पटना में आयोजित राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठक में तेजस्वी यादव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे “लालू युग के अंत” के रूप में पेश किया, लेकिन सियासी ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल और विरोधाभासी नजर आती है।
खासतौर पर लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की तीखी टिप्पणी ने इस फैसले को महज़ संगठनात्मक बदलाव से कहीं आगे, पारिवारिक और वैचारिक टकराव के रूप में स्थापित कर दिया है।
- Bihar Politics: रोहिणी आचार्य का ट्वीट और घर के भीतर की राजनीति
- Bihar Politics: क्या वाकई लालू युग समाप्त हो गया है?
- Bihar Politics: जनता दल से राजद तक – सामाजिक न्याय की यात्रा और पतन
- Bihar Politics: 2005 के बाद का दौर और ऐतिहासिक चूक
- Bihar Politics: 2020 – लालूमुक्त राजद और नई उम्मीद
- Bihar Politics: क्या राजद का भविष्य बचा है?
Bihar Politics: रोहिणी आचार्य का ट्वीट और घर के भीतर की राजनीति
रोहिणी आचार्य ने ट्वीट कर जिस भाषा और प्रतीकों का प्रयोग किया, उसने साफ कर दिया कि यह टिप्पणी किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की नहीं, बल्कि घर के भीतर से आई असहमति है।
“कठपुतली”, “गिरोह-ए-घुसपैठ” और “शाहजादा की ताजपोशी” जैसे शब्द केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि यह संकेत हैं कि राष्ट्रीय जनता दल के भीतर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर गहरी बेचैनी मौजूद है।
यह दृश्य किसी हद तक मुग़ल काल की सत्ता-रस्साकशी जैसा प्रतीत होता है, जहाँ बूढ़ा शासक मंच पर मौजूद रहता है, लेकिन उत्तराधिकारी को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगता है।
Bihar Politics: क्या वाकई लालू युग समाप्त हो गया है?
यह मान लेना कि कार्यकारी अध्यक्ष बनने मात्र से लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक अध्याय समाप्त हो गया, राजनीति की बुनियादी समझ के खिलाफ है।
राजद में कार्यकारी अध्यक्ष का पद पहले भी रहा है और यह कभी भी वास्तविक सत्ता का केंद्र नहीं रहा। पार्टी की वैचारिक, सांगठनिक और टिकट वितरण की अंतिम शक्ति आज भी लालू प्रसाद के पास ही है।
स्वयं लालू प्रसाद यह समझते हैं कि उनका चेहरा अब चुनावी रूप से बोझ बन चुका है, लेकिन राजनीति से संन्यास लेना उनके स्वभाव और इतिहास — दोनों के विपरीत है। इसलिए परदे के पीछे रहकर भ्रम बनाए रखना उनकी रणनीति रही है।
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Bihar Politics: जनता दल से राजद तक – सामाजिक न्याय की यात्रा और पतन
लालू प्रसाद का उदय जयप्रकाश आंदोलन से हुआ। एक भूमिहीन परिवार में जन्मा युवा, समाजवादी राजनीति के सहारे बिहार जैसे अर्द्धसामंती राज्य में सत्ता के शीर्ष तक पहुँचा।
1988 में कर्पूरी ठाकुर के अवसान के बाद लोकदल (बाद में जनता दल) का नेतृत्व और 1990 में मुख्यमंत्री पद — यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक समाजवादी शक्ति का परिणाम था।
मंडल दौर में जनता दल एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक मंच था, जिसमें शरद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और रामसुंदर दास जैसे नेता शामिल थे। इसे केवल “लालू की राजनीति” कहना ऐतिहासिक सरलीकरण है।
Bihar Politics: चारा घोटाला और पार्टी का विभाजन
1995 की जीत के बाद लालू प्रसाद का राजनीतिक पतन शुरू हो गया। चारा घोटाले में घिरने के बाद जब उनसे पद छोड़ने की अपेक्षा की गई, तो उन्होंने जनता दल को तोड़कर 1997 में राष्ट्रीय जनता दल बना लिया।
राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर उन्होंने लोकतंत्र में परिवारवाद की स्थायी लकीर खींच दी।
Bihar Politics: 2005 के बाद का दौर और ऐतिहासिक चूक
2005 में लालू प्रसाद के पास आखिरी बड़ा मौका था। जदयू-राजद विलय और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव ठुकराना, बिहार की राजनीति का टर्निंग पॉइंट बन गया।
इसके बाद 2009, 2010 और आगे के चुनावों में पार्टी लगातार सिमटती चली गई।
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Bihar Politics: 2020 – लालूमुक्त राजद और नई उम्मीद
2020 का विधानसभा चुनाव राजद के लिए एक नई शुरुआत जैसा था। तेजस्वी यादव ने अकेले मोर्चा संभाला, परिवार को प्रचार से दूर रखा और “दस लाख रोजगार” जैसे मुद्दों के जरिए जाति-पार राजनीति की कोशिश की।
इसका असर दिखा — गठबंधन को 110 सीटें मिलीं और राजद सबसे बड़ी पार्टी बनी।
Bihar Politics: 2022 के बाद फिर वही चक्र
2022 में लालू प्रसाद की वापसी के साथ पार्टी फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई। नीतीश कुमार से गठबंधन, जातिवादी चेहरों की वापसी और सत्ता-केंद्र का पुनः लालू परिवार में सिमटना — इन सबने तेजस्वी की उभरती छवि को कमजोर किया।
Bihar Politics: क्या राजद का भविष्य बचा है?
राजनीति में नैतिकता चाहे दिखावे की हो, लेकिन उसकी जरूरत होती है। लालू प्रसाद ने नैतिकता को जिस तरह खत्म किया, उसने पार्टी को वैचारिक रूप से खोखला कर दिया।
भाजपा का मजबूत होना राजद की कमजोरी का परिणाम है, लेकिन राजद का पूरी तरह खत्म होना अंततः भाजपा के लिए भी खतरा बनेगा।
Bihar Politics: तेजस्वी के लिए अंतिम सलाह
तेजस्वी यादव के लिए यही समय है कि वे कुछ समय राजनीतिक शोर से दूर रहकर लोगों के बीच जाएँ, सुनें और एक नई, नैतिक, समावेशी राजनीति की नींव रखें।
मलबे का मालिक बनना सत्ता नहीं होता — नई इमारत खड़ी करना होती है।
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