ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद इतिहास ने भले ही एक नई करवट ली हो, लेकिन वहां कुछ परंपराएं जस की तस बनी रहीं। ऐसी ही एक परंपरा ईरानी नववर्ष नौरोज के आयोजन से जुड़ी हुई है, जिसे पलटने के लिए दबाव तो जरूर पड़ा, लेकिन वह कारगर नहीं रहा। वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही 21 मार्च को आरंभ होने वाला यह आयोजन 13 दिनों तक चलता है। इसी दौरान भारत में पारंपरिक नववर्ष, उगादी, गुड़ी पड़वा और चैत्र नवरात्र का उत्सव भी मनाया जाता है।
यह ईरानी और भारतीय संस्कृति के बीच कुछ समानताओं को भी दर्शाता है। देखा जाए तो इस साल नौरोज ईरान के लिए बहुत सुखद नहीं रहा, क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने उसके खिलाफ युद्ध छेड़ा हुआ है। निरंतर हमलों और शीर्ष नेताओं की मौत के बावजूद ईरानियों का हौसला डिगा नहीं है। संभव है कि इसके पीछे कर्बला की शहादत उनकी प्रेरणा बनी है। इस्लामिक क्रांति के दौरान अयातुल्ला खुमैनी यह नारा भी दिया करते थे कि ‘हर दिन आशूरा है और हर जगह कर्बला है।’ इसका सीधा अर्थ है कि हर दिन संघर्ष है और हर संघर्ष कर्बला की रणभूमि। अमेरिका इजरायल के विरुद्ध जारी इस लड़ाई में ईरानी इसी संकल्प के साथ प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरे हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली अमेरिकी सेना और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान को बहुत नुकसान पहुंचा है। पहले से ही तमाम प्रतिबंध झेल रहे ईरान के लिए इस युद्ध ने मुश्किलें और बढ़ाने का काम किया है। उसके परमाणु ठिकानों से लेकर संवेदनशील एवं रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केंद्रों को भी निशाना बनाया गया। उसके शीर्ष नेतृत्व का करीब-करीब सफाया हो गया है, जिसमें सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई से लेकर बेहद प्रभावशाली अली लारीजानी जैसे दिग्गज भी शामिल हैं।
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ऐसी परिस्थितियों में संभवत: कोई अन्य देश घुटने टेक चुका होता, पर ईरान ने जबरदस्त पलटवार किया। उसने इजरायल के उन ठिकानों पर भी हमले किए, जिनके बारे में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था। ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं ने बड़े-बड़े रणनीतिकारों को भी हैरान करने का काम किया। उसने होर्मुज जलमार्ग पर अपना नियंत्रण मजबूत कर आवाजाही को प्रभावित किया। साथ ही साथ खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों और उनकी परिसंपत्तियों को निशाना बनाकर अपने हौसले के साथ ही मारक क्षमता का प्रदर्शन कर एक तरह से हमलावरों को ही कुछ हद तक रक्षात्मक रुख अपनाने पर विवश कर दिया।
चूंकि अब यह युद्ध चौथे सप्ताह में प्रवेश कर गया है, इसलिए यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि यह किस दिशा में जा रहा है। यह सही है कि अमेरिका-इजरायल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को मार गिराया, लेकिन सत्ता के ढांचे में अपेक्षित परिवर्तन की उनकी मंशा न तो पूरी हो पाई है और न पूरी होती दिख रही है। उलटे जो नए नेता कमान संभाल रहे हैं, वे पुराने नेताओं से भी ज्यादा कट्टरता दिखा रहे हैं। ऐसे में यही देखना होगा कि हमलों में ईरानी नेताओं को जिस तरह चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, उससे नेतृत्व के स्तर पर कोई संकट पैदा होता है या यह सिलसिला कट्टरपंथी आवाजों को ही मजबूत करने का काम करेगा। जो भी हो, युद्ध रुकने के बाद भी बातचीत की डगर आसान नहीं दिखती। अमेरिका द्वारा वार्ता का दांव चलने की बात पर ईरानी खेमे की प्रतिक्रियाएं भी यही संकेत करती हैं।

एक हद तक यह संभव है कि अमेरिकी-इजरायली हमलों में ईरानी परमाणु कार्यक्रम की कमर टूट जाए और नौसेना निस्तेज पड़ जाए, लेकिन ईरान की ड्रोन एवं मिसाइल क्षमता ने खाड़ी देशों की सांसें अटका रखी हैं। इतना ही नहीं, हिंद महासागर स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया पर ईरानी मिसाइलों के वार ने भी दिखाया कि तेहरान कहां तक मार करने में सक्षम है। भले ही यह लड़ाई अमेरिका और इजरायल मिलकर लड़ रहे हों, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कई बिंदुओं पर असहमति भी उभरी है। ईरान के साउथ पार्स तेल एवं गैस क्षेत्र पर इजरायली हमले पर अमेरिका ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसे लेकर उसे विश्वास में नहीं लिया गया। बाद में भले ही नेतन्याहू ने ईरानी ऊर्जा परिसंपत्तियों को निशाना न बनाए जाने के संकेत दिए, लेकिन यह तो सामने आया ही कि इजरायल ने अपनी योजनाएं पूरी तरह साझा नहीं कीं। इस हमले से तिलमिलाए ईरान ने खाड़ी देशों के कई प्रमुख तेल एवं गैस क्षेत्रों पर हमले किए, जिसके बाद ऊर्जा संसाधनों की कीमतें आसमान चढ़ने लगीं।
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इस युद्ध में अमेरिका और नाटो सहयोगियों के बीच असहयोग भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है। होर्मुज जलमार्ग में आवाजाही को सुचारु बनाए रखने की ट्रंप की अपील को नाटो देशों ने कोई तवज्जो नहीं दी। केवल ब्रिटेन ही कुछ सीमित सहयोग के लिए आगे आया। वहीं, ईरान ने चतुराई भरा दांव चलते हुए कहा कि होर्मुज जलमार्ग केवल हमलावर देशों एवं उनके सहयोगियों को छोड़कर बाकी सबके लिए तो खुला है। ईरान ने अपने हमलों से उस अमेरिकी रक्षा कवच की सीमाएं भी उजागर कर दीं, जिसके भरोसे खाड़ी देश बैठे रहे। ईरान ने जता दिया कि उनके लिए अमेरिकी रक्षा कवच अभेद्य नहीं है। इस युद्ध से शिया और सुन्नी के बीच वैचारिक टकराव की खाई भी चौड़ी होती जा रही है।
इस पूरे संकट में संयुक्त राष्ट्र का मूकदर्शक बने रहना भी बड़े सवाल खड़े करता है। खाड़ी देशों और जॉर्डन पर ईरानी हमलों की निंदा के अलावा संयुक्त राष्ट्र सिर्फ खानापूर्ति ही करता दिखा है। ओमान सहित कुछ अन्य देश बीच-बचाव के लिए सक्रिय हैं, लेकिन अब युद्ध रोकने के लिए ईरान बहुत कड़ी शर्तें सामने रख रहा है। हाल-फिलहाल शांति के किसी स्वीकार्य समझौते पर बात बनती तो नहीं दिखती, लेकिन हम ऐसी उम्मीद तो कर ही सकते हैं। साल 1961 के बाद यह पहला मौका था जब ईद और नौरोज एक ही समय पर मनाए गए। कहना कठिन है कि क्या ऐसा दुर्लभ संयोजन इस क्षेत्र में युद्ध विराम का निमित्त बनकर क्षेत्र में शांति एवं खुशहाली ला सकता है?
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