विधानसभा चुनाव तारीखों की घोषणा के अगले दिन ही बड़े पैमाने पर शीर्ष अफसरों के तबादले के बाद से पश्चिम बंगाल में टकराव की राजनीति में और उबाल आ गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग पर हमलावरी मुद्रा में हैं। असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भी साथ ही चुनाव हो रहे हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल ही ऐसा राज्य है जहां चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक भी सबसे अधिक हैं और शीर्ष अधिकारियों के तबादले भी यहीं बड़ी संख्या में हुए हैं। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव पर देश और दुनिया की नजर टिकी है।
2011 में 184 सीटों के साथ अपनी सत्ता-यात्रा शुरू करने वाली टीएमसी ने 2021 में 213 सीटों के साथ जीत की हैट्रिक बनाई। ममता की सियासी पकड़ का अंदाजा बीते पांच सालों में हुए उपचुनावों के नतीजों से भी लगाया जा सकता है। लगभग हर उपचुनाव में टीएमसी या उसका समर्थित चेहरा ही जीतता रहा। 2016 में 3 सीटों से खाता खोलने वाली भाजपा भी 2021 के चुनाव में 77 के आंकड़े तक पहुंच गई। इस आंकड़े ने 2026 में भाजपा नेतृत्व के मन में भगवा लहराने की उम्मीद और उत्साह को बल प्रदान किया है।
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चुनाव की घोषणा हो चुकी है और एक बार फिर बंगाल की सियासत निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच सीधा मुकाबला इस चुनाव को सत्ता परिवर्तन की जंग के साथ-साथ वैचारिक, सामाजिक और संगठनात्मक शक्ति- परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है। एसआईआर में 58 लाख छंटे मतदाताओं का भविष्य अधरझूल में है। वहीं चुनावी हिंसा की आशंका के मद्देनजर अधिकारियों के तबादलों ने टीएमसी और भाजपा के बीच चुनावी जंग की तकरार को धार देने का काम किया है। वैसे चुनाव आचार संहिता लागू होने के साथ ही संबंधित राज्य में निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग को तबादले, पोस्टिंग और पर्यवेक्षक तैनाती के अधिकार मिल जाते हैं।
इस बार अगर टीएमसी को बहुमत मिलता है तो ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाएंगी। वहीं भाजपा, जिसने पिछले चुनाव में अभूतपूर्व उछाल दर्ज किया था, इस बार सत्ता हासिल करने के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है। बंगाल के चुनाव हमेशा से बहुस्तरीय रहे हैं। यहां जाति की बजाय वर्ग, संस्कृति, भाषा और पहचान की राजनीति अधिक प्रभावी रही है। इस बार भी वही प्रवृत्ति दिख रही है। लेकिन, राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय विमर्श पहले से अधिक तीखा है। भाजपा जहां ‘डबल इंजन सरकार’ के नारे के साथ केंद्र और राज्य में एकरूपता की बात कर रही है, वहीं टीएमसी ‘बंगाली अस्मिता’ और ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ की भावनात्मक अपील के साथ मैदान में है।
ममता सरकार दावा करती है कि उसने केन्द्र की उपेक्षा और सीमित संसाधनों के बावजूद सामाजिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा खड़ा किया है। एसआईआर, केंद्रीय एजेंसियों का कथित दुरुपयोग, महंगाई, हालिया रसोई गैस संकट और डॉलर के मुकाबले गिरता रुपया भाजपा के खिलाफ ज्वलंत मुद्दे हैं। इसके विपरीत भाजपा कानून व्यवस्था, बांग्लादेशी घुसपैठ, विकास, औद्योगीकरण और रोजगार को बड़ा मुद्दा बना रही है। उसका आरोप है कि बंगाल से उद्योगों का पलायन हुआ है और निवेश का माहौल कमजोर पड़ा है। भाजपा टीएमसी सरकार पर कट मनी, सिंडिकेट राज और शिक्षक भर्ती घोटाला को लेकर हमलावर है। पार्टी इसे शासन की विफलता के रूप में पेश कर रही है।
टीएमसी का कहना है कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बना रही है। मुख्यमंत्री तो इस मुद्दे पर सड़क पर हैं। वहीं, बंगाल की राजनीति में ‘बंगाली अस्मिता’ एक अहम मुद्दा बन गया है। टीएमसी इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा हिंदुत्व और राष्ट्रीय एकता के मुद्दों को उभार रही है। इस टकराव को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की 3.4 करोड़ महिला मतदाता इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। टीएमसी ने जहां 54 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है वहीं पार्टी महिला लक्षित योजनाओं जैसे ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’, ‘स्वास्थ्य साथी’ पर फोकस करती रही है। इन योजनाओं ने ग्रामीण और महिला मतदाताओं के बीच टीएमसी का मजबूत आधार तैयार किया है। भाजपा ने भी महिला सुरक्षा और रोजगार के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। युवा मतदाता रोजगार और अवसरों के सवाल पर दोनों दलों की परीक्षा लेंगे। मां, माटी और मानुष के मुद्दों पर राजनीति करने वाली ममता की रणनीति बहुस्तरीय है। उन्होंने स्थानीय नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित करते हुए टीएमसी का संगठन गांव-गांव तक फैलाने में कामयाबी हासिल की है। चुनावी संग्राम में ममता का जुझारू व्यक्तित्व टीएमसी की बड़ी ताकत बना है।
बंगाली अस्मिता का कार्ड दीदी का सबसे सशक्त चुनावी हथियार है। ‘बाहरी ताकतों’ के खिलाफ स्थानीय गौरव की भावना को उभारना टीएमसी की प्रमुख रणनीति है। हवाई चप्पल और खादी की साड़ी में ममता जहां बंगाल की राजनीति में सादगी की मिसाल बन गई हैं वहीं संघर्षशील नेता की उनकी छवि आम जनता से सीधे जुड़ी नजर आती है। हालांकि, टीएमसी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उसके नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भाजपा जमकर उछलती रही है। 15 साल की एंटी इनकम्बेंसी भी टीएमसी की राह को कठिन बना सकती है।
बंगाल के चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर चल रही भाजपा आक्रामक प्रचार अभियान के भरोसे मैदान में है। बहुत पहले से ही पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी के अन्य शीर्ष नेता लगातार रैलियां और रोड शो करते रहे हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों के जरिए मतदाताओं के ध्रुवीकरण की कोशिश भाजपा की मूल रणनीति का हिस्सा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सहयोग से भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में अपने संगठन का विस्तार किया है। फिर भी दागी चेहरे, स्थानीय नेतृत्व की कमी, आंतरिक गुटबाजी और बंगाली पहचान जैसे सवाल भाजपा के सामने भी हैं।
चुनाव की घोषणा होते ही ममता बनर्जी ने 74 सिटिंग एमएलए के टिकट काटने का साहसिक कदम उठाते हुए 294 में से 291 सीटों पर एक साथ प्रत्याशी घोषित कर सभी को चौंकाने का काम किया है। इस बार 47 मुस्लिम चेहरे टीएमसी के निशान पर भाग्य आजमाएंगे। एक जमाने में बंगाल में सत्ता सुख भोग चुके कांग्रेस और लेफ्ट इस चुनाव में हाशिये पर ही नजर आते हैं। कुछ सीटों पर इन दलों का वोट प्रतिशत परिणामों को प्रभावित कर सकता है। अगर विपक्षी वोट बंटता है तो इसका सीधा फायदा टीएमसी को मिलने की संभावना है। वहीं यदि ये दल कुछ क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करते हैं, तो उन सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय भी हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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हाल के ओपिनियन पोल में टीएमसी को बढ़त दिखाई गई है। टीएमसी को 43 से 45 फीसदी और भाजपा को 41 से 43 फीसदी वोट शेयर मिलने की उम्मीद जताई गई है। यह इस बात का संकेत है कि ममता बनर्जी की लोकप्रियता और उनकी योजनाओं का असर अभी भी कायम है। हालांकि, भाजपा भी कांटे की टक्कर में है। बंगाल की राजनीति में आखिरी समय तक बदलाव की संभावना हमेशा बनी रहती है। चुनाव नतीजे बहुत कुछ महिला मतदाताओं और पहली बार के मतदाताओं के मूड पर निर्भर रह सकते हैं। एक ओर ममता बनर्जी का स्थापित नेतृत्व है तो दूसरी ओर भाजपा की आक्रामक प्रचार शैली और बूथ प्रबंधन है। यदि टीएमसी चौथी बार सत्ता में लौटती है, तो यह ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ और रणनीतिक कौशल की पुष्टि होगी। वहीं यदि भाजपा सत्ता हासिल करती है, तो यह बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा।
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