Bihar Holi Special: 200 साल पुरानी Banagaon Ghumaur Holi की अद्भुत परंपरा, कंधों पर चढ़कर खेली जाती है होली

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सहरसा के बनगांव में कंधों पर चढ़कर खेली जाने वाली घुमौर होली
Highlights
  • • 1810 में शुरू हुई घुमौर होली • कंधों पर चढ़कर खेली जाती है होली • हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल • तीन दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव

राधा-कृष्ण की लीलाओं के लिए मशहूर बरसाना की लठमार होली अगर आपने देखी है, तो बिहार के सहरसा जिले का बनगांव आपको उसी आध्यात्मिक और रंगमय भाव में डूबा हुआ नजर आएगा। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां लठ नहीं चलते, बल्कि लोग एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर होली खेलते हैं। यही अनोखी परंपरा इसे देशभर में खास पहचान दिलाती है।

सहरसा के बनगांव की ‘घुमौर होली’ कोई नई परंपरा नहीं, बल्कि इसकी जड़ें वर्ष 1810 से जुड़ी हैं। करीब 200 साल पहले संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने इसकी शुरुआत की थी। आज भी यह परंपरा न सिर्फ जीवित है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे का मजबूत प्रतीक बनी हुई है।

Bihar Holi Special: Banagaon Ghumaur Holi का 1810 से जुड़ा इतिहास

बनगांव की घुमौर होली की शुरुआत संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने की थी। उस समय गांव में आपसी एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने के उद्देश्य से इस अनोखे आयोजन की नींव रखी गई।

समय बीतता गया, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन परंपरा जस की तस बनी रही। आज भी होली के दिन गांव के अलग-अलग हिस्सों से टोली बनाकर लोग निकलते हैं। “होली है…” के जयघोष के साथ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर रंग खेलना यहां की सबसे खास पहचान है।

डिहली बंगला, बंगला गाछी, ललित झा बंगला, मयूरी खां आड़, मनसाराम खां दरवाजा, विषहरी स्थान और खोखा बाबू चौक जैसे चिन्हित स्थानों पर लोग जुटते हैं। हर जगह रंग और पानी की फुहारें बहती रहती हैं और लोग गले मिलकर शुभकामनाएं देते हैं।

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Bihar Holi Special: कंधों पर चढ़कर खेलने की परंपरा क्यों है खास?

घुमौर होली की सबसे बड़ी विशेषता है—कंधों पर चढ़कर गोल-गोल घूमते हुए रंग खेलना।

गांव के सभी प्रमुख स्थलों पर होली खेलने के बाद हजारों लोग भगवती स्थान परिसर पहुंचते हैं। वहां मंदिर के ऊपर लगे फव्वारे से पानी की बारिश होती रहती है और नीचे लोग गोल घेरा बनाकर घूमते रहते हैं। इसी “घूमने” की परंपरा से इसका नाम पड़ा—घुमौर होली।

यह दृश्य इतना अद्भुत होता है कि पहली बार देखने वाला मंत्रमुग्ध रह जाता है। यहां न ऊंच-नीच का भेद दिखता है, न जाति और धर्म का अंतर। हिंदू, मुस्लिम सहित सभी समुदायों के लोग मिलकर इस पर्व को मनाते हैं।

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Banagaon Ghumaur Holi: सौहार्द और भाईचारे का संदेश

Bihar Holi Special: 200 साल पुरानी Banagaon Ghumaur Holi की अद्भुत परंपरा, कंधों पर चढ़कर खेली जाती है होली 1

बनगांव की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है।

यहां लोग अपने सारे बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे को कंधों पर उठाते हैं। यह प्रतीक है विश्वास और अपनत्व का। होली के अंत में सभी लोग बाबाजी कुटी जाकर गोसाईं जी और अन्य देवी-देवताओं को प्रणाम करते हैं।

परंपरा के अनुसार, सामान्य तौर पर फाल्गुन पूर्णिमा को सम्मत जलाया जाता है और चैत्र प्रतिपदा को होली खेली जाती है। लेकिन बनगांव में पूर्णिमा के दिन ही होली खेली जाती है और बाद में शास्त्रीय समयानुसार सम्मत दहन होता है।

इस वर्ष जहां शहर में 4 मार्च को होली मनाई जाएगी, वहीं बनगांव में 2 मार्च को ही यह पर्व मनाया जाएगा।

Bihar Holi Special: तीन दिवसीय होली महोत्सव का आकर्षण

बनगांव की होली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए बिहार सरकार का कला संस्कृति विभाग यहां तीन दिवसीय होली महोत्सव का आयोजन करता है।

हर दिन अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लोक गायन, नृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियां माहौल को और भी रंगीन बना देती हैं। इस बार मुख्य आकर्षण लोक गायिका देवी की प्रस्तुति होगी, जिसे सुनने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

बनगांव की घुमौर होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि 200 वर्षों से चली आ रही सामाजिक एकता की परंपरा है। यहां कंधों पर चढ़कर खेली जाने वाली होली यह संदेश देती है कि जब हम एक-दूसरे को उठाते हैं, तभी समाज मजबूत बनता है।

बरसाना की लठमार होली की तरह बनगांव की घुमौर होली भी अपनी अलग पहचान रखती है। फर्क बस इतना है कि यहां लाठियां नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास के कंधे रंगों से भीगते हैं।

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