बिहार की सियासत में ‘छोटी सरकार’ के नाम से मशहूर बाहुबली नेता अनंत सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। जेल से उनकी संभावित रिहाई को लेकर सियासी और कानूनी दुविधाओं का बाज़ार गर्म है।
हाल ही में एक मामले में उन्हें मिली राहत ने समर्थकों के बीच जश्न जैसा माहौल बना दिया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कानून की किताबों में तस्वीर अभी भी धुंधली है।
सवाल अब सीधा यह है कि क्या अनंत सिंह वाकई जेल की सलाखों से बाहर आ पाएंगे, या यह राहत महज़ सियासी तसल्ली भर है?
Anant Singh: एक मामले में राहत, बाकी मामलों में चुनौती
कानूनी जानकारों के अनुसार, अनंत सिंह की राह अभी आसान नहीं है। हाल ही मिली राहत केवल एक मामले तक सीमित है।
हालांकि यह राहत महत्वपूर्ण है, लेकिन आज भी उन पर हत्या, रंगदारी और आर्म्स एक्ट जैसे संगीन मामलों में आरोप हैं, जिनमें वे न्यायिक हिरासत का सामना कर रहे हैं।
कानून स्पष्ट है कि रिहाई तभी संभव है जब आरोपी को उन सभी मामलों में जमानत या बरी किया जाए, जिनमें वह अभी बंद है। केवल एक मामले में राहत मिलना, बाकी मामलों को अपने आप खत्म नहीं कर देता।
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Anant Singh: दो साल या अधिक की सजा — विधायकी को भी खतरा

अनंत सिंह के कानूनी संकट का सियासी आयाम भी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसी भी मामले में उन्हें दो साल या उससे अधिक की सजा सुनाई जाती है, तो उनकी विधायकी पर भी खतरे के बादल मंडरा सकते हैं।
मतलब यह कि मामला केवल जेल से बाहर आने का नहीं रहा — यह अब सियासी अस्तित्व और विधानसभा सदस्यता बचाने का भी संघर्ष बन चुका है।
चुनाव जीत — लेकिन शपथ नहीं
अजब सा यह राजनीतिक अध्याय है कि अनंत सिंह चुनाव तो जीत चुके हैं, लेकिन वे विधानसभा की शपथ नहीं ले पाए हैं।
कानून इस स्थिति पर अपनी शर्तें रखता है। एक निर्वाचित सदस्य को यथाशीघ्र शपथ लेनी चाहिए।
हालांकि, जेल में बंद सदस्य अदालत से विशेष अनुमति लेकर शपथ ग्रहण के लिए आ सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया भी उतनी सरल नहीं।
वहीं, बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई विधायक पांच साल तक बिना शपथ लिए रह सकता है?
Anant Singh: संविधान के प्रावधान — 60 दिनों की सीमा
संविधान के अनुच्छेद 190(4) के अनुसार, यदि कोई सदस्य बिना अनुमति 60 दिनों तक सदन की बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सीट रिक्त हो सकती है।
लेकिन अगर सदन स्वयं उसकी अनुपस्थिति को स्वीकार कर ले, तो तकनीकी तौर पर वे पद पर बने रह सकते हैं।
हालांकि, बिना शपथ लिए वे सदन की कार्यवाही में भाग नहीं ले सकते और न ही वोटिंग कर सकते हैं।
इस स्थिति से स्पष्ट है कि अनंत सिंह की राजनीतिक स्थिति अस्थिर और अस्थायी है, जब तक वे शपथ ग्रहण नहीं कर लेते या कानूनी संबंधों से पूरी तरह मुक्त नहीं होते।
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अदालत के अगले फैसले पर सबकी निगाहें
फिलहाल सबकी निगाहें अदालत के अगले फैसले पर टिकी हैं।
यदि अनंत सिंह को अन्य मामलों में भी जमानत मिलती है, तो संभव है कि वे न केवल जेल की बेड़ियों से बाहर आएं, बल्कि विधानसभा की देहरी भी लांघ सकें।
वरना बिहार की राजनीति एक ऐसे अनोखे अध्याय की गवाह बनेगी, जहाँ ‘छोटी सरकार’ सलाखों के पीछे रहकर ही अपना सियासी सफ़र पूरा करती दिखेगी।
Anant Singh: अनंत सिंह की राह मुश्किल, राजनीति का नया अध्याय
अनंत सिंह की स्थिति महज़ एक कानूनी संघर्ष नहीं है — यह राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती का मिश्रण है।
एक ओर वे सत्ता के नजदीक खड़े हैं, दूसरी ओर कानून की जटिल राहें उन्हें रोक रही हैं।
उनकी रिहाई का फैसला केवल एक व्यक्ति की आज़ादी का सवाल नहीं होगा — यह बिहार की राजनीति में वजूद, विधायकी की पवित्रता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती को भी परखेगा।
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