Collusive Suit Indian Law: साजिशी मुकदमे कैसे न्यायपालिका की आत्मा को खोखला कर रहे हैं

आपकी आवाज़, आपके मुद्दे

4 Min Read
साजिशी मुकदमे कैसे न्यायपालिका को नुकसान पहुंचाते हैं
Highlights
  • • साजिशी मुकदमे न्याय प्रणाली के लिए गंभीर खतरा • वादी-प्रतिवादी की मिलीभगत से अदालत को गुमराह किया जाता है • सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को सख्ती से खारिज किया है • धोखे से प्राप्त डिक्री कभी वैध नहीं मानी जाती • वकीलों और न्यायाधीशों की नैतिक भूमिका बेहद अहम

Collusive Suit Indian Law क्या है और यह न्याय के लिए खतरा क्यों है

न्यायपालिका वह पवित्र मंच है जहाँ सत्य की प्रतिष्ठा होती है, लेकिन जब अदालत को ही छलने की साजिश रची जाए, तो यह पूरे न्याय तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। कानून की भाषा में ऐसे ही मामलों को साजिशी मुकदमा कहा जाता है। आम शब्दों में, यह वह स्थिति है जहाँ वादी और प्रतिवादी दिखने में एक-दूसरे के विरोधी होते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों एक ही योजना के हिस्सेदार होते हैं।

ऐसे मुकदमों में अदालत केवल एक औपचारिक मंच बन जाती है, जहाँ पहले से तय पटकथा के अनुसार बहस होती है और अंततः एक ऐसी डिक्री हासिल कर ली जाती है, जो ईमानदार कानूनी रास्ते से कभी संभव नहीं होती। इसका सीधा असर उन वास्तविक पीड़ितों पर पड़ता है, जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

Collusive Suit Indian Law में ‘नूरा-कुश्ती’ कैसे होती है

सरल शब्दों में, जब दो पक्ष आपस में मिलकर अदालत में दिखावटी लड़ाई लड़ते हैं, तो यह कानून के साथ खुला धोखा होता है। इस तरह के मामलों में कोई वास्तविक विवाद नहीं होता। उद्देश्य सिर्फ एक होता है —
• टैक्स से बचना
• बैंक या वित्तीय संस्था के अधिकार को खत्म करना
• किसी तीसरे पक्ष की संपत्ति या हक पर अवैध कब्जा

ऐसे मुकदमे न्यायिक समय की बर्बादी तो हैं ही, साथ ही यह न्याय की बुनियादी अवधारणा पर भी सीधा हमला हैं।

यह भी पढ़ें : https://livebihar.com/ugc-equality-rules-2026-education-discrimination/

Collusive Suit Indian Law पर भारतीय कानून क्या कहता है

Collusive Suit Indian Law: साजिशी मुकदमे कैसे न्यायपालिका की आत्मा को खोखला कर रहे हैं 1

भारतीय कानून में साजिश और धोखे के लिए कोई सहानुभूति नहीं है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 40 यह स्पष्ट करती है कि यदि कोई फैसला या डिक्री धोखे या मिलीभगत से प्राप्त की गई है, तो उसे किसी भी समय चुनौती दी जा सकती है।

इसके अलावा, नागरिक प्रक्रिया संहिता के तहत अदालतों को यह अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है कि वे ऐसे मामलों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर सकें। कानून का स्थापित सिद्धांत है —
धोखे से कभी भी कोई वैध अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकता।

Collusive Suit Indian Law पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर ऐसे मामलों पर कड़ा रुख अपनाया है।
नगुबाई अम्मल बनाम बी. शमा राव (1956) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
• फ्रॉड में एक पक्ष दूसरे को धोखा देता है
• लेकिन साजिशी मुकदमे में दोनों पक्ष मिलकर अदालत को धोखा देते हैं

इसी तरह रूपचंद गुप्ता बनाम रघुवंश कुमार (1964) में अदालत ने कहा कि यदि किसी डिक्री का उद्देश्य किसी तीसरे पक्ष का अधिकार खत्म करना है, तो वह डिक्री स्वतः शून्य मानी जाएगी।

Do Follow us :https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr

Collusive Suit Indian Law और वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी

एक अधिवक्ता केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह न्यायालय का अधिकारी भी होता है। यदि कोई वकील जानते-बूझते ऐसे फर्जी मुकदमों का हिस्सा बनता है, तो यह पेशे की गरिमा पर गहरा आघात है।

बार काउंसिल को ऐसे मामलों में सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, अदालतों को भी उन मामलों में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी, जहाँ प्रतिवादी बिना किसी प्रतिरोध के सब कुछ स्वीकार कर ले।

Collusive Suit Indian Law पर अंतिम निष्कर्ष

न्यायपालिका की असली ताकत उसकी पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा में है। जब साजिशी मुकदमों पर सख्ती होगी, तभी न्याय का वास्तविक स्वरूप सुरक्षित रह पाएगा।
न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।

Do Follow us : https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

Share This Article