बिहार की राजनीति में एक बार फिर सियासी और सांस्कृतिक दुनिया के टकराव की कहानी सामने आई है। भोजपुरी सिनेमा और संगीत जगत के चर्चित चेहरे रितेश पांडे ने राजनीति से खुद को अलग करने का फैसला कर लिया है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने भावुक संदेश में उन्होंने जनसुराज पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देने की जानकारी दी, जिसने बिहार की राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है।
- Bihar Politics: सोशल मीडिया पोस्ट से हुआ इस्तीफे का खुलासा
- Bihar Politics: करगहर सीट से चुनाव और हार का अनुभव
- Bihar Politics: ‘किसान परिवार का लड़का’ और जनता से भावनात्मक रिश्ता
- Bihar Politics: सक्रिय राजनीति से दूरी क्यों जरूरी लगी
- Bihar Politics: खेसारी लाल के बाद एक और कलाकार की राजनीतिक विदाई
- Bihar Politics: आगे क्या करेंगे रितेश पांडे?
रितेश पांडे का यह कदम सिर्फ एक कलाकार का राजनीतिक सफर खत्म होना नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या लोकप्रियता और जन समर्थन राजनीति में स्थायी आधार बन पाते हैं। हाल के वर्षों में कई भोजपुरी कलाकार राजनीति में आए, लेकिन चुनावी नतीजों ने उनके सपनों को झटका दिया।
Bihar Politics: सोशल मीडिया पोस्ट से हुआ इस्तीफे का खुलासा
रितेश पांडे ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में बेहद सधे और भावनात्मक शब्दों में अपने फैसले को सार्वजनिक किया। उन्होंने लिखा कि एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक होने के नाते उन्होंने जनसुराज पार्टी से जुड़कर लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लिया। चुनावी परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहे, लेकिन उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से प्रयास किया।
उनके इस बयान से यह साफ झलकता है कि राजनीति में आने का फैसला किसी मजबूरी या अवसरवाद से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी की भावना से लिया गया था। हालांकि चुनावी हार के बाद भी उनके शब्दों में कोई कड़वाहट नहीं दिखी, बल्कि आत्ममंथन और स्पष्टता नजर आई।
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Bihar Politics: करगहर सीट से चुनाव और हार का अनुभव

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में रितेश पांडे जनसुराज पार्टी की ओर से करगहर विधानसभा सीट से मैदान में उतरे थे। चुनावी प्रचार के दौरान उनकी लोकप्रियता और जनसभाओं में भीड़ ने यह संकेत जरूर दिया था कि मुकाबला दिलचस्प रहेगा, लेकिन मतगणना के दिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए।
इस हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि मनोरंजन जगत की लोकप्रियता और राजनीतिक जमीन पर पकड़, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। चुनावी अनुभव ने रितेश पांडे को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सक्रिय राजनीति में रहते हुए वे उस सेवा को पूरी तरह नहीं निभा पा रहे हैं, जिसके लिए जनता ने उन्हें पहचाना।
Bihar Politics: ‘किसान परिवार का लड़का’ और जनता से भावनात्मक रिश्ता
अपने इस्तीफे के संदेश में रितेश पांडे ने अपने संघर्षपूर्ण सफर का जिक्र किया। उन्होंने खुद को एक मामूली किसान परिवार का बेटा बताया, जिसे जनता ने प्यार, दुलार और सम्मान देकर इस मुकाम तक पहुंचाया। यही वजह है कि उन्होंने आगे भी जनता की सेवा उसी माध्यम से जारी रखने की बात कही, जिससे वे लोगों के दिलों तक पहुंचे।
उनका यह बयान बताता है कि वे राजनीति को सेवा का एकमात्र रास्ता नहीं मानते। उनके अनुसार, कला और संस्कृति के जरिए भी समाज से जुड़कर योगदान दिया जा सकता है, और शायद यही रास्ता उन्हें ज्यादा सच्चा और प्रभावी लगता है।
Bihar Politics: सक्रिय राजनीति से दूरी क्यों जरूरी लगी
रितेश पांडे ने साफ शब्दों में कहा कि किसी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य रहते हुए स्वतंत्र रूप से काम करना बेहद मुश्किल है। यही कारण रहा कि उन्होंने जनसुराज पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देने का फैसला लिया।
यह बयान बिहार की राजनीति में कलाकारों की भूमिका पर एक नई बहस को जन्म देता है। क्या कलाकार राजनीति में रहते हुए अपनी पहचान और स्वतंत्रता बनाए रख सकते हैं, या फिर उन्हें पार्टी लाइन में बंधना पड़ता है—रितेश पांडे का फैसला इसी सवाल का जवाब देता नजर आता है।
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Bihar Politics: खेसारी लाल के बाद एक और कलाकार की राजनीतिक विदाई
भोजपुरी सिनेमा में रितेश पांडे से पहले खेसारी लाल यादव भी राजनीति में किस्मत आजमा चुके हैं। छपरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के बाद हार का सामना करने वाले खेसारी लाल ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि राजनीति उनके लिए नहीं बनी है।
अब रितेश पांडे का राजनीति से हटना यह संकेत देता है कि भोजपुरी फिल्म और संगीत जगत के सितारों के लिए सियासत की राह आसान नहीं है। लोकप्रियता के बावजूद राजनीतिक जमीन पर टिके रहना एक अलग तरह की चुनौती है।
Bihar Politics: आगे क्या करेंगे रितेश पांडे?
इस्तीफे के बाद रितेश पांडे के भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि उनके बयान से यह स्पष्ट है कि वे कला, संगीत और समाज सेवा के जरिए जनता से जुड़े रहेंगे। राजनीति से दूरी बनाकर वे शायद उसी पहचान को मजबूत करना चाहते हैं, जिसने उन्हें लोकप्रिय बनाया।
बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि चुनावी हार के बाद आत्ममंथन और ईमानदार फैसले भी संभव हैं। रितेश पांडे का कदम इसी सोच का उदाहरण बनकर सामने आया है।
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