गणतंत्र दिवस हर साल तय तारीख़ पर आता है। परेड, तिरंगा, राष्ट्रगान और कैमरों की चमक—सब कुछ समय पर, पूरे वैभव के साथ। यह दृश्य हमें यह भरोसा देता है कि गणतंत्र सुरक्षित है, जीवित है और मज़बूत है। लेकिन गणतंत्र केवल दृश्य नहीं होता। वह एक संवेदना है, एक नैतिक अवस्था है, जो नागरिक और सत्ता के बीच हर दिन घटती है। यहीं से वह असहज सवाल जन्म लेता है, जिसे अक्सर उत्सव के शोर में दबा दिया जाता है—क्या हम गणतंत्र का सिर्फ़ जश्न मना रहे हैं, या उसकी ज़िम्मेदारी भी उठा रहे हैं?
26 जनवरी 1950 को भारत ने केवल एक शासन-प्रणाली नहीं अपनाई थी। उस दिन यह तय हुआ था कि सत्ता का स्रोत कोई राजा, शासक या ताक़तवर समूह नहीं, बल्कि नागरिक होगा। यह निर्णय जितना ऐतिहासिक था, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। नागरिक-केंद्रित व्यवस्था क़ानून से नहीं, नागरिक के चरित्र, विवेक और साहस से चलती है।
Republic Day 2026 India Democracy और नागरिक बनाम मतदाता का फर्क
हम गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। आँकड़ों के लिहाज़ से यह सच भी है—मतदाताओं की संख्या, चुनावों की व्यापकता और सत्ता-हस्तांतरण की निरंतरता। लेकिन गणतंत्र आँकड़ों से नहीं चलता। वह मतदाताओं की गिनती से नहीं, नागरिकों की चेतना से जीवित रहता है।
मतदाता पाँच साल में एक बार दिखाई देता है—मतदान केंद्र पर, उँगली पर स्याही के निशान के साथ। नागरिक हर दिन दिखाई देता है—अपने सवालों में, अपने निर्णयों में और अपने साहस में। मतदाता चुप रह सकता है, क्योंकि उससे केवल एक विकल्प चुनने की अपेक्षा होती है। नागरिक को बोलना पड़ता है, क्योंकि उससे लोकतंत्र को जीवित रखने की उम्मीद की जाती है। गणतंत्र केवल वोट से नहीं, विवेक से चलता है।
आज लोकतंत्र का सबसे गहरा संकट यही है कि नागरिक को धीरे-धीरे मतदाता में सीमित कर दिया गया है। मतदान को लोकतंत्र की पूर्णता मान लिया गया है, जबकि वह उसकी शुरुआत भर है।
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Republic Day 2026 India Democracy और सवाल पूछने का अधिकार
लोकतंत्र सवालों से कमज़ोर नहीं होता; वह सवालों से मज़बूत होता है। सवाल पूछना, असहमति जताना, सत्ता से जवाब माँगना और अन्याय के सामने खड़ा होना—ये कोई बाधा नहीं, बल्कि गणतंत्र की बुनियादी ज़िम्मेदारियाँ हैं।
लेकिन जब सवालों को असुविधा कहा जाने लगे, असहमति को अव्यवस्था का पर्याय बना दिया जाए, और मौन को परिपक्वता व देशभक्ति का नाम दिया जाने लगे—तब खतरे की घंटी बजनी चाहिए। यह संकेत होता है कि लोकतंत्र का उत्सव तो पूरे शोर के साथ मनाया जा रहा है, लेकिन उसकी ज़िम्मेदारी धीरे-धीरे पीछे छूट रही है।
ऐसा लोकतंत्र बाहर से चमकदार दिख सकता है, लेकिन भीतर से खोखला हो जाता है—जहाँ चुनाव होते हैं, पर नागरिक अनुपस्थित रहते हैं।
Republic Day 2026 India Democracy और विकास की गरिमा
हम विकास का जश्न मनाते हैं—ग्राफ़, सूचकांक और वैश्विक रैंकिंग के ज़रिये। ये आँकड़े भरोसा देते हैं कि देश आगे बढ़ रहा है। लेकिन गणतंत्र विकास को गति से नहीं, गरिमा की कसौटी पर परखता है।
अगर विकास नागरिक को उसकी ज़मीन से विस्थापित करे, अगर वह नदियों, जंगलों और हवा को कुचल दे, और अगर वह असहमति को दबाने का औज़ार बन जाए—तो वह विकास नहीं, महज़ प्रबंधन है। सच्ची प्रगति वही है जो सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना।
Republic Day 2026 India Democracy और संस्थाओं की भूमिका
गणतंत्र केवल सरकार से नहीं चलता; वह संस्थाओं से साँस लेता है। न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय और चुनाव आयोग—ये महज़ ढाँचे नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ हैं। जब ये संस्थाएँ सवाल पूछती हैं, सत्ता संतुलन में रहती है। जब वे चुप हो जाती हैं, सत्ता भारी होने लगती है।
संस्थागत मौन सबसे खतरनाक संकेत है, क्योंकि वह अन्याय को चुनौती नहीं देता—उसे वैधता दे देता है। इसलिए गणतंत्र की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यही है कि संस्थाएँ डर से नहीं, संविधान से संचालित हों।
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Republic Day 2026 India Democracy: डर बनाम विवेक
गणतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु कोई तानाशाह नहीं, बल्कि डर होता है—बोलने का डर, सवाल करने का डर, असहमत होने का डर। डर नागरिक को भीतर से छोटा करता है और संस्थाओं को मौन का आदी बना देता है। डर में जीने वाला समाज उत्सव मना सकता है, पर गणतंत्र नहीं चला सकता।
संविधान किसी पूजा-स्थल में सजाने के लिए नहीं बनाया गया था। वह राज्य और नागरिक के बीच एक जीवित अनुबंध है—अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन। अगर हम संविधान को केवल भाषणों और सालगिरहों तक सीमित कर दें, तो गणतंत्र धीरे-धीरे एक औपचारिक रस्म बन जाता है।
जश्न नहीं, रोज़ निभाई जाने वाली ज़िम्मेदारी
गणतंत्र दिवस तिरंगा फहराने का दिन भर नहीं है; यह अपने भीतर नागरिक होने की ज़िम्मेदारी जगाने का दिन है। गणतंत्र कोई कैलेंडर की तारीख़ नहीं—वह रोज़ निभाई जाने वाली प्रतिबद्धता है। वह हर उस क्षण जीवित रहता है, जब कोई नागरिक डर के बावजूद सच बोलता है, जब असहमति को अपराध नहीं, अधिकार समझा जाता है, और जब अन्याय के सामने खड़े होने का साहस किया जाता है।
जिस दिन उत्सव की चमक से ज़्यादा ज़िम्मेदारी की रोशनी को महत्व मिलेगा, उसी दिन गणतंत्र वास्तव में जीवित होगा। इतिहास हमें यही सिखाता है—गणतंत्र जश्न से नहीं, ज़िम्मेदारी से बचता है।
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