजी” के रूप में देखा जा रहा है।
इस रणनीति का उद्देश्य ईरान को यह संदेश देना है कि सैन्य विकल्प भले ही अभी इस्तेमाल न हो, लेकिन वह हमेशा टेबल पर मौजूद है। अमेरिका इजराइल और खाड़ी देशों के माध्यम से ईरान को क्षेत्रीय स्तर पर घेरने की नीति पर भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह संतुलन की नहीं, बल्कि दबाव की कूटनीति है, जहां शक्ति प्रदर्शन संवाद से अधिक प्रभावी माना जा रहा है।
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US Iran Tension WHO Exit: आर्थिक प्रतिबंध और परमाणु मुद्दा

आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका ईरान के खिलाफ कड़े प्रतिबंध जारी रखने के मूड में है। तेल व्यापार, बैंकिंग नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन को सीमित करने की रणनीति का उद्देश्य ईरान की आर्थिक क्षमता को नियंत्रित करना बताया जा रहा है। इसके साथ ही परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी सख़्त रुख अपनाए हुए हैं।
ईरान पर दबाव का यह आर्थिक मॉडल दिखाता है कि अमेरिका अब युद्ध से पहले आर्थिक घेराबंदी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। हालांकि, इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी गहराती जा रही है, जिसका असर सीधे उन देशों पर पड़ेगा जो कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं।
US Iran Tension WHO Exit और वैश्विक संस्थाओं से अमेरिकी दूरी

डब्ल्यूएचओ से बाहर निकलने का अमेरिकी फैसला वैश्विक स्तर पर एक बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह केवल स्वास्थ्य संगठन से अलग होने का मामला नहीं है, बल्कि यह बहुपक्षीय संस्थाओं से अमेरिका की बढ़ती दूरी को दर्शाता है। इससे वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है, खासकर विकासशील देशों में जहां संसाधनों की कमी पहले से एक चुनौती है।
इस फैसले ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को नए तरीके से परिभाषित करना चाहता है। सहयोग के बजाय नियंत्रण और शर्तों पर आधारित भागीदारी उसकी नई नीति का हिस्सा बनती दिख रही है।
US Iran Tension WHO Exit: भारत के लिए ऊर्जा और रणनीति की चुनौती
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला और सबसे बड़ा मुद्दा ऊर्जा सुरक्षा का है। ईरान भारत का पारंपरिक तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता का खतरा बना रहेगा, जिसका सीधा असर भारत की महंगाई, चालू खाता घाटे और आयात बिल पर पड़ सकता है।
दूसरा अहम पहलू चाबहार बंदरगाह परियोजना है। ईरान में भारत की यह रणनीतिक परियोजना मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ईरान पर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव इस परियोजना को कूटनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील बना सकता है।
तीसरा और सबसे जटिल पहलू रणनीतिक संतुलन का है। अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, वहीं ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और क्षेत्रीय संबंध रहे हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष में खुलकर खड़ा होना नई दिल्ली के लिए आसान विकल्प नहीं है। भारत की पारंपरिक नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की इस दौर में एक बार फिर गंभीर परीक्षा होगी।
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बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका बढ़ सकती है, खासकर स्वास्थ्य, विकास और वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर। हालांकि, इसके साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी।
अमेरिका-ईरान तनाव और बहुपक्षीय संस्थाओं से अमेरिकी दूरी यह संकेत देती है कि दुनिया एक बार फिर अनिश्चित, टकरावपूर्ण और बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश कर रही है। भारत के लिए यह समय भावनात्मक प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि संतुलित, व्यावहारिक और हित-केंद्रित विदेश नीति अपनाने का है। आने वाले महीनों में भारत की कूटनीतिक सक्रियता यह तय करेगी कि वह इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में केवल दर्शक बनता है या एक प्रभावशाली संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरता है।
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