बिहार की राजनीति धीरे-धीरे एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां अब सवाल यह नहीं रह गया है कि सत्ता किसके हाथ में है, बल्कि यह है कि नीतीश कुमार के बाद बिहार का चेहरा कौन होगा। दो दशकों से ज्यादा समय तक बिहार की राजनीति को संतुलन, गठबंधन और प्रशासनिक नियंत्रण के जरिए साधने वाले नीतीश कुमार आज भी मुख्यमंत्री हैं, लेकिन सियासी गलियारों में यह मान्यता मजबूत होती जा रही है कि उनका दौर अब ढलान की ओर है।
- Bihar Politics: नववर्ष संदेश में राजनीति नहीं, लेकिन सवाल और गहरे
- Bihar Politics: नीतीश कुमार के बाद सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, एक पूरा युग बदलेगा
- Bihar Politics: चुनाव के बाद तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति क्यों बनी मुद्दा?
- Bihar Politics: क्या तेजस्वी अब सिर्फ उत्तराधिकारी नहीं, दावेदार हैं?
- Bihar Politics: लालू यादव की विरासत—ताकत भी, बोझ भी
- Bihar Politics: गठबंधन की राजनीति में नेतृत्व की परीक्षा
- Bihar Politics: बीजेपी बनाम तेजस्वी—असली मुकाबला यहीं होगा
- Bihar Politics: अवसर भी, जोखिम भी, चुनौती भी
इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है—तेजस्वी यादव। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब बेहद जटिल—क्या तेजस्वी यादव उस राजनीतिक शून्य को भर पाएंगे, जो नीतीश कुमार के बाद बिहार की राजनीति में पैदा होगा?
Bihar Politics: नववर्ष संदेश में राजनीति नहीं, लेकिन सवाल और गहरे
नववर्ष 2026 के मौके पर बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए एक भावनात्मक और सकारात्मक संदेश साझा किया। उनके संदेश में नए संकल्प, नई ऊर्जा और नई उम्मीदों की बात जरूर थी, लेकिन बिहार की राजनीति या भविष्य के संकेतों पर कोई चर्चा नहीं थी।
यही चुप्पी राजनीतिक जानकारों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गई है। जिस समय बिहार की राजनीति ‘पोस्ट-नीतीश’ दौर में प्रवेश कर रही है, उस समय तेजस्वी यादव का सार्वजनिक रूप से राजनीतिक दिशा पर कुछ न कहना, कई तरह के सवाल खड़े करता है।
यह भी पढ़े : https://livebihar.com/cigarette-tobacco-tax-hike-excise-duty-2026/
Bihar Politics: नीतीश कुमार के बाद सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, एक पूरा युग बदलेगा

नीतीश कुमार के बाद बिहार की राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन का मामला नहीं होगी। यह उस राजनीति के अंत का संकेत होगा, जो वर्षों तक जातीय संतुलन, गठबंधन की समझ और केंद्र-राज्य समीकरण पर टिकी रही।
नीतीश कुमार ने जिस तरह भाजपा, राजद और कांग्रेस के बीच संतुलन साधा, जिस तरह सामाजिक समीकरणों को संभालते हुए प्रशासनिक छवि बनाए रखी—उनके जाने के बाद बिहार को स्पष्ट नेतृत्व के अभाव से जूझना पड़ सकता है। यही वह खाली जगह है, जहां सबसे पहले तेजस्वी यादव का नाम लिया जा रहा है।
Bihar Politics: चुनाव के बाद तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति क्यों बनी मुद्दा?
बिहार चुनाव परिणाम के बाद तेजस्वी यादव का राजनीतिक परिदृश्य से लगभग गायब रहना विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बना। सदन में 1-2 दिसंबर को उपस्थिति के बाद 3 दिसंबर से उनका लगातार गैरहाजिर रहना और परिवार के साथ यूरोप यात्रा पर जाना, उस वक्त हुआ जब आरजेडी को शायद सबसे ज्यादा सक्रिय नेतृत्व की जरूरत थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वह समय था जब तेजस्वी को विपक्ष का चेहरा बनकर उभरना चाहिए था। नीतीश कुमार के बाद के खालीपन पर बहस शुरू हो चुकी है और ऐसे समय में दूरी बनाना उनके लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।
Bihar Politics: क्या तेजस्वी अब सिर्फ उत्तराधिकारी नहीं, दावेदार हैं?
तेजस्वी यादव अब केवल लालू प्रसाद यादव के बेटे या पारंपरिक उत्तराधिकारी नहीं रह गए हैं। दो बार उपमुख्यमंत्री रहने का अनुभव, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका और युवाओं के बीच मजबूत पहचान—ये सभी उन्हें सत्ता का एक गंभीर दावेदार बनाते हैं।
लेकिन राजनीति केवल अनुभव से नहीं चलती, विश्वास से चलती है। राजनीतिक जानकारों की नजर में तेजस्वी की छवि अभी भी दो ध्रुवों के बीच झूल रही है—एक तरफ रोजगार, शिक्षा और विकास की बात करने वाला युवा नेता, दूसरी ओर आरजेडी के पुराने दौर की स्मृतियां।
Bihar Politics: लालू यादव की विरासत—ताकत भी, बोझ भी
तेजस्वी यादव की राजनीति का सबसे जटिल पहलू यही है कि वे लालू यादव की विरासत के वारिस भी हैं और उसी विरासत का बोझ भी ढो रहे हैं। एक वर्ग आज भी लालू यादव को सामाजिक न्याय का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा वर्ग आरजेडी को अराजकता और अव्यवस्था से जोड़कर देखता है।
‘जंगलराज’ की छवि पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ऐसे में तेजस्वी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे यह साबित करें कि यह आरजेडी अतीत की नहीं, भविष्य की पार्टी है।
Bihar Politics: गठबंधन की राजनीति में नेतृत्व की परीक्षा
तेजस्वी यादव को सत्ता तक पहुंचने के लिए गठबंधन की राजनीति पर निर्भर रहना ही होगा। कांग्रेस, वाम दल और अन्य सहयोगियों के साथ संतुलन बनाना आसान नहीं है। गठबंधन का हिस्सा बनना और गठबंधन का नेतृत्व करना—दोनों में बड़ा फर्क है।
पोस्ट-नीतीश बिहार में तेजस्वी को सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता भी दिखानी होगी। यदि यह संतुलन बिगड़ा, तो पूरी रणनीति कमजोर पड़ सकती है।
Do Follow us. : https://www.facebook.com/share/1CWTaAHLaw/?mibextid=wwXIfr
Bihar Politics: बीजेपी बनाम तेजस्वी—असली मुकाबला यहीं होगा
नीतीश कुमार के बाद बिहार की राजनीति में असली टकराव भाजपा और तेजस्वी यादव के बीच होगा। भाजपा खुद को स्थिर, अनुशासित और केंद्र से जुड़े विकल्प के रूप में पेश करेगी, जबकि तेजस्वी यादव स्थानीय, युवा और रोजगार-केंद्रित राजनीति को आगे रखेंगे।
भाजपा की रणनीति तेजस्वी के अनुभव, बैगेज और क्षमता पर सवाल उठाने की होगी, वहीं तेजस्वी की चुनौती भाजपा को बिहार की जमीनी समस्याओं से दूर दिखाने की होगी।
Bihar Politics: युवा मतदाता तय करेंगे पोस्ट-नीतीश बिहार
पोस्ट-नीतीश बिहार में सबसे बड़ा बदलाव मतदाताओं की सोच में दिखेगा। नए मतदाता नीतीश युग को याद नहीं करते। उनके लिए सवाल सीधा है—नौकरी मिलेगी या नहीं, पलायन रुकेगा या नहीं।
अगर तेजस्वी यादव इस वर्ग को भरोसे में ले पाते हैं और यह साबित कर पाते हैं कि यह आरजेडी 1990 की नहीं, 2026 की है, तो वे पोस्ट-नीतीश बिहार के सबसे मजबूत दावेदार बन सकते हैं।
Bihar Politics: अवसर भी, जोखिम भी, चुनौती भी
पोस्ट-नीतीश बिहार तेजस्वी यादव के लिए एक साथ अवसर, जोखिम और चुनौती है। अगर वे सिर्फ विरासत पर टिके रहे, तो खाली जगह और बड़ी हो जाएगी। लेकिन अगर वे खुद को शासन का भरोसेमंद चेहरा साबित कर पाए, तो बिहार की राजनीति एक नई दिशा ले सकती है।
आखिर में सवाल वही है—
क्या तेजस्वी यादव पोस्ट-नीतीश बिहार के लिए तैयार हैं?
Do Follow us. : https://www.youtube.com/results?search_query=livebihar

