सुरेंद्र किशोर(पदमश्री प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार)
- Communist in india: बेअसर होती वामपंथी विचार धारा
- Communist in india: नेपाल से लेकर आंध्र तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की कोशिश नाकाम
- Communist in india: भारत जैसे देश में सैन्य वाद की सफलता संभव नहीं
- Communist in india: बंगाल में बाहुबलियों को संरक्षण देने के साथ बांग्ला देशी घुसपैठियों को बढ़ावा
- Communist in india: मौजूदा बंगाल विधान सभा में माकपा का प्रतिनिधित्व शून्य है
- Communist in india: केरल में पीएफआई से रिश्ता घातक
Communist in india : कार्ल मार्क्स ने कहा था ,‘ईश्वर का शुक्र है कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूं।’ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने 1967 में उनसे मिलने गए भारत के नक्सली नेता कानू सान्याल और तीन अन्य से कहा था, ‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार काम करें।’ दुर्भाग्य से विभिन्न धाराओं में बंटे हमारे कम्युनिस्ट दलों और उनके नेताओं ने मार्क्स और माओ त्से तुंग की बातों पर अमल नहीं किया। नतीजतन गत सौ वर्षों में उन्होंने पाया कम और खोया अधिक। अब वे मुख्यतः केरल में प्रभावी रह गए हैं ।
Communist in india: बेअसर होती वामपंथी विचार धारा
अभी हाल में कुछ मजदूर संगठनों के साथ अधिकतर वामपंथी संगठनों ने केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में जब भारत बंद बुलाया तो उसका असर केवल केरल में ही दिखा। कुछ समय पहले जब भाकपा की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हुए तो देश में कोई हलचल नहीं हुई। यदि भाकपा ने देश के सामाजिक ताने -बाने और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए कार्य नीति बनाई होती तो आज वे इतने दुबले नहीं होते। भाकपा का विभाजन सन 1964 में हुआ और उससे टूट कर माकपा बनी। विभाजन का आधार कोई भारतीय समस्या नहीं बल्कि चीन के प्रति भाकपा के एक बड़े हिस्से का रुख था। 1967 में कम्युनिस्टों से निकले नक्सलियों ने नारा दिया–‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’ और ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’
Communist in india: नेपाल से लेकर आंध्र तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की कोशिश नाकाम
ऐसे नारे लगाने वाले अतिवादी कम्युनिस्टों की हिंसक जमात भी कई टुकड़ों में बंटी। दशकों तक नेपाल से लेकर आंध्र तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की कोशिश में हजारों जानें गईं। बीते कुछ समय से गृह मंत्री अमित शाह लगातार कह रहे हैं कि हम 31 मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद यानी माओवाद खत्म कर देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जिस गति से उनका दायरा सिमट रहा है ,उससे साफ है कि केंद्र सरकार अपने निर्धारित लक्ष्य को पाने में सफल हो सकती है। एक अनुमान के अनुसार माओवादी हिंसा के चलते देश में करीब 12 हजार लोगों की जानें जा चुकी हैं । इनमें नागरिक,सुरक्षाकर्मी और माओवादी हिंसक तत्व शामिल हैं।
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Communist in india: भारत जैसे देश में सैन्य वाद की सफलता संभव नहीं
माओ ने जब भारतीय कम्युनिस्टों से कहा था कि अपने देश की स्थिति के अनुसार काम करो तो अतिवादी को इसका आकलन करना चाहिए था कि भारत जैसे देश में सैन्य वाद की सफलता की कितनी गुंजाइश है ? भारत में एक मजबूत संसदीय शासन व्यवस्था है और सेना एवं अर्ध सैनिक बलों को पराजित करना संभव नहीं। भारत की स्थिति न तो 1917 के रूस जैसी थी न ही 1949 के चीन जैसी। 1917 में लेनिन और उनके दल ने हथियारों के बल पर रूस में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना की थी।
इसी तरीके से माओ त्से तुंग ने 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन कायम किया। हथियार उठाने की जगह भारत के अतिवादी कम्युनिस्ट लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़कर सफलता पा सकते थे,क्योंकि कभी उन्होंने बड़ी संख्या में युवकों को आकर्षित किया था। पर चुनाव लड़ने वाली भाकपा और माकपा भी अपनी गलत रणनीतियों और भारतीय समाज के बारे में अपनी नासमझी के कारण अंततः दुबली होती चली गई। बंगाल और त्रिपुरा से वाम मोर्चा का सफाया हो चुका है। अगले विधान सभा चुनाव में वाम मोर्चा को केरल में भी कड़ी चुनौती मिल सकती है।
Communist in india: बंगाल में बाहुबलियों को संरक्षण देने के साथ बांग्ला देशी घुसपैठियों को बढ़ावा
बंगाल में वाम मोर्चा सरकार ने शुरुआती दिनों में भूमि सुधार के क्षेत्र में अच्छे काम किये। पर उसके बाद उसने जो कुछ किया ,वह सब उत्पादक साबित नहीं हुआ। जन समर्थन बरकरार रखने के लिए उसने बड़े पैमाने पर स्थानीय बाहुबलियों को संरक्षण देने के साथ बांग्ला देशी घुसपैठियों को बढ़ावा दिया। उन्हें नाजायज तरीके से मतदाता बनाया। जब बांग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों के कारण बंगाल के सात जिलों में सामान्य प्रशासन चलाना कठिन हो गया तो मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने (सार्वजनिक रूप से ) गंभीर चिंता प्रकट की। नतीजतन अल्पंसंख्यक मतदाताओं ने थोकभाव से तृणमूल कांग्रेस को अपना लिया।
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Communist in india: मौजूदा बंगाल विधान सभा में माकपा का प्रतिनिधित्व शून्य है
हमारे कम्युनिस्ट दल इस्लामिक अतिवाद के खिलाफ अभियान को आम मुसलमानों के खिलाफ बताते हैं जबकि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी सरकार ने शिन जियांग प्रांत के अतिवादी उइगर मुसलमानों को बल पूर्वक काबू में रखा है। चीन का तर्क है कि हमारा क्षेत्र इस्लामिक अतिवाद से पीड़ित है और हमारा यह कर्तव्य है कि हम अपने इस इलाके को आतंकवाद से बचाएं। इधर भारत के कम्युनिस्ट वोट के लिए इस्लामिक अतिवादी तत्वों के प्रति नरम रहे हैं।
Communist in india: केरल में पीएफआई से रिश्ता घातक
एक समय केरल में वाम मोर्चा के कट्टरपंथी पीएफ आई से मधुर संबंध थे। जब केरल के डीजीपी ने सिफारिश की थी कि पीएफआई पर प्रतिबंध लगाया जाए तो वाम मोर्चे के मुख्य मंत्री ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया।जब पीएफआई ने बड़े पैमाने पर हिंसा की तो केरल हाईकोर्ट ने उसके सदस्यों की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। मजबूर होकर वाम सरकार ने ऐसा किया। इस पर केरल के मुस्लिम, वाम मोर्चा छोड़कर कांग्रेस की ओर चले गए। नतीजतन 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस को 20 में से 18 सीटें मिलीं।
अगले विधान सभा चुनाव में केरल में वाम दलों का भविष्य अनिश्चित है। लगभग पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट और इस्लामिस्ट आमने-सामने रहे हैं, पर भारत के कम्युनिस्ट ऐसे तत्वों के प्रति नरमी बरतते हैं।
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