भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय काव्य परंपरा के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने शब्द और संघर्ष — दोनों को समान ऊँचाई दी। सरोजिनी नायडू उन्हीं विरल हस्ताक्षरों में से एक थीं। एक ओर उनकी कविताओं में स्वप्न, प्रकृति और नारी-मन की कोमल संवेदनाएँ झिलमिलाती हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक मंचों पर उनकी वाणी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देती हुई गर्जना बन जाती थी। यही द्वैत उन्हें भारतीय इतिहास में अद्वितीय बनाता है।
- Sarojini Naidu Life Journey: जन्म, परिवार और बहुभाषी प्रतिभा की नींव
- Sarojini Naidu Life Journey: इंग्लैंड शिक्षा, प्रेम विवाह और निजी जीवन
- Sarojini Naidu Life Journey: राजनीति में प्रवेश और स्वतंत्रता संग्राम
- Sarojini Naidu Life Journey: नारी जागरण की अग्रदूत
- Sarojini Naidu Life Journey: काव्य साधना और साहित्यिक उत्कर्ष
- Sarojini Naidu Life Journey: अंतिम समय और अमर विरासत
महात्मा गांधी ने उन्हें ‘भारत कोकिला’ कहा, रविंद्रनाथ टैगोर ने ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ और इकबाल ने ‘हिंदुस्तान की बुलबुल’ की संज्ञा दी। यह सम्मान केवल उनके काव्य-संगीत के कारण नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना के कारण भी था जिसे उन्होंने अपनी लेखनी और वाणी दोनों से स्वर दिया।
Sarojini Naidu Life Journey: जन्म, परिवार और बहुभाषी प्रतिभा की नींव
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फ़रवरी 1879 को ब्रह्मनगर (अब बांग्लादेश) में हुआ। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक प्रख्यात शिक्षाविद् और वैज्ञानिक थे, जिन्होंने हैदराबाद कॉलेज की स्थापना की, जो आगे चलकर उस्मानिया विश्वविद्यालय बना। उनकी माता वरदसुंदरी देवी स्वयं कवयित्री थीं — यही कारण था कि साहित्यिक संस्कार उन्हें घर से ही मिले।
उनका परिवार बहुभाषी था — बंगला, हिंदी, तेलुगु और अंग्रेज़ी का समान प्रयोग होता था। प्रारंभिक दिनों में उन्हें अंग्रेज़ी बोलने में कठिनाई होती थी और वे उससे बचती थीं, पर वही बालिका आगे चलकर अंग्रेज़ी की विश्वप्रसिद्ध कवयित्री और वक्ता बनी — यह उनके व्यक्तित्व के अद्भुत विकास का प्रमाण है।
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Sarojini Naidu Life Journey: इंग्लैंड शिक्षा, प्रेम विवाह और निजी जीवन

प्रारंभिक शिक्षा चेन्नई में हुई। 1896 में उच्च शिक्षा के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजा गया, जहाँ उन्होंने किंग्स कॉलेज लंदन और कैम्ब्रिज में अध्ययन किया। हालांकि उन्होंने कोई औपचारिक उपाधि प्राप्त नहीं की और 1898 में भारत लौट आईं।
भारत लौटते ही उनका विवाह डॉ. गोविंद राजुलू नायडू से हुआ, जो उनसे आयु में बड़े थे। यह प्रेम विवाह उस दौर में सामाजिक साहस का उदाहरण था, विशेषकर एक कट्टर ब्राह्मण परिवार की युवती के लिए। उनकी पुत्री पद्मजा नायडू आगे चलकर पश्चिम बंगाल की राज्यपाल बनीं।
Sarojini Naidu Life Journey: राजनीति में प्रवेश और स्वतंत्रता संग्राम
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। 1903 से वे राजनीतिक सभाओं में भाषण देने लगीं और 1905 के स्वदेशी आंदोलन में पूर्ण रूप से सक्रिय हो गईं।
गोपाल कृष्ण गोखले उनके प्रारंभिक राजनीतिक मार्गदर्शक थे। 1914 में उनकी महात्मा गांधी से पहली भेंट हुई, जिसके बाद वे राष्ट्रीय आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में आ गईं।
1925 में उन्हें कानपुर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया — इस पद पर पहुँचने वाली वे पहली भारतीय महिला थीं। उनके ओजस्वी शब्द — “स्वाधीनता संग्राम में भय विश्वासघात है और निराशा पाप” — आज भी उद्धृत किए जाते हैं।
1930 के नमक सत्याग्रह में वे गांधीजी के साथ रहीं और कई बार गिरफ्तार भी हुईं। स्वतंत्रता के बाद वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनीं।
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Sarojini Naidu Life Journey: नारी जागरण की अग्रदूत
सरोजिनी नायडू केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि नारी चेतना की सशक्त आवाज़ भी थीं। उस समय जब महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर आना असामान्य माना जाता था, वे राजनीतिक सभाओं का नेतृत्व कर रही थीं।
1926 में उन्होंने अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना में भूमिका निभाई। उन्होंने शिक्षा, अधिकार और सामाजिक समानता पर लगातार कार्य किया। उनके भाषणों और लेखन में नारी अस्मिता का सशक्त स्वर मिलता है।
Sarojini Naidu Life Journey: काव्य साधना और साहित्यिक उत्कर्ष
उनकी काव्य प्रतिभा अल्पायु में ही प्रकट हो गई थी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1300 पंक्तियों की लंबी कविता “A Lady of the Lake” लिखी। उन्होंने 2000 पंक्तियों का काव्य नाटक भी रचा।
उनकी कविताओं पर अंग्रेज़ी रोमांटिक कवियों, विशेषकर जॉन कीट्स का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। प्रकृति, स्वप्न और सौंदर्य उनके काव्य के मुख्य तत्व रहे।
प्रमुख काव्य संग्रह:
• The Golden Threshold (1905)
• The Bird of Time (1912)
• The Broken Wing (1917)
• The Sceptred Flute (1937)
• Feather of the Dawn (1961, मरणोपरांत)
उनकी कविताओं में भारतीय संवेदना और पाश्चात्य शिल्प का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
Sarojini Naidu Life Journey: कविता में राष्ट्र, प्रकृति और नारी मन
उनकी कविताएँ केवल स्वप्निल नहीं थीं — उनमें राष्ट्र की धड़कन भी थी। पराधीन भारत की पीड़ा, स्वतंत्रता का स्वप्न और स्त्री मन की व्यथा — सब उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त हुए।
“Broken Wing” की कविताओं में स्त्री की सामाजिक बेड़ियों का मार्मिक चित्रण मिलता है। वहीं प्रकृति आधारित कविताएँ उनके रोमांटिक सौंदर्यबोध को प्रकट करती हैं।
Sarojini Naidu Life Journey: अंतिम समय और अमर विरासत
महात्मा गांधी की हत्या ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। इसी आघात के बाद उनका स्वास्थ्य गिरता गया और 2 मार्च 1949 को लखनऊ में उनका निधन हुआ।
वे केवल एक राजनेता या कवयित्री नहीं थीं — वे भारतीय चेतना की स्वर-प्रतिमा थीं।
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