हर मोर्चे पर भारी पड़ी भाजपा

By Team Live Bihar 75 Views
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महेश खरे

mahesh khare
महेश खरे की तस्वीर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और नई रणनीति के आगे अरविंद केजरीवाल के सारे दांव विफल रहे। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्ता ही नहीं गंवाई अपितु वोटों के गणित में हर मोर्चे पर बीजेपी से पटखनी खाई है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार बीजेपी ने मोदी के चेहरे को आगे करने की रणनीति अपनायी। यह फार्मूला फिट बैठा। बीजेपी को मिले प्रचंड बहुमत ने साबित कर दिया कि दिल्ली के दिल में भी मोदी ही है। नए नए नरेटिव गढ़ने की धुन में केजरीवाल को भनक ही नहीं लग पाई कि गली-गली फैले बीजेपी के कार्यकर्ताओं की फौज ने कब उनके पैरों तले से सियासी जमीन खींच ली। हालत यह हो गई कि जहां-जहां केजरीवाल घूमे ज्यादातर उन्हीं सीटों पर हारे। जिन इलाकों में उन्होंने 36 रोड शो और रैलियां की उनमें से लगभग 33 पर भगवा लहराया।

2020 में 62 का आंकड़ा छूने वाली आम आदमी पार्टी इस बार 22 सीटों पर अटक गई । बीजेपी ने 71 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ 48 सीटों पर कब्जा करके दिल्ली में नया इतिहास रचा। वोट शेयर की बात करें तो 2020 में बीजेपी की झोली में पड़े 32.2 फीसदी वोट के मुकाबले इस बार बढ़कर लगभग 49 फीसदी हो गए। 2015 में यह आंकड़ा 38.6 फीसदी था। ‘आप’ का वोट प्रतिशत 2020 के 54.4 प्रतिशत से घटकर 42.66 प्रतिशत रह गया।

कांग्रेस का हालांकि खाता नहीं खुला लेकिन उसका वोट भी लगभग दो प्रतिशत बढ़ा। बीजेपी भले ही जाति जनगणना की पक्षधर नहीं रही हो लेकिन दिल्ली के चुनाव में जाति, धर्म, संप्रदाय और विभिन्न वर्गों के वोट पाने में उसके प्रत्याशी आगे रहे। भगवा लहराने में लाभार्थी महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। मुस्लिम बहुल सीटों में भी इस बार बीजेपी ने सेंध मारी। जंगपुरा और मुस्तफाबाद में कमल खिल गया।

दिल्ली में अब तक आरक्षित सीटें जीतने वाली पार्टी ही सत्ता में आती रही है। इस बार बीजेपी ने इस धारणा को भी तोड़ दिया। एससी के लिए आरक्षित 12 सीटों में से ‘आप’ के खाते में आठ सीटें गईं। लेकिन सरकार शेष चार सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी 27 साल का सूखा समाप्त कर सत्ता में आ गई। गरीब और मध्यम वर्ग केजरीवाल का कोर वोट माना जाता रहा है। इस बार बीजेपी ने बाजी पलटने का काम किया। पहले आठवें वेतन आयोग की घोषणा और बाद में मोदी के लोकलुभावन बजट में 12 लाख की आय कर मुक्त कर देने के फैसले ने तो दिल्ली के 70 फीसदी मध्यम वर्ग का दिल ही जीत लिया। मोदी के इस कदम ने केजरीवाल को उनके ही पाले में पटखनी दे दी।

केजरीवाल केवल दस लाख की आय को कर मुक्त करने की मांग करते रहे और मोदी ने 12 लाख की आय कर मुक्त करने की घोषणा कर दी। केजरीवाल कहते रहे कि अगर बीजेपी जीती तो मुफ्त बिजली, पानी की सुविधाएं बंद कर देगी। इसका जवाब पीएम मोदी ने दिया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जितनी भी जनकल्याण की योजनाएं चल रहीं हैं वे आगे भी जारी रहेंगी। यही नहीं मोदी ने गारंटी दी कि इनको और अधिक तर्कसंगत बनाया जाएगा।

फ्री बीज (मुफ्त की रेवड़ी) के वादे करने में भी आम आदमी पार्टी बीजेपी से मात खा गई। केजरीवाल ने महिलाओं को 2100 रुपए महीना देने का वादा किया तो बीजेपी ने इससे बढ़कर 2500 का वादा कर दिया। पंजाब में आप सरकार तीन सालों में 1000 रुपए देने का वादा पूरा नहीं कर पाई। इसलिए मोदी के वादे पर दिल्ली के वोटर का भरोसा ज्यादा रहा। 4000 से अधिक झुग्गी वासियों को मोदी पक्के घर की चाबी थमा चुके हैं। जबकि ‘आप’ घर देने का वादा पूरा नहीं कर पाई। नतीजतन इन बस्तियों का वोट भी प्रभावित हुआ।

केजरीवाल ‘पोलिटिक्स विथ डिफरेंस और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का सपना दिखाकर दस साल पहले सत्ता में आए थे आज शराब घोटाले में खुद जेल की यात्रा कर आए हैं। केजरीवाल के नेतृत्व वाली देश की पहली ऐसी सरकार रही जिसके मुखिया समेत कई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल गए। बड़े बड़े नेता अभी भी जमानत पर हैं। बीजेपी ने शराब घोटाले को जोर शोर से उठाया। नतीजा यह कि केजरीवाल समेत जेल गए मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन को हराकर दिल्ली के मतदाताओं ने कड़ा फैसला सुना दिया। इस बार केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पद पर जनादेश मांगा था। उन्होंने कहा था कि यदि जनता उन्हें भ्रष्ट मानती है तो वोट नहीं दे। जनता की अदालत में जीतने के बाद ही वे मुख्यमंत्री पद स्वीकार करेंगे। जनता ने चुनाव में केजरीवाल के साथ-साथ आम आदमी पार्टी को सत्ता के लायक ही नहीं छोड़ा है। जनादेश को स्वीकार कर क्या केजरीवाल सत्ता की सियासत छोड़ने का साहस दिखा सकेंगे?

केजरीवाल ने बीते दस साल में ऐसी राजनीति के बीज बो दिए हैं जिनकी सफाई करने में नई सरकार को काफी मेहनत करनी पड़ेगी। एक बार तो विधानसभा में स्वयं को ‘दिल्ली का मालिक’ बताने से भी वे नहीं हिचके थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर तंज कसा ‘दिल्ली का मालिक होने का जिन्हें घमंड था, उनका सच से सामना हो गया है।’ केजरीवाल यह मान बैठे थे कि वे जो भी कहेंगे या करेंगे लाभार्थी वर्ग उनके साथ रहेगा। संभवतः इसी भ्रम में उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि यमुना की सफाई और दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने समेत कुछ वादे वो पूरे नहीं कर पाए हैं। इसके लिए उन्हें पांच साल और चाहिए। वे अपनी विफलताओं का दोष केंद्र सरकार तो कभी उपराज्यपाल (एलजी) पर मढ़ते रहे। इस पर बीजेपी के नेताओं ने सवाल किया कि अगर एलजी सरकार को असहयोग कर रहे थे तो ‘शीशमहल’ कैसे बन गया? सादगी की सौगंध लेकर राजनीति में आए केजरीवाल को शीशमहल बनवाना महंगा पड़ा। केंद्र से आठ हजार करोड़ की राशि मिलने के बाद भी यमुना की सफाई नहीं कर पाना आप सरकार की चुनावी लुटिया डूबने का बड़ा कारण माना जा रहा है। कोविड काल में पूर्वांचलियों और उत्तर भारतीयों के साथ किए गए कथित दुर्व्यवहार का मुद्दा भी केजरीवाल के खिलाफ गया। पूर्वांचल बहुल सीटों पर आप को उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली।

दिल्ली में हालांकि आधे इंजन की सरकार है। लेकिन, देश की राजधानी होने के कारण यहां के सीएम का अलग ही महत्व होता है। दिल्ली फतेह करने के बाद उत्साह से लबरेज बीजेपी अब बिहार की ओर रुख करेगी। वहां अक्टूबर से चुनावी हलचल शुरू हो जाएगी। इसीलिए चर्चा यह भी है कि दिल्ली के ताज का फैसला बिहार के चुनावों पर नजर रखते हुए किया जा सकता है। वैसे पूर्वांचल के सांसद स्वयं पीएम मोदी हैं। लेकिन, बिहार को संदेश देने वाला नाम अगर दिल्ली की सत्ता का मुखिया बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। केजरीवाल को हराने वाले जाट चेहरे प्रवेश वर्मा का नाम भी दौड़ में चल रहा है। जाट बहुल 13 सीटों में से 11 सीटों पर भाजपा को कामयाबी मिली है। दिल्ली का असर पंजाब की गद्दी पर पड़ना स्वाभाविक भी है। इसलिए भगवंत मान सरकार में फिलहाल सन्नाटा पसरा हुआ है।
दिल्ली के जनादेश ने संदीप दीक्षित को भी अपनी पुश्तैनी दुश्मनी का बदला चुकाने का अवसर दे दिया। केजरीवाल ने संदीप की मां पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया था। नई दिल्ली सीट पर वोटों का गणित देखें तो इस चुनाव में संदीप दीक्षित ही केजरीवाल की हार का कारण बने। केजरीवाल को प्रवेश वर्मा ने 4025 मतों के अंतर से हराया।

इससे अधिक मत कांग्रेस प्रत्याशी संदीप दीक्षित को मिले हैं। इसके अलावा 14 सीटें ऐसी हैं जहां आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की पराजय का कारण कांग्रेस के प्रत्याशी रहे। इन सीटों पर जीत हार के अंतर से अधिक वोट कांग्रेस के पक्ष में गए। कहा जा सकता है कि यदि कांग्रेस और आप मिलकर लड़ते तो इन सीटों पर जीत हार की कहानी कुछ और हो सकती थी।

आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस को भी अब चुनावी नतीजों पर मंथन करने की जरूरत है। क्या कारण है कि दिल्ली में 15 साल (तीन चुनाव) से कांग्रेस का खाता ही नहीं खुल पा रहा। वैसे इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जहां-जहां आम आदमी पार्टी जीती वहां-वहां कांग्रेस को नुकसान हुआ। चाहे पंजाब हो, गुजरात हो, गोवा हो या दिल्ली। शायद इसी कारण से कांग्रेस ने ‘आप’ के खिलाफ मोर्चा संभाला। उसकी रणनीति यही रही कि भले ही बीजेपी जीत जाए, खुद का खाता नहीं खुल पाए लेकिन आम आदमी पार्टी जीतने नहीं पाए। आने वाले समय में भी कांग्रेस संभवतः इसी मार्ग का अनुसरण करेगी। उदाहरण के तौर पर गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव का हवाला दिया जा सकता है। निकट भविष्य में ही गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव होने जा रहे हैं। कांग्रेस और ‘आप’ वहां भी दिल्ली की तरह चुनावी दुश्मन के रूप में आमने सामने होंगे।

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