Aravalli Hills Crisis India: 100 मीटर के फैसले ने कैसे भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को मिटने की कगार पर ला खड़ा किया

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अरावली पर्वतमाला पर मंडराता पर्यावरणीय संकट
Highlights
  • • अरावली पर्वतमाला का ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्व • सुप्रीम कोर्ट का 29 दिसंबर 2025 का अहम आदेश • पर्वत की परिभाषा बदलने से बढ़ा दोहन • विकास बनाम पर्यावरण की असली लड़ाई • भविष्य के लिए चेतावनी और समाधान की जरूरत

अरावली की पहाड़ियां भारत के पश्चिमोत्तर हिस्से में फैली एक प्राचीन और ऐतिहासिक पर्वत श्रृंखला हैं। राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली तक विस्तृत यह पर्वतमाला केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित रखने वाली प्राकृतिक ढाल है। इसी श्रृंखला के एक छोर पर रायसीना हिल स्थित है, जहां देश की राजधानी बसी है, तो दूसरे छोर पर माउंट आबू जैसी प्रसिद्ध पर्वतीय पहचान मौजूद है। लगभग आठ सौ किलोमीटर लंबी यह पर्वतमाला रणथम्भौर और सरिस्का जैसे अभयारण्यों को भी अपने भीतर समेटे हुए है।

Aravalli Hills Crisis India और पर्यावरणीय महत्व

इस पर्वतमाला का पर्यावरणीय योगदान असंदिग्ध है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अरावली और इसके जंगलों ने राजस्थान के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोका है। यदि यह प्राकृतिक अवरोध न होता, तो बालू भरी आंधियां उत्तर भारत के बड़े हिस्से को कब का बंजर बना चुकी होतीं। मानसून की हवाएं इसी पर्वतमाला से टकराकर वर्षा का कारण बनती हैं। पर्वतीय दरारों से वर्षा का जल धरती में समाहित होकर भूजल स्तर को संतुलित करता है, जिससे कुएं, तालाब और जलस्रोत जीवित रहते हैं।

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Aravalli Hills Crisis India और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

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29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़े पूर्व के सभी फैसलों को स्थगित कर एक अहम कदम उठाया। अदालत ने विशेषज्ञों की एक टीम को अध्ययन रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया और 21 जनवरी को मामले की पुनः सुनवाई तय की। यह फैसला ऐसे समय आया, जब विकास के नाम पर इस पर्वतमाला का तेज़ी से दोहन हो रहा है। वर्षों से पर्यावरण से जुड़े संगठन इस मुद्दे को लेकर आंदोलनरत हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति रही, तो कुछ वर्षों में यह पर्वतमाला इतिहास बन जाएगी।

Aravalli Hills Crisis India में ‘विकास’ की असली तस्वीर

पत्थरों का अंधाधुंध खनन, सड़क निर्माण, सीमेंट उद्योग और रिहायशी बसावट—इन सभी ने मिलकर अरावली की नींव को खोखला किया है। मुनाफे की दौड़ में प्राकृतिक संतुलन की अनदेखी की जा रही है। सत्ता और व्यापार के गठजोड़ ने नैतिकता को पीछे छोड़ दिया है, जहां फैसले प्रकृति के हित में नहीं, बल्कि लाभ के आधार पर लिए जा रहे हैं।

Aravalli Hills Crisis India और पर्वत की बदली परिभाषा

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सभ्यता के नाम पर पर्वत की परिभाषा तक बदल दी गई। सौ मीटर ऊंचाई और पांच सौ मीटर क्षेत्रफल जैसी शर्तों ने व्यापारियों के लिए रास्ता खोल दिया। जमीन से मापी गई ऊंचाई ने प्राकृतिक संरचनाओं को कानूनी रूप से गैर-पर्वतीय घोषित कर दिया। इसी फैसले के खिलाफ लंबे समय से विरोध हो रहा था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने स्थगित किया है। यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

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Aravalli Hills Crisis India और भविष्य की चेतावनी

अंधाधुंध विकास के नाम पर पर्वतों की कटाई, जंगलों का विनाश, नदियों से छेड़छाड़ और प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। चौड़ी और चमकदार सड़कें देखने में प्रगति लगती हैं, लेकिन वास्तव में वे विनाश की रेखाएं खींच रही हैं। सीमेंट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं और असली जंगल समाप्त होते जा रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि असंतुलित विकास सभ्यताओं को समाप्त कर देता है। फतेहपुर सीकरी इसका उदाहरण है, जहां संसाधनों की अनदेखी ने राजधानी को वीरान कर दिया। आज अरावली वही चेतावनी दे रही है। पर्यावरण केवल विषय नहीं, बल्कि आज की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। दिल्ली की जहरीली हवा और सूखते जलस्रोत इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। समय रहते नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

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