नए कानूनों की ओर बढ़ता देश
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तीन नये आपराधिक कानून, अर्थात‍् भारतीय न्याय संहिता 2023 (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 (बीएसए) 1 जुलाई से लागू होने जा रहे हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने आपराधिक प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के उद्देश्य से बनाए गए नए कानूनों की सराहना की है और उन्हें भारतीय न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, जबकि कानूनी बिरादरी के एक वर्ग ने इन कानूनों के कुछ प्रावधानों की अनिश्चितता, अस्पष्टता और संवैधानिकता के बारे में गंभीर चिंता जताई है।

ममता बनर्जी सहित विपक्षी राजनीतिक दल मांग कर रहे हैं कि नये अधिनियमों को तब तक स्थगित रखा जाना चाहिए जब तक कि लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्य उनकी संस्तुति नहीं कर देते। उनका तर्क है कि ये कानून संसद में बिना किसी सार्थक बहस के जल्दबाजी में पारित कर दिए गए थे, क्योंकि अधिकांश विपक्षी सदस्य निलंबित थे। नए आपराधिक कानूनों की वैधता के बारे में इतनी देरी से चिंता व्यक्त करना अवसरों को गंवाने के अलावा और कुछ नहीं है, ये कानून तीन साल की लम्बी परामर्श प्रक्रिया और हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद बनाए गए थे। इसके बाद गृह मंत्रालय की संसदीय समिति द्वारा इन कानूनों की गहन जांच की गई थी। यहां तक कि दो अलग-अलग अवसरों पर सार्वजनिक नोटिस के जरिए जनता से सुझाव भी मांगे गए थे। सरकार इनमें से किसी भी मांग के आगे नहीं झुक रही है और कानूनों को लागू करने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रही है।

इसके अतिरिक्त, नए प्रावधानों की असंवैधानिकता के बारे में चिंताएं इस तथ्य के मद्देनजर सही नहीं हैं कि बीएनएस में बदलाव मुख्य रूप से नवतेज जौहर (2018), जोसेफ शाइन (2018) और पी. रथिनम (1994) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का प्रतिबिम्ब है। भारतीय न्याय संहिता से राजद्रोह की धारा हटाना राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में शीर्ष अदालत में केन्द्र सरकार के हलफनामे पर क्रियान्वयन दर्शाता है, साथ ही इसमें लम्बे समय से लम्बित राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को भी सम्बोधित किया गया है। बीएनएसएस और बीएसए में संशोधनों पर आपत्तियां भी उचित प्रतीत नहीं होती क्योंकि इनके मूल रूप से आपराधिक कार्रवाई का डिजिटलीकरण और पीड़ित तथा नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुरूप प्रावधानों को शामिल करना है। इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण जांच और त्वरित न्याय की मांग को पूरा करने के लिए आपराधिक प्रक्रियाओं को फिर से स्थापित किया गया है।

नि:संदेह, नये कानूनों को लागू करने के पथ में राज्य सरकारों का आगे बढ़ना बिना केन्द्र सरकार के सहयोग और सहारे के चलना सम्भव नहीं होगा। कदम-कदम पर राज्यों को केन्द्र सरकार की मदद की जरूरत होगी। नए आपराधिक कानूनों को लागू करने के साथ केन्द्र सरकार की निष्ठा और तत्परता भी जुड़ी हुई है, अतः केन्द्रीय एजेंसियों को चाहिए कि राज्य सरकारों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करें ताकि इन कानूनों को समयबद्ध और सुचारु रूप से लागू किया जा सके।

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