भारतीय राजनीति का मूल उद्देश्य हमेशा से जनसेवा, सुशासन और समतामूलक समाज की स्थापना रहा है। संविधान निर्माताओं ने जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिकल्पना की थी, उसमें संवाद, सहमति और गरिमा को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। लेकिन हाल के दिनों में संसद के भीतर और बाहर जो घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, वहीं अब आरोप-प्रत्यारोप, अपशब्द और राजनीतिक कटुता का अखाड़ा बनती दिख रही है।
- Parliament Political Controversy: संसद में अपशब्दों की राजनीति और गिरता स्तर
- Parliament Political Controversy: प्रधानमंत्री का लोकसभा में न बोल पाना — सुरक्षा या सियासत?
- Parliament Political Controversy: महिला सांसदों का विरोध — लोकतांत्रिक अधिकार या व्यवधान?
- Parliament Political Controversy: राज्यसभा में प्रधानमंत्री का जवाब और राजनीतिक संकेत
- Parliament Political Controversy: असली मुद्दे गायब, चुनावी विमर्श हावी
- Parliament Political Controversy: लोकतंत्र के लिए चेतावनी संकेत
Parliament Political Controversy: संसद में अपशब्दों की राजनीति और गिरता स्तर
पिछले दिनों लोकसभा के भीतर और बाहर जिस तरह की बयानबाजी देखने को मिली, उसने राजनीतिक मर्यादा की सीमाओं को तोड़ दिया। नेता प्रतिपक्ष द्वारा एक केंद्रीय मंत्री को ‘गद्दार दोस्त’ कहकर संबोधित करना और जवाब में मंत्री द्वारा उन्हें ‘देश का दुश्मन’ कहना — यह सिर्फ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद की गिरती गुणवत्ता का संकेत है।
स्थिति तब और बिगड़ी जब इस बयानबाजी को समुदाय विशेष की अस्मिता से जोड़ दिया गया और सदन में भारी हंगामा हुआ। एक अन्य सांसद द्वारा ‘फटीचर’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करना इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक असहमति अब व्यक्तिगत अपमान में बदलती जा रही है।
ऐसी घटनाएं केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होतीं, बल्कि जनता के बीच राजनीतिक संस्कृति का संदेश भी देती हैं। जब देश के सर्वोच्च विधायी मंच पर बैठे जनप्रतिनिधि ही भाषा की मर्यादा तोड़ेंगे, तो लोकतंत्र की नैतिक नींव कमजोर होना स्वाभाविक है।
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Parliament Political Controversy: प्रधानमंत्री का लोकसभा में न बोल पाना — सुरक्षा या सियासत?

दूसरी बड़ी घटना ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक असहज कर दिया। लगभग 22 वर्षों बाद ऐसा हुआ कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री लोकसभा में अपनी बात नहीं रख सके।
इससे पहले 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को विपक्ष के विरोध के कारण बोलने नहीं दिया गया था। लेकिन इस बार मामला और गंभीर तब हो गया जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने यह बयान दिया कि प्रधानमंत्री सदन में आना चाहते थे, परंतु संभावित अप्रत्याशित घटना की आशंका के कारण उन्हें रोका गया।
यह बयान कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है:
• क्या संसद में प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं हैं?
• यदि खतरा था तो किससे?
• क्या सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट थीं?
• क्या किसी सांसद की भूमिका संदिग्ध थी?
यदि ऐसी आशंका वास्तविक थी तो इसकी औपचारिक जांच, एफआईआर और दोषियों पर कार्रवाई अपेक्षित है। और यदि यह आशंका निराधार थी, तो इस तरह का बयान लोकतंत्र में भय का वातावरण बनाता है — जो उतना ही चिंताजनक है।
Parliament Political Controversy: महिला सांसदों का विरोध — लोकतांत्रिक अधिकार या व्यवधान?
प्रधानमंत्री के आगमन से पहले विपक्ष की कुछ महिला सांसद वेल में पहुंच गईं और तख्तियां लेकर विरोध जताने लगीं। संसदीय परंपरा में यह नया नहीं है। विभिन्न मुद्दों पर सांसद वेल में जाकर विरोध दर्ज कराते रहे हैं।
विरोध लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। जनप्रतिनिधि यदि जनता की आवाज उठाने के लिए विरोध करते हैं तो उसे अपराध की तरह देखना भी उचित नहीं। सवाल विरोध के तरीके का है, न कि विरोध के अधिकार का।
यहीं पर लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है — वह सदन के संरक्षक होते हैं, किसी दल विशेष के नहीं।
Parliament Political Controversy: सोमनाथ चटर्जी बनाम वर्तमान संसदीय परंपरा
2004–2009 के बीच लोकसभा अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी ने पद संभालते ही अपनी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनका मानना था कि अध्यक्ष बनने के बाद वह पूरे सदन के अभिभावक हैं।
आज की परिस्थितियों में उस परंपरा की याद इसलिए आती है क्योंकि सदन की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। क्या वर्तमान नेतृत्व उस आदर्श का अनुसरण करेगा — यह बहस का विषय बन चुका है।
Parliament Political Controversy: राज्यसभा में प्रधानमंत्री का जवाब और राजनीतिक संकेत
लोकसभा में न बोल पाने के बाद प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब दिया। उन्होंने लोकसभा की घटनाओं का जिक्र करते हुए आसन पर कागज फेंके जाने को गंभीर बताया।
उन्होंने इसे क्षेत्रीय और सामाजिक सम्मान से भी जोड़ा:
• असम के पीठासीन सांसद पर कागज फेंकना — असम का अपमान
• आंध्रप्रदेश के दलित सदस्य पर कागज फेंकना — दलितों का अपमान
साथ ही उन्होंने नेता प्रतिपक्ष पर ‘गद्दार’ टिप्पणी को सिख समुदाय के अपमान से जोड़ा। यह भाषण राजनीतिक से अधिक चुनावी संकेतों वाला माना गया, खासकर तब जब असम, पश्चिम बंगाल और केरल में चुनाव निकट हैं।
Parliament Political Controversy: असली मुद्दे गायब, चुनावी विमर्श हावी
पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संसद में जनसरोकार के मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं। महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई — ये विषय बहस के केंद्र में होने चाहिए थे।
लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष — दोनों की प्राथमिकता चुनावी रणनीति अधिक दिखती है।
जनता के मुद्दे:
• रोजगार संकट
• बढ़ती महंगाई
• ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा
• शिक्षा की गुणवत्ता
• कृषि और सिंचाई संकट
इन पर सार्थक बहस कम, राजनीतिक आरोप ज्यादा हो रहे हैं।
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Parliament Political Controversy: लोकतंत्र के लिए चेतावनी संकेत
जब संसद में संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तो उसका असर पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का तंत्र है।
यदि प्रधानमंत्री अपनी ही संसद में असुरक्षित महसूस करें — या ऐसा संदेश जाए — तो यह व्यवस्था पर अविश्वास को जन्म देता है।
इसी तरह यदि विपक्ष की आवाज को व्यवधान मान लिया जाए, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण है, न कि शब्दों का युद्ध। संसद की गरिमा सिर्फ नियमों से नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के आचरण से बनती है। हालिया घटनाएं संकेत देती हैं कि राजनीतिक संवाद का स्तर पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
यदि सत्ता और विपक्ष दोनों आत्ममंथन नहीं करेंगे, तो लोकतंत्र की नैतिक शक्ति कमजोर होती जाएगी। देश आर्थिक रूप से भले चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करे, लेकिन राजनीतिक संस्कृति का पतन उसे नैतिक रूप से कमजोर बना सकता है।
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