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लाइव बिहार: तल्ख रवैये के के साथ लोक जनशक्ति पार्टी बिहार एनडीए गठबंधन से बाहर हो गई है। इस बारे में जानकारी खुद लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने दी। उन्होंने ट्वीटर पर एक लेटर भी पोस्ट किया। जिसमें उन्होंने जदयू को टारगेट किया और लोगों से जदयू प्रत्याशियों को वोट नहीं देने की बात कहीं। उन्होंने एक इंटरव्यू भी दिया जिसमें उनका अंदाज यहीं था — मोदी से बैर नहीं, नीतीश तुम्हारी खैर नहीं। वो कहते दिखें कि वो भाजपा के साथ सरकार बनाएंगे। लेकिन इसके मायने कया हैं कि बीजेपी के सााि है, लेकिन एनडीए से बाहर। जाहिर है कि चिराग के दिमाग में कोई बड़ा गेम प्लान तैयार है। वो जिस तरह से नीतीश कुमार को टारगेट करके बयान दे रहे हैं इससे भविष्य की सियासत के कई संकेत मिल रहे हैं।

चिराग ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व को तो पहले ही नाकार दिया था। लेकिन जब अलग हुए तो यह कहते हुए देखे गए कि उन्होंने एक खुला पत्र तो लिखा ही साथ ही ये भी कहते दिखें कि किसी भी कीमत पर ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट‘ की सोच को खत्म नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि वे बिहार पर राज करने के लिए नहीं बल्कि नाज करने चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इसे राजनीतिक जानकार उनके डील करने के अपने नए तरीके के रुप में देख रहे हैं

साथ ही वो नीतीश कुमार को जिस तरीके से टारगेट कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ कर रहे हैं, उससे कुछ राजनीतिक पंडितों को लगता है कि चिराग पासवान बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का हिस्सा औपरारिक तौर पर नहीं लेकिन बाहर से बने रहना चाहते हैं। साथ ही वो अलग से चुनाव लड़ रहे हैं जिससे यह जाहिर है कि नीतीश कुमार को नुकसान होगा। लेकिन उतना नहीं। ऐसे यहां बड़ी तस्वीर 2025 के टारगेअ से जुड़ी हुई दिखती है। यानी कि चिराग बिहार में खुद को बिहार में नीतीश के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश में हैं।

वहीं वर्ष 2017 में मणिपुर विधानसभा चुनाव में एलजेपी ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था। बाद में लोजपा सरकार में शामिल हो गई। इसके बाद वर्ष 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भी लोजपा ने एनडीए से अलग चुनाव लड़ा था। यानि ये फैसले बताते हैं कि चिराग अब पार्टी को एक अलग, स्वतंत्र और बड़े अस्तीत्व को बनाने को लेकर काम कर रहे हैं।

अगर त्रिशंकु रहा परिणाम तो…
2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 157, जदयू 101 और लोजपा 42 सीटों पर लड़ी थी। तब भाजपा और लोजपा साथ थे लेकिन जदयू नहीं। उस वक्त भाजपा 53 सीटों पर जीती और 104 सीटें ऐसी थीं, जहां वह नम्बर 2 पर रही। वहीं लोजपा पिछली बार जिन 42 सीटों पर लड़ी थी उनमें से वह जीती भले ही 2 सीट लेकिन 36 सीटें ऐसी थीं जिसमें वो दूसरे नंबर पर थी और 2 पर तीसरे नंबर पर थी। ऐसे में राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा की जीती हुई और नंबर 2-3 की सीटें मिलाकर 155 का आंकड़ा होता है। लोजपा की जीती हुई और हारी हुई सीट मिलाकर 42 हैं। यानी भाजपा और लोजपा की एक और दो नंबर को मिला दें तो ये अकेले 195 सीटों पर इनका प्रभाव है। ऐसे में कहीं त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी तो चिराग पासवान के लिए सीएम पद के चांस भी बन सकते हैं।

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