Black Money Budget 2026: विदेशी काले धन को सफेद करने की योजना ने बदला पूरा नैरेटिव

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बजट 2026 में विदेशी काले धन को वैध करने की योजना पर बहस
Highlights
  • • बजट 2026 में काले धन पर बड़ा नीति बदलाव • 60% टैक्स देकर विदेशी संपत्ति वैध करने का प्रस्ताव • 20 लाख तक चल संपत्ति पर आपराधिक केस नहीं • 6 महीने की डिस्क्लोजर स्कीम • स्विस बैंक डेटा ने बढ़ाई बहस

2014 के आम चुनावों में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई थी, तब उसका सबसे प्रभावशाली और भावनात्मक वादा विदेशों में जमा काला धन वापस लाना था। यह केवल आर्थिक सुधार का मुद्दा नहीं था, बल्कि इसे नैतिक पुनर्जागरण के अभियान के रूप में प्रस्तुत किया गया। चुनावी मंचों से बार-बार कहा गया कि स्विस बैंकों और टैक्स हेवन्स में जमा भारतीयों का काला धन देश वापस आएगा, हर नागरिक के खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये तक पहुँचेंगे और भ्रष्टाचार की जड़ों पर निर्णायक प्रहार होगा। यह वादा जनता की उस गहरी पीड़ा से जुड़ा था, जो दशकों से देख रही थी कि देश की संपत्ति लूटकर कुछ लोग विदेशों में ऐश कर रहे हैं।

लेकिन 1 फरवरी 2026 को पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री द्वारा रखा गया प्रस्ताव इस पूरे नैतिक आख्यान को नई दिशा देता दिखाई दिया। सरकार ने विदेशों में जमा काले धन पर 60 प्रतिशत जुर्माना देकर उसे वैध करने का विकल्प प्रस्तुत किया। इसे केवल कर नीति का संशोधन नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

Black Money Budget 2026 में बड़ा कानूनी मोड़

बजट 2026 में ब्लैक मनी एक्ट की दंडात्मक प्रकृति को नरम करते हुए सरकार ने महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव प्रस्तावित किया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित वन टाइम फॉरेन एसेट एवं ब्लैक मनी डिसक्लोजर स्कीम के तहत अब विदेश में स्थित आय या संपत्ति का खुलासा न होना हर स्थिति में आपराधिक अपराध नहीं माना जाएगा।

इस बदलाव का घोषित उद्देश्य यह बताया गया कि जानबूझकर काला धन छिपाने वालों और जानकारी के अभाव या तकनीकी त्रुटियों के कारण चूक करने वालों के बीच कानूनी अंतर स्थापित किया जाए। पहले काला धन अधिनियम, 2015 की धाराएँ 49 और 50 विदेशी आय या संपत्ति के खुलासे में विफल रहने पर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान रखती थीं।

नए प्रस्ताव के अनुसार विदेश में 20 लाख रुपये तक की चल संपत्ति — जैसे बैंक बैलेंस या शेयर — का आयकर रिटर्न में खुलासा न होने पर अब आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा।

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Black Money Budget 2026 स्कीम की श्रेणियाँ और शर्तें

Black Money Budget 2026: विदेशी काले धन को सफेद करने की योजना ने बदला पूरा नैरेटिव 1

सरकार ने स्वैच्छिक अनुपालन को प्रोत्साहित करने के लिए 6 महीने की विशेष घोषणा योजना शुरू करने का प्रस्ताव रखा है।

श्रेणी A
• जिन लोगों ने विदेशी आय या संपत्ति का कोई खुलासा नहीं किया
• यदि मूल्य 1 करोड़ रुपये से कम है
• 60% कर देकर अभियोजन से पूर्ण मुक्ति

श्रेणी B
• जिन्होंने विदेशी आय पर टैक्स दिया, पर संपत्ति घोषित नहीं की
• 5 करोड़ रुपये तक की संपत्ति पर
• मात्र 1 लाख रुपये शुल्क देकर कानूनी कार्रवाई से राहत

यह राहत अचल संपत्ति पर लागू नहीं होगी और इसे 1 अक्टूबर 2024 से प्रतिगामी प्रभाव के साथ लागू माना जाएगा।

Black Money Budget 2026 से किन्हें मिलेगी राहत

सरकार के अनुसार यह संशोधन विशेष रूप से उन वर्गों के लिए राहत लेकर आया है, जो तकनीकी कारणों से विदेशी परिसंपत्तियों का विवरण दर्ज नहीं कर पाते थे।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
• विदेश में पढ़ने वाले छात्र
• एनआरआई
• अल्पकालिक विदेशी नौकरी करने वाले पेशेवर
• ऐसे करदाता जो अनुसूची FA भरना भूल जाते थे

कानूनी दृष्टि से यह कदम दंड आधारित व्यवस्था से अनुपालन आधारित व्यवस्था की ओर झुकाव को दर्शाता है।

Black Money Budget 2026 और राजनीतिक बहस

हालाँकि इस योजना ने कानूनी राहत का रास्ता खोला है, लेकिन इसकी नैतिक और राजनीतिक कीमत पर तीखी बहस शुरू हो गई है। आलोचकों का तर्क है कि विदेशों से काला धन वापस लाने में विफलता किसी कानूनी जटिलता का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाती है।

वरिष्ठ विधिवेत्ता राम जेठमलानी ने पूर्व में सुझाव दिया था कि विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किए बिना उसकी वापसी संभव नहीं। यह तर्क अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या पर आधारित बताया गया था, लेकिन इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए।

सुप्रीम कोर्ट और एसआईटी संदर्भ

4 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में गठित विशेष जांच दल (SIT) ने काले धन पर सरकारी नरमी को चिंता का विषय बताया था। उस समय की टिप्पणियाँ आज की नीतिगत दिशा के संदर्भ में फिर चर्चा में हैं।

राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जाता रहा कि जब इस मुद्दे पर सरकार के भीतर मतभेद उभरे, तब असहमति जताने वाले नेताओं को अलग राह चुननी पड़ी — जिससे नीति बनाम प्राथमिकता का प्रश्न और गहरा हुआ।

Swiss Bank Data और बढ़ती चिंताएँ

सरकारी दावों के समानांतर स्विस नेशनल बैंक के आँकड़े भी बहस का केंद्र बने हुए हैं। उपलब्ध डेटा के अनुसार 2024 में स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में भारतीयों की जमा राशि तीन गुना से अधिक बढ़कर लगभग ₹37,600 करोड़ तक पहुँच गई — जो 2021 के बाद सबसे ऊँचा स्तर माना गया।

भारत इस सूची में 67वें स्थान से बढ़कर 48वें स्थान पर पहुँच गया। यह आँकड़ा केवल घोषित धन को दर्शाता है — अघोषित संपत्तियाँ इसमें शामिल नहीं होतीं।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि घोषित राशि ही इतनी तेज़ी से बढ़ी है, तो अघोषित संपत्ति का वास्तविक पैमाना कहीं अधिक बड़ा हो सकता है।

Black Money Budget 2026 बनाम नोटबंदी नैरेटिव

यह नीति परिवर्तन नोटबंदी की स्मृतियों के साथ भी जोड़ा जा रहा है। उस समय सरकार ने काले धन पर निर्णायक प्रहार का दावा किया था। आम नागरिकों ने नकदी संकट, रोजगार अस्थिरता और आर्थिक अव्यवस्था झेली — इस विश्वास के साथ कि समानांतर अर्थव्यवस्था समाप्त होगी।

अब आलोचक प्रश्न उठा रहे हैं कि यदि विदेशी खातों में जमा धन को जुर्माना लेकर वैध किया जा सकता है, तो उस कठोर आर्थिक प्रयोग की नैतिक परिणति क्या रही।

दंड से रेगुलराइज़ेशन तक का बदलाव

नई योजना का मूल दर्शन यह संकेत देता है कि:
• अपराध को पूर्ण दंड से नहीं
• बल्कि वित्तीय दंड + वैधता मॉडल से
• नियमित कर प्रणाली में लाया जाए

समर्थकों का तर्क है कि इससे राजस्व बढ़ेगा और अनुपालन सुधरेगा। विरोधियों का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा कि अवैध धन अंततः “समझौते” से वैध हो सकता है।

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लोकतांत्रिक नैतिकता पर उठते सवाल

लोकतंत्र में सरकारें केवल आर्थिक नीतियाँ नहीं बनातीं, वे नैतिक दिशा भी तय करती हैं। इसीलिए यह बहस केवल कर संग्रह तक सीमित नहीं है।

मुख्य प्रश्न उभर रहे हैं:
• क्या ईमानदार करदाता हतोत्साहित होंगे?
• क्या दंड का भय कम होगा?
• क्या भविष्य में अनुपालन घटेगा?
• क्या नैतिक वादे चुनावी भाषणों तक सीमित रह जाएँगे?

विदेशों में जमा काले धन को लेकर भारत की लड़ाई दशकों पुरानी है। बजट 2026 में प्रस्तुत योजना इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ले आई है। सरकार इसे अनुपालन सुधार और राजस्व सृजन का व्यावहारिक कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे नैतिक पराजय के रूप में देख रहे हैं।

आख़िरकार बहस का मूल प्रश्न यही है — क्या अवैध धन के विरुद्ध संघर्ष दंड से जीता जाएगा या समझौते से? और क्या राजस्व लाभ नैतिक लागत से बड़ा है? आने वाले वर्षों में इस नीति के आर्थिक परिणाम जितने महत्वपूर्ण होंगे, उतनी ही महत्वपूर्ण होगी उसकी लोकतांत्रिक और नैतिक व्याख्या।

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