बांग्लादेश की राजनीति के इतिहास में एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया है। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख खालिदा जिया का मंगलवार सुबह ढाका में निधन हो गया। 80 वर्षीय खालिदा जिया पिछले करीब 20 दिनों से गंभीर रूप से बीमार थीं और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। मंगलवार सुबह लगभग 6 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि परिवार और पार्टी नेताओं ने की है।
- Bangladesh Politics : कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं खालिदा जिया
- Bangladesh Politics : संघर्ष, आंदोलन और सत्ता संघर्षों से भरा राजनीतिक जीवन
- Bangladesh Politics : हमलों और जानलेवा घटनाओं से भी नहीं टूटीं
- Bangladesh Politics : भारत को लेकर टकरावपूर्ण रुख
- Bangladesh Politics : खालिदा जिया का जाना, एक राजनीतिक युग का अंत
खालिदा जिया के निधन से न केवल बांग्लादेश बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति में भी शोक की लहर दौड़ गई है। उन्हें एक मजबूत, जुझारू और विवादों में घिरी नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिनका राजनीतिक जीवन संघर्षों, टकरावों और सत्ता संघर्षों से भरा रहा।
Bangladesh Politics : कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं खालिदा जिया
पार्टी सूत्रों के अनुसार, खालिदा जिया लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थीं। उन्हें सीने में संक्रमण, लीवर और किडनी संबंधी समस्याएं, डायबिटीज, गठिया और आंखों से जुड़ी दिक्कतें थीं। पिछले कुछ सप्ताह से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, जिसके बाद उन्हें ढाका के एवर केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
मेडिकल बोर्ड के सदस्य जियाउल हक के मुताबिक, खालिदा जिया को नियमित किडनी डायलिसिस की जरूरत पड़ रही थी। सोमवार देर रात उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई और तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
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Bangladesh Politics : संघर्ष, आंदोलन और सत्ता संघर्षों से भरा राजनीतिक जीवन
खालिदा जिया का राजनीतिक सफर आसान नहीं रहा। 1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक वह दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। उनके शासनकाल में देश की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे। विरोधियों के हमले, आंदोलनों और सत्ता संघर्षों के बावजूद उन्होंने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया।
1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना ने खालिदा जिया को नजरबंद कर लिया था। वह जुलाई से दिसंबर 1971 तक कैद में रहीं। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की हार के बाद उनकी रिहाई हुई। यह अनुभव उनके राजनीतिक सोच और दृष्टिकोण पर गहरा असर डाल गया।
Bangladesh Politics : पति जियाउर रहमान की हत्या ने बदली जीवन की दिशा
1981 में खालिदा जिया के पति और बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की एक सैन्य तख्तापलट में हत्या कर दी गई। यह घटना खालिदा जिया के जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई। इसके बाद उन्होंने सैन्य शासन के खिलाफ खुलकर संघर्ष शुरू किया और लोकतंत्र की बहाली के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई।
1990 में तानाशाही शासन के पतन में खालिदा जिया की भूमिका को आज भी बांग्लादेश की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।
Bangladesh Politics : हमलों और जानलेवा घटनाओं से भी नहीं टूटीं
खालिदा जिया पर कई बार जानलेवा हमले भी हुए। वर्ष 2015 में ढाका में मेयर चुनाव के प्रचार के दौरान उनके काफिले पर गोलीबारी और पत्थरबाजी की गई थी। हालांकि, वह इस हमले में बाल-बाल बच गईं। इन घटनाओं ने उनकी छवि को और मजबूत किया और समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी।
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Bangladesh Politics : भारत को लेकर टकरावपूर्ण रुख
खालिदा जिया की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिनका भारत को लेकर रुख हमेशा सख्त और टकरावपूर्ण रहा। उनका मानना था कि बांग्लादेश की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने भारत को बांग्लादेश की जमीन से होकर पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने के लिए रास्ता देने का विरोध किया। उनका तर्क था कि इससे बांग्लादेश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
Bangladesh Politics : भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि का विरोध
खालिदा जिया ने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि को आगे बढ़ाने का भी विरोध किया। उनका कहना था कि यह संधि बांग्लादेश को कमजोर बनाती है। उनकी पार्टी BNP का भी यही मानना था कि देश को किसी भी बाहरी दबाव से मुक्त रहना चाहिए। 2018 की एक रैली में उन्होंने यहां तक कहा था कि बांग्लादेश को किसी अन्य देश का राज्य नहीं बनने दिया जाएगा।
Bangladesh Politics : खालिदा जिया का जाना, एक राजनीतिक युग का अंत
खालिदा जिया का निधन बांग्लादेश की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनकी प्रतिद्वंद्विता पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ दशकों तक चली और यही टकराव बांग्लादेश की राजनीति की धुरी बना रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खालिदा जिया और शेख हसीना के बीच चली लंबी राजनीतिक लड़ाई ने बांग्लादेश की लोकतांत्रिक राजनीति को आकार दिया। खालिदा जिया के जाने से यह अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।
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