मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवज़े की गणना को लेकर न्यायपालिका समय-समय पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ करती रही है, लेकिन पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का ताज़ा फैसला इस बहस को एक नई ऊँचाई पर ले जाता है। न्यायालय ने एक मृतक गृहिणी के परिवार को दिए जाने वाले मुआवज़े को 58.22 लाख रुपये से बढ़ाकर 1.18 करोड़ रुपये कर दिया। इस फैसले ने न केवल क्षतिपूर्ति की राशि दोगुनी की, बल्कि गृहिणी के श्रम और योगदान के आर्थिक मूल्य पर भी स्पष्ट न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने अपने निर्णय में कहा कि गृहिणी का कार्य अमूल्य है और इसे कम करके नहीं आंका जा सकता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि गृहिणी द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को खुले बाज़ार में आउटसोर्स किया जाए, तो उनके लिए पर्याप्त आर्थिक भुगतान करना पड़ता।
Housewife Compensation Verdict में अदालत की मुख्य टिप्पणी
न्यायालय ने माना कि गृहिणी का योगदान केवल घरेलू कार्यों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह परिवार की संरचना, बच्चों के पालन-पोषण, भावनात्मक देखभाल और सामाजिक स्थिरता की धुरी होती है।
फैसले में कहा गया कि:
• गृहिणी की सेवाओं का प्रत्यक्ष वेतन भले न हो
• लेकिन उनका आर्थिक मूल्य वास्तविक है
• परिवार को उनकी मृत्यु से बहुआयामी क्षति होती है
• इसलिए मुआवज़े का आकलन व्यापक दृष्टि से होना चाहिए
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Housewife Compensation Verdict और पूर्व न्यायिक मिसालें

यह पहली बार नहीं है जब अदालतों ने गृहिणी के श्रम के अवमूल्यन पर टिप्पणी की हो। कई महत्वपूर्ण फैसलों में इस विषय पर स्पष्ट न्यायिक सिद्धांत स्थापित किए जा चुके हैं।
2009 — मद्रास हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नाबालिग दीपिका’ मामले (27 अप्रैल 2009) में मद्रास उच्च न्यायालय ने यूनिसेफ (2000) का उद्धरण देते हुए कहा था:
“अवैतनिक देखभाल कार्य मानवीय अनुभव का आधार है।”
अदालत ने माना कि माँ द्वारा किए जाने वाले देखभाल कार्य का आर्थिक मूल्य भले तय न किया जाए, पर दुर्घटना में मृत्यु की स्थिति में उसके अभाव का आकलन करना आवश्यक है।
2010 — सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
‘अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:
• पत्नी का घरेलू योगदान अमूल्य है
• इसे धन में पूर्णतः मापा नहीं जा सकता
• फिर भी आश्रितों को प्रतिकर देने हेतु आर्थिक आकलन जरूरी है
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
• बच्चों की परवरिश
• पति की देखभाल
• घरेलू प्रबंधन
• भावनात्मक सहयोग
इन सभी सेवाओं का समेकित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
“सेवाएं” शब्द की व्यापक न्यायिक व्याख्या
न्यायालयों ने “सेवाएं” शब्द को सीमित घरेलू श्रम तक नहीं माना, बल्कि इसमें शामिल किया:
• मातृत्व देखभाल
• बच्चों का बौद्धिक मार्गदर्शन
• पारिवारिक भावनात्मक संतुलन
• पति को व्यक्तिगत सहयोग
• सामाजिक संबंधों का निर्वाह
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवज़ा इस आधार पर कम नहीं किया जा सकता कि कोई रिश्तेदार — जैसे दादी — स्वेच्छा से कुछ जिम्मेदारियाँ संभाल ले।
Kemp & Kemp Doctrine का संदर्भ
निर्णय में “Kemp & Kemp: The Quantum of Damages” का भी उल्लेख किया गया — जो टॉर्ट लॉ में क्षतिपूर्ति गणना का मानक विधिक ग्रंथ माना जाता है।
इस सिद्धांत के अनुसार:
• क्षतिपूर्ति केवल आय हानि तक सीमित नहीं
• सेवा हानि का भी मूल्यांकन आवश्यक
• व्यावहारिक व संभावित नुकसान शामिल
• आश्रितों पर वास्तविक प्रभाव का आकलन जरूरी
यदि मृतक गृहिणी थी, तो यह कहना कि उसका आर्थिक योगदान शून्य था — न्यायसंगत नहीं।
बाज़ार आधारित मूल्यांकन सिद्धांत
ग्रंथ यह भी कहता है कि:
• घरेलू सेवाओं का मूल्य
• बाज़ार में उपलब्ध समकक्ष सेवाओं की लागत से आँका जाए
जैसे:
• कुक
• केयरटेकर
• ट्यूटर
• हाउस मैनेजर
फिर भी यह स्वीकार किया गया कि कोई बाहरी व्यक्ति गृहिणी की भावनात्मक और नैतिक भूमिका की पूर्ण भरपाई नहीं कर सकता।
वैश्विक न्यायिक और आर्थिक दृष्टिकोण
मार्गरेट रीड सिद्धांत (1934)
अमेरिकी अर्थशास्त्री मार्गरेट रीड ने कहा:
• यदि गृहिणी के कार्य हेतु तीसरे व्यक्ति को भुगतान करना पड़े
• तो वह कार्य उत्पादन का हिस्सा माना जाना चाहिए
इंग्लैंड — Mehmet v Perry (1977)
इंग्लैंड की अपीलीय अदालत ने माना:
• पत्नी की सेवाएँ घरेलू श्रम से अधिक
• मातृत्व देखभाल स्वतंत्र क्षति शीर्ष
• पति को व्यक्तिगत संगति भी प्रतिकर योग्य
यह निर्णय स्थापित करता है कि गृहिणी की सेवाओं का मूल्य साधारण घरेलू कर्मचारी के बराबर नहीं आँका जा सकता।
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Housewife Compensation Verdict का सामाजिक प्रभाव
यह फैसला केवल एक परिवार के मुआवज़े तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संदेश देता है।
संभावित प्रभाव:
• मोटर दुर्घटना दावों में मुआवज़ा गणना बदलेगी
• बीमा कंपनियों की आकलन पद्धति प्रभावित होगी
• गृहिणी श्रम की कानूनी मान्यता मजबूत होगी
• जेंडर जस्टिस विमर्श को बल मिलेगा
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का यह फैसला भारतीय न्यायिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने स्पष्ट किया कि गृहिणी का श्रम अदृश्य अवश्य है, लेकिन अमूल्य भी है — और दुर्घटना क्षतिपूर्ति में उसका यथार्थ आर्थिक मूल्यांकन होना चाहिए।
जब न्यायालय यह स्वीकार करता है कि घर समाज की मूल इकाई है, तब उस इकाई को संभालने वाली गृहिणी की भूमिका को भी समान सम्मान मिलना न्यायसंगत है। यह निर्णय केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक मजबूत कदम माना जाएगा।
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