लेखक-विश्वनाथ सचदेव (वरिष्ठ पत्रकार)
- BBC Reporter Mark Tully: बीबीसी की विश्वसनीयता बनाने में टली की महत्वपूर्ण भूमिका
- BBC Reporter Mark Tully: आज की पत्रकारिता की स्थिति जैसी है, वैसी क्यों है?
- BBC Reporter Mark Tully: ईमानदारी ही मीडिया के कद को नापती है
- BBC Reporter Mark Tully: मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत
- BBC Reporter Mark Tully:जब सरकार ने उन्हें भारत छोड़ने का आदेश दिया
BBC Reporter Mark Tully: भारत में बीबीसी के पूर्व संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार सर मार्क टली का पिछले रविवार को नई दिल्ली में निधन हो गया। उनकी आयु 90 साल थी। बीबीसी से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया। वह अपनी पीढ़ी के शायद सबसे महान रेडियो पत्रकार थे, जिन्होंने भारत को दुनिया तक पहुंचाया और बीबीसी को भारत में वह विश्वसनीयता दिलाई, जो कभी उसके पास थी। वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव का यह लेख महान पत्रकार की यादों के संजोए हुए पत्रकारिता जगत और भारतीय समाज के लिए उनके योगदान की व्याख्या करता है।
BBC Reporter Mark Tully: बीबीसी की विश्वसनीयता बनाने में टली की महत्वपूर्ण भूमिका
यह मेरा दुर्भाग्य ही है कि मुझे बीबीसी के भारत स्थित संवाददाता स्वर्गीय मार्क टली से मिलने का कभी अवसर नहीं मिला, पर हकीकत यह भी है कि मैं पिछले चार-पांच दशकों में उनसे अक्सर मिलता रहा हूं। यह मिलना बीबीसी रेडियो के माध्यम से होता था। दशकों से रेडियो बीबीसी विश्वसनीय खबरों का एक पर्याय बन चुका हुआ था, और मेरे जैसे लाखों-करोड़ों श्रोता बीबीसी के माध्यम से ही खबरों की विश्वसनीयता परखा करते थे। बीबीसी को यह श्रेय जहां संस्थान की रीति-नीति के कारण मिलता था, वहीं सर मार्क टली जैसे सजग और ईमानदार पत्रकारों ने बीबीसी की विश्वसनीयता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।
BBC Reporter Mark Tully: आज की पत्रकारिता की स्थिति जैसी है, वैसी क्यों है?
आज मार्क टली हमारे बीच नहीं हैं। भारत में ही जन्मे सर टली के निधन से ईमानदार पत्रकारिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण हमारे बीच से उठकर चला गया। वे चाहते थे कि उनका निधन भारत में ही हो और यह संयोग मात्र नहीं है कि भारत के बनते इतिहास का यह साक्षी अपनी जन्मभूमि से ही विदा हुआ। आज जब रेडियो के माध्यम से समय की सच्चाई जानने वाले श्रोता उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, तो उस व्यक्ति के साथ ही उस पत्रकारिता की बात भी होनी चाहिए, जिसके लिए वह जाना जाता रहा। और यह अवसर इस बात का भी है कि हम पत्रकारिता, विशेषकर भारत की पत्रकारिता के बारे में भी सोचें, यह आकलन करने की कोशिश करें कि आज हमारी पत्रकारिता की स्थिति क्या है, और जैसी है, वैसी क्यों है?
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BBC Reporter Mark Tully: ईमानदारी ही मीडिया के कद को नापती है
अच्छी और सच्ची पत्रकारिता की शायद सबसे बड़ी कसौटी यह है कि विश्वसनीयता के संदर्भ में वह कहां ठहरती है। था एक ज़माना जब यह माना जाता था कि अखबार में यदि कुछ छपा है तो वह सही ही होगा, जो अखबार जितनी ज़्यादा तटस्थ और सही खबरें देता था, वह उतना ही बेहतर माना जाता था। अब जबकि अखबार के साथ टेलीविजन और सोशल मीडिया भी खबरों की दुनिया का हिस्सा, प्रमुख हिस्सा कहा जाना चाहिए, बन गया है, तो विश्वसनीयता का महत्व और बढ़ जाता है। जिसकी जितनी ज़्यादा पहुंच है, उससे उतनी ही ज़्यादा ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। यह ईमानदारी ही मीडिया के कद को नापती है।
BBC Reporter Mark Tully: मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत
मुझे याद है जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या हुई तो राजीव गांधी दिल्ली से बाहर (बंगाल में) थे। तब उन्होंने बीबीसी रेडियो के माध्यम से ही समाचार की पुष्टि की थी। ज्ञातव्य है कि ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) ने तो शाम छह बजे तक उनकी मृत्यु की आधिकारिक घोषणा नहीं की थी। कारण कुछ भी बताये जायें, पर यह हकीकत अपनी जगह है कि राजीव गांधी को तब इंग्लैंड का बीबीसी रेडियो ही विश्वसनीय लगा था। यह तथ्य जहां बीबीसी के महत्व को दर्शाता है, वहीं इस बात को भी रेखांकित करता है कि मीडिया की विश्वसनीयता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। यह दुर्भाग्य ही है कि आज हमारा रेडियो सरकारी सूचनाओं का भोंपू बनकर रह गया है! दुर्भाग्य यह भी है कि आज हमारे मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विश्वसनीयता के संकट का शिकार हो गया है।
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BBC Reporter Mark Tully:जब सरकार ने उन्हें भारत छोड़ने का आदेश दिया
लगभग आधी सदी पहले जब 1975 में देश में आपातकाल लागू किया गया था तो उसका सबसे बुरा असर मीडिया पर ही पड़ा था। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गयी थी, कुछ भी छापने से पहले सरकारी एजेंसियों से अनुमति लेनी होती थी। उस कठिन समय में जिन गिने-चुने साहसी पत्रकारों ने सरकार के इस आदेश का पालन करने से इनकार किया, उनमें बीबीसी रेडियो के भारत स्थित संवाददाता मार्क टली का नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जाता है। तब उन्हें चौबीस घंटे में भारत छोड़कर जाने का आदेश तत्कालीन सरकार ने दिया था। सरकार के आगे घुटने टेकने के बजाय मार्क टली ने अपने देश लौट जाना बेहतर समझा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और पत्रकारिता की विश्वसनीयता को बनाये रखने के लिए वे इंग्लैंड लौट गये। पर सरकार उनकी वाणी पर प्रतिबंध नहीं लगा पायी थी। लंदन में रहते हुए भी वह भारत स्थित अपने सूत्रों से सही सूचनाएं प्राप्त करते रहे— भारत समेत दुनिया भर के श्रोताओं तक उन्हें पहुंचाते रहे।
यह सही है कि उस काल की भारत की पत्रकारिता पर अपयश के काले धब्बे लगे थे। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने तब कहा था, ‘जब हमारे पत्रकारों को घुटने टेकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे थे।’ पर सच यह भी है कि उस स्थिति के लिए सिर्फ पत्रकार ही दोषी नहीं थे, पत्रकारों से कहीं ज़्यादा डर तब मीडिया-मालिकों, प्रबंधकों को था। लेकिन यह कथित विवशता आपातकाल में हमारी पत्रकारिता पर लगे धब्बों को नहीं मिटा सकती। दुर्भाग्य की बात तो यह भी है कि आज भी हमारी पत्रकारिता पर विश्वसनीयता का संकट मंडरा रहा है। मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा आज ‘गोदी मीडिया’ कहलाता है। यह स्थिति निश्चित रूप से चिंताजनक है।
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