जनता के भरोसे के बीच Inflation Unemployment Imbalance India कब दूर करेगी सरकार? बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी पर बड़ा सवाल

आपकी आवाज़, आपके मुद्दे

5 Min Read
महंगाई और बेरोजगारी के बीच जूझती आम जनता
Highlights
  • • महंगाई दर नियंत्रित, पर जेब पर बोझ बरकरार • आवश्यक वस्तुओं की कीमतों ने बढ़ाया दबाव • रोजगार की गुणवत्ता बना बड़ा संकट • संविदा और अस्थायी नौकरियों में वृद्धि • सरकार बनाम विपक्ष में तीखी बहस • कृषि, तेल कीमत और निवेश तय करेंगे भविष्य

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर आधिकारिक स्तर पर भले ही स्थिरता और नियंत्रण के दावे किए जा रहे हों, लेकिन आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ती आर्थिक चुनौतियां अलग ही तस्वीर पेश कर रही हैं। महंगाई और रोजगार — ये दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर किसी भी देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता टिकी होती है। जब इन दोनों के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो सबसे अधिक दबाव मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है।

खाद्य पदार्थों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, किराया और ईंधन तक — जीवनयापन की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार इस असंतुलन को दूर करने के लिए निर्णायक कदम कब उठाएगी।

Inflation Unemployment Imbalance India: आधिकारिक आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि खुदरा महंगाई दर नियंत्रित दायरे में बनी हुई है। नीतिगत स्तर पर इसे आर्थिक स्थिरता का संकेत माना जाता है। लेकिन उपभोक्ता बाजार की वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहती है।

दाल, सब्जी, दूध, खाद्य तेल और अनाज जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। रसोई गैस सिलेंडर, स्कूल फीस, निजी अस्पतालों का खर्च और मकान किराया — इन सबने मिलकर घरेलू बजट को असंतुलित कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि औसत महंगाई दर भले कम दिखे, लेकिन “फूड इन्फ्लेशन” और “सर्विस कॉस्ट इन्फ्लेशन” का वास्तविक प्रभाव आम उपभोक्ता पर कहीं ज्यादा पड़ता है। यही कारण है कि आंकड़ों में राहत दिखती है, पर जेब पर दबाव कम नहीं होता।

यह भी पढ़ें : https://livebihar.com/pappu-yadav-bail-hearing-bomb-threat/

Inflation Unemployment Imbalance India: रोजगार की संख्या नहीं, गुणवत्ता बड़ा संकट

जनता के भरोसे के बीच Inflation Unemployment Imbalance India कब दूर करेगी सरकार? बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी पर बड़ा सवाल 1

रोजगार के क्षेत्र में भी स्थिति मिश्रित दिखाई देती है। श्रम सर्वेक्षणों में बेरोजगारी दर घटने के संकेत दिए जाते हैं, लेकिन रोजगार की प्रकृति चिंता का विषय बनी हुई है।

आज बड़ी संख्या में युवा:
• संविदा आधारित नौकरियों में हैं
• अस्थायी रोजगार कर रहे हैं
• कम वेतन पर काम करने को मजबूर हैं
• गिग इकॉनमी पर निर्भर हैं

ऐसे रोजगार न तो सामाजिक सुरक्षा देते हैं और न ही दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता।

रोजगार सृजन की गुणवत्ता, आय स्तर और स्थायित्व — ये तीनों पहलू नीति बहस के केंद्र में आने चाहिए। कौशल असमानता, प्रशिक्षण की कमी और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव भी बड़ी बाधाएं हैं।

Inflation Unemployment Imbalance India: ग्रामीण-शहरी रोजगार का बदलता ढांचा

ग्रामीण भारत में आज भी कृषि और स्वरोजगार मुख्य आधार हैं। मनरेगा, डेयरी, लघु कृषि कार्य और छोटे व्यापार ग्रामीण आजीविका को संभाले हुए हैं।

वहीं शहरी क्षेत्रों में:
• सेवा क्षेत्र
• निर्माण उद्योग
• खुदरा व्यापार
• ट्रांसपोर्ट व लॉजिस्टिक्स

रोजगार के प्रमुख स्रोत बने हुए हैं।

लेकिन निजी क्षेत्र में स्थायी नियुक्तियों की धीमी गति युवाओं में असुरक्षा बढ़ा रही है। रोजगार है — पर भरोसेमंद नहीं।

Inflation Unemployment Imbalance India पर राजनीति भी तेज

विपक्षी दल लगातार सरकार पर आरोप लगाते रहे हैं कि महंगाई और रोजगार के वास्तविक संकट से ध्यान हटाने के लिए सांख्यिकीय आंकड़ों को प्रमुखता दी जाती है।

उनका कहना है:
• आम नागरिक की आय नहीं बढ़ी
• खर्च कई गुना बढ़ा
• राहत योजनाएं पर्याप्त नहीं
• युवाओं को स्थायी नौकरी नहीं

हालांकि सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कई कदम गिनाती है:
• आपूर्ति प्रबंधन सुधार
• बुनियादी ढांचा निवेश
• कौशल विकास मिशन
• विनिर्माण प्रोत्साहन योजनाएं
• पूंजीगत व्यय में वृद्धि

सरकार का दावा है कि इन उपायों से दीर्घकाल में महंगाई नियंत्रण और रोजगार सृजन दोनों संभव होंगे।

Do Follow us : https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr

Inflation Unemployment Imbalance India: आगे क्या तय करेगा संतुलन?

आर्थिक जानकारों के अनुसार आने वाले महीनों में स्थिति कई कारकों पर निर्भर करेगी:

महंगाई पर असर डालने वाले कारक:
• कृषि उत्पादन
• मानसून की स्थिति
• वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें
• सप्लाई चेन लागत

रोजगार पर असर डालने वाले कारक:
• निजी निवेश
• निर्यात वृद्धि
• MSME सेक्टर की स्थिति
• स्टार्टअप व मैन्युफैक्चरिंग विस्तार

अगर इन क्षेत्रों में सकारात्मक गति आती है, तो संतुलन बहाल हो सकता है।

जनता के भरोसे की असली परीक्षा

वर्तमान परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आर्थिक विकास का लाभ आम नागरिक तक कितनी तेजी से पहुंचता है।

नीति-निर्माताओं के सामने तीनहरी चुनौती है:
1. महंगाई पर ठोस नियंत्रण
2. स्थायी रोजगार सृजन
3. आय वृद्धि सुनिश्चित करना

जब तक इन तीनों मोर्चों पर समान प्रगति नहीं होगी, तब तक आर्थिक संतुलन अधूरा ही रहेगा।

जनता का भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की राहत से मजबूत होता है।

Do Follow us :  https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

Share This Article