India EU FTA: भारत अब ‘विकल्प’ नहीं, ‘आवश्यक साझेदार’ बन चुका है

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भारत-EU FTA से पहले राजनयिक गतिविधियां
Highlights
  • • EU का भारत में स्वागत सिर्फ प्रोटोकॉल नहीं • भारत विश्व जनसंख्या का एक-चौथाई बाजार • ट्रंप की नीति बनाम EU का दीर्घकालिक दृष्टिकोण • FTA से पहले भरोसे की तैयारियां • भारत अब आवश्यक साझेदार के रूप में स्थापित

नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (EU) के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के आगमन पर लागू ट्रैफिक प्रतिबंध केवल प्रोटोकॉल नोटिस नहीं हैं; वे उस वैश्विक बदलाव का प्रतीक हैं जिसमें भारत को अब अनदेखा किया जाना संभव नहीं रहा। भारत आज वैश्विक राजनीति-आर्थिक समीकरणों में वह मुख्य केंद्र बन चुका है, जिसके बिना किसी गंभीर अंतरराष्ट्रीय समझौते की कल्पना कठिन है।

यूरोपीय संघ और भारत के बीच मंगलवार को होने वाले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर दस्तख़त से पहले ही यह स्पष्ट हो चुका है कि शक्ति-संतुलन भारत के पक्ष में झुक चुका है। यह सिर्फ कूटनीतिक कौशल नहीं, बल्कि दशकों की रणनीति का परिणाम है कि आज भारत केवल एक बड़ा बाजार या ऊर्जा विकल्प नहीं, बल्कि एक स्थिर, युवा, और विकास-उन्मुख साझेदार के रूप में स्थापित हो चुका है।

भारत: विश्व जनसंख्या का एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधि बाजार

भारत आज दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है—एक युवा, आकांक्षी और निरंतर बढ़ते बाजार का प्रतिनिधित्व। यह वह वह तथ्य है जिसने 21वीं सदी की वैश्विक आर्थिक योजनाओं में भारत को अनिवार्य साझेदार के रूप में स्थापित कर दिया है।

आपूर्ति-शृंखला संकट (supply chain disruptions), रूस-यूक्रेन युद्ध की अस्थिरताओं, और चीन पर यूरोप की बढ़ती निर्भरता ने यूरोपीय नेताओं को यह अहसास कराया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था स्थिरता, विविध साझेदार और भरोसे पर आधारित होगी—न कि केवल पारंपरिक राजनीतिक गठबंधनों पर।

भारत की स्थिति इसी बदलाव का प्रतीक है। यूरोपीय संघ अब भारत के दरवाजे पर है, न कि भारत यूरोप के दरवाजे पर। इस बदलाव ने वैश्विक राजनीति और व्यापार दोनों को प्रभावित किया है।

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India EU FTA: पहले के दृष्टिकोण और आज की वास्तविकता

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पिछले दशक में अमेरिका के नेतृत्व में भारत-मूलक नीतियों को अक्सर अस्थिर और सतही माना गया। उदाहरण के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की भारत नीति को इतिहास की एक चूक भी कहा जा सकता है।

ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत को कभी वोट-बैंक इवेंट की तरह इस्तेमाल किया गया, तो कभी टैरिफ़ धमकियों के ज़रिये दबाव में रखा गया। “हाउडी मोदी” जैसे कार्यक्रमों की चमक के पीछे कोई टिकाऊ आर्थिक या राजनीतिक ढांचा स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं था; शोर ज़्यादा, समझ कम।

इसके विपरीत, आज यूरोपीय संघ का रवैया ठंडा-संतुलित, गणनात्मक और दीर्घकालिक है। EU जानता है कि भारत को आदेश नहीं दिए जा सकते—भारत के साथ बराबरी पर बातचीत ही स्थिर साझेदारी की दिशा है।

India EU FTA: FTA से पहले की रणनीतिक तैयारियां

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FTA पर दस्तख़त मंगलवार को होना है, लेकिन इससे पहले ही दोनों पक्षों ने भरोसे की ज़मीन तैयार कर ली है। यह सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता ही नहीं है; यह संकेत है कि भारत अब “वेस्ट बनाम शेष” की पुरानी बहस से बाहर निकल चुका है।

आज भारत वह केंद्र बिंदु है जहाँ पश्चिम को भी आना पड़ता है, और पूर्व और दक्षिण को भी। यह वो वैश्विक बदलाव है जिसे केवल शब्दों से नहीं, व्यवहार और रणनीति दोनों से परखा जा रहा है।

इस रणनीति का परिणाम है:
• राजघाट पर श्रद्धांजलि और सम्मान दिखाना
• उच्चस्तरीय वार्ताएं
• सख्त सुरक्षा और प्रोटोकॉल
• वैश्विक नेतृत्व को यह एहसास दिलाना कि भारत केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यक साझेदार है

ये सब संकेत हैं कि भारत को दुनिया सिर्फ मना नहीं रही, बल्कि समझने आई है।

भारत-EU FTA: क्यों है यह वैश्विक दृष्टिकोण की जीत?

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FTA (Free Trade Agreement) केवल एक व्यापार समझौता नहीं है; यह एक नई वैश्विक आर्थिक प्रणाली का प्रतीक है।

आज के समय में व्यापार केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहा है—
यह तकनीक, निवेश, रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा सहयोग, और मानव संसाधन विकास तक विस्तृत हो चुका है।

भारत इस व्यापक अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है क्योंकि:
• भारत के पास युवा-जनसंख्या का बड़ा शेयर है
• भारत तेजी से डिजिटल और विनिर्माण क्षमता बढ़ा रहा है
• भारत का बाजार निरंतर विकास में है

इसलिए यूरोपीय संघ का रुख शोर नहीं, बल्कि गणनात्मक, ठोस और दीर्घकालिक है।

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India EU FTA: ट्रंप की नीति बनाम यूरोपीय दृष्टिकोण

ट्रंप के जमाने में भारत नीति अक्सर शोर, टैरिफ़, और राजनीतिक शो-पीस तक सीमित रह गई थी। “हाउडी मोदी” जैसी बैठकों ने केवल सीमित ध्यान आकर्षित किया।

लेकिन यूरोपीय दृष्टिकोण स्पष्ट है—
भारत के साथ साझेदारी बराबरी, स्थिरता और विकास-उन्मुख है।

ट्रंप जैसे नेता इस परिवर्तन को पहचानने में नाकाम रहे—और यही उनकी सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है।

भारत अब रणनीति और सम्मान का केंद्र बन चुका है

FTA की जल्दी से जल्दी घोषणा इसलिए नहीं कि भारत पर दबाव है, बल्कि इसलिए कि दुनिया ने यह समझ लिया है कि भारत के बगैर कोई स्थिर वैश्विक व्यवस्था संभव नहीं।

यह वह मोड़ है जहां भारत
• आदेश सुनाने वाला नहीं,
• न केवल विकल्प,
• बल्कि ज़रूरी साझेदार बन चुका है।

और यही असली जीत है—
जब दुनिया भारत को समझने आई है, न कि भारत को प्रेरित करने।

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