डॉ. देवकुमार पुखराज
(राजभाषा सलाहकार, एनएमडीसी लिमिटेड, हैदराबाद)
भारतीय सभ्यता में कुछ तिथियां केवल धार्मिक पर्व नहीं होतीं, वे विचार और चेतना का महोत्सव बन जाती हैं। महाशिवरात्रि ऐसी ही एक तिथि है। यह आत्मसंयम, वैराग्य, तप और लोककल्याण की प्रतीक है। इसी पावन दिवस पर जन्मे स्वामी सहजानंद सरस्वती भारतीय इतिहास के उन दुर्लभ महापुरुषों में हैं, जिन्होंने अध्यात्म को सामाजिक न्याय से, संन्यास को जनसंघर्ष से और किसानों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। वे केवल एक संत नहीं थे, बल्कि आंदोलनकारी और किसान चेतना के सबसे सशक्त वैचारिक सूत्रधार थे। तभी तो उन्हें भारत में संगठित किसान आंदोलन का प्रणेता कहा जाता है।
जन्म, शिक्षा और संन्यास की यात्रा
स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 22 फरवरी 1889 को महशिवरात्रि के दिन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ज़िले के देवा गांव में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ। उनका बचपन का नाम नवरंग राय था। ग्रामीण परिवेश, खेतों में काम करते किसानों का जीवन और पारिवारिक संघर्ष उनके बालमन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उनका झुकाव संस्कृत, दर्शन और वेदांत की ओर हुआ। उन्होंने काशी सहित अनेक स्थानों पर रहकर शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया और अंततः संन्यास ग्रहण किया। परंतु उनका संन्यास समाज से विमुखता का प्रतीक नहीं बना। वेदांत की उनकी समझ निष्क्रिय वैराग्य की नहीं, बल्कि कर्मयोग की थी। उनके लिए ब्रह्म की साधना का अर्थ था—संसार के दुखों से मुँह मोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें दूर करने का प्रयास करना। यही दृष्टि उन्हें लाखों किसानों के बीच ले गई।
औपनिवेशिक भारत और किसानों का यथार्थ
ब्रिटिश शासन के समय भारतीय किसान सबसे अधिक शोषित वर्ग था। ज़मींदारी व्यवस्था, ऊँचा लगान, बेगार प्रथा और साहूकारों का चक्रव्यूह किसान को स्थायी कर्ज़ और अपमान में धकेल देता था। स्वामीजी ने देखा कि बड़ी संख्या में लघु-सीमांत किसान अपनी ही जाति के जमींदारों के शोषण और दोहन के शिकार हैं। उनकी स्थिति गुलामों से भी बदतर है। स्वतंत्रता आंदोलन का प्रारंभिक चरण शहरी मध्यम वर्ग और अभिजात वर्ग तक सीमित था, जिसमें किसान की पीड़ा को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने इस अंतर को स्पष्ट रूप से पहचाना। उनका मानना था कि जब तक किसान आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में नहीं आएगा, तब तक आज़ादी अधूरी रहेगी। उन्होंने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक निरर्थक है, जब तक आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता न मिले।
किसान सभा और संगठित संघर्ष
इसी सोच के परिणामस्वरूप वर्ष 1929 में बिहार में बिहार प्रांतीय किसान सभा की स्थापना हुई। यह भारतीय इतिहास में किसानों का पहला संगठित, वैचारिक और जनाधारित आंदोलन था। स्वामी सहजानंद ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने किसानों को बताया कि ज़मीन पर पहला अधिकार उसी का है, जो उसे जोतता है। विद्रोही सहजानंद ने अपनी ही जाति के जमींदारों के खिलाफ ‘लठ’ उठा ली और आर-पार की लड़ाई शुरू कर दी। उन्होंने देशभर में घूम-घूमकर किसानों की रैलियां की। स्वामीजी के नेतृत्व में किसानों ने सन् 1936 से लेकर 1939 तक बिहार में कई लड़ाईयां लड़ीं। इस दौरान जमींदारों और गोरी सरकार के साथ उनकी छोटी-मोटी सैकड़ों भिड़न्तें भी हुई। उनमें बड़हिया, रेवड़ा और मझियावां के बकाश्त सत्याग्रह ऐतिहासिक हैं। इस कारण बिहार के किसान सभा की पूरे देश में प्रसिद्धि हुई। दस्तावेज बताते हैं कि स्वामीजी की किसान सभाओं में जुटने वाली भीड़ तब कांग्रेस की रैलियों से ज्यादा होती थी। किसान सभा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1935 में इसके सदस्यों की संख्या अस्सी हजार थी जो 1938 में बढ़कर दो लाख पचास हजार हो गयी। स्वामीजी का एक नारा जो काफी लोकप्रिय हुआ-
‘ जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनायेगा,
यह भारतवर्ष उसी का है, अब शासन भी वहीं चलायेगा ‘
कांग्रेस, समाजवाद और वैचारिक स्वतंत्रता
स्वामी सहजानंद सरस्वती जन्मजात विद्रोही थे। वे किसी एक राजनीतिक खांचे में फिट नहीं बैठते। गांधीजी के प्रभाव में आकर कांग्रेस से जुड़े लेकिन आँख मूँदकर उसका समर्थन नहीं किया। जब कांग्रेस नेतृत्व ज़मींदारों के प्रति नरम दिखाई दिया, तो उन्होंने खुलकर विरोध किया। वे समाजवादी विचारों से प्रभावित थे, लेकिन किसी वैचारिक जड़ता के शिकार नहीं बने। जब जेल में सुविधा के लिए कांग्रेसी नेताओं को लड़ते देखा तो उनके प्रति स्वामीजी का नजरिया बदल गया। उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी—वैचारिक स्वतंत्रता। वे मानते थे कि संगठन और दल साधन हैं, लक्ष्य नहीं। उनका लक्ष्य था- किसान की मुक्ति। इसी कारण वे सत्ता के निकट जाने की बजाय जनता के बीच रहना पसंद करते थे।
राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क और सराहना-
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने एक बार कहा था, ‘साबरमती आश्रम में मैंने खादी धोती पहने पूंजीपतियों के एक संन्यासी को देखा, परन्तु भारत का एक सच्चा संन्यासी मुझे सीताराम आश्रम, बिहटा ( जहां स्वामी सहजानंद रहते थे) में मिला। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उनको ‘दलितों का संन्यासी’ कहते थे। साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें ‘नये भारत का नया नेता’ सम्बोधित किया है। अमेरिकी विद्वान वाल्टर हाउजर ने किसान आंदोलन पर अपने शोध कार्य में सहजानन्द की दो अप्रकाशित पुस्तकों ‘झारखंड के किसान’ और ‘खेत मजदूर’ का उल्लेख करते हुए उन्हें भारतीय राष्ट्रीय किसान आंदोलन का सबसे बड़ा नायक माना है।
स्वामी सहजानंद की नेताजी सुभाषचंद्र बोस से निकटता सर्वविदित है। दोनों ने साथ मिलकर समझौता विरोधी कई रैलियां की। स्वामीजी फारवॉर्ड ब्लॉक से भी जुड़े रहे। एक बार जब स्वामीजी की गिरफ्तारी हुई तो नेताजी ने 28 अप्रैल को ‘ऑल इंडिया स्वामी सहजानंद डे’ घोषित कर दिया। सीपीआई जैसी वामपंथी पार्टियां भी स्वामीजी को वैचारिक दृष्टि से अपने करीब मानती रही। यह स्वामीजी का प्रभामंडल ही था कि तब के समाजवादी और कांग्रेस के पुराने शीर्ष नेता, जैसे- एमजी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंडित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुनाकार्यी, आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी सुंदरैया, भीष्म साहनी, बाबा नागार्जुन, बंकिमचंद्र मुखर्जी जैसे नामी चेहरे किसान सभा से जुड़े थे।
लेखन: संघर्ष का दस्तावेज़
स्वामी सहजानंद जी का जीवन संघर्ष और सृजन को समर्पित रहा। मेरा जीवन संघर्ष केवल उनकी आत्मकथा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक भारत के ग्रामीण समाज का सजीव चित्रण है। किसान आंदोलन क्यों और कैसे, जैसी पुस्तकों में उन्होंने किसान आंदोलन की वैचारिक दिशा स्पष्ट की। वे जेल में रहने के दौरान नियमित तौर पर गीता के पठन-पाठन का काम करते। साथी कैदियों की प्रार्थना पर उन्होंने जेल में गीता भी पढ़ाई। गीता ह्दय लिखा। अधिकांश किताबें जेल में रहते हुए पूरी की। ‘मेरा जीवन संघर्ष’ के अलावे किसान कैसे लड़ते हैं, क्रांति और संयुक्त मोर्चा, किसान-सभा के संस्मरण, खेत-मजदूर, झारखंड के किसान और गीता ह्रदय नामक पुस्तकें लिखी। धार्मिक कर्मकांड पर 14 सौ पृष्ठों में लिखी ‘कर्मकलाम’ उनकी सबसे बड़ी रचना है। अब छह खंडो में उनकी सम्पूर्ण रचनावली प्रकाशित हो चुकी है। स्वामी सहजानंद सरस्वती का लेखन भारतीय किसान आंदोलन की रीढ़ है। उनकी भाषा सरल, सीधी और तर्कपूर्ण थी। वे शास्त्रीय उद्धरणों के साथ-साथ खेत-खलिहान की भाषा का प्रयोग करते थे। यही कारण है कि उनका लेखन पढ़े-लिखे वर्ग के साथ-साथ साधारण किसान को भी उतना ही समझ में आता है।
विरासत, प्रेरणा और प्रासंगिकता
आज जब भारतीय कृषि वैश्वीकरण, बाज़ारवाद और जलवायु संकट के दबाव में है। अमेरिका के साथ हाल में हुए कथित समझौते के चलते केन्द्र की मोदी सरकार पर कृषि क्षेत्र को गिरवी रखने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे नाजुक वक्त में भी स्वामी सहजानंद सरस्वती के विचार नई रोशनी देते हैं। किसान आत्महत्याएँ, भूमि अधिग्रहण, कॉरपोरेट नियंत्रण और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे प्रश्न उनके विचारों की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं।
माना जाता है कि स्वामी जी उस दौर में असहमतियों की आवाज थे। जहां भी गलत देखा तुरंत विद्रोह पर उतारु हो गये। परिणाम की चिंता नहीं की। आज का समय दूसरा है। अब असहमति को विरोध के तौर पर तो देखा जाता है। लेकिन विद्रोह कहीं दिखता नहीं। समय ने ऐसा सुविधाभोगी समाज खड़ा कर दिया है, जहां विचारों-सिद्धांतों की हर रोज बलि चढ़ती है और हम मूकदर्शक बने निहार रहे हैं। व्यक्तिगत लाभ-हानि की चिंता में आतुर समाज के सामने स्वामी सहजानंद एक दीप-स्तंभ की तरह हैं, लेकिन हम उनसे रौशनी लेने को तैयार नहीं हैं। हम जयंती और पुण्यतिथि की औपचारिकता निभाकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।
महाशिवरात्रि पर स्वामी सहजानंद सरस्वती की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। यह हमें पूछने के लिए विवश करती है कि क्या आज का भारत उस किसान के सपनों के अनुरूप है, जिसके लिए स्वामी सहजानंद ने अपना जीवन अर्पित कर दिया। सवाल है कि क्या हम स्वामीजी के अनुयायी कहलाने के हकदार हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं—संघर्ष, समता और किसान स्वाभिमान का विचार। जब तक भारतीय किसान न्याय और सम्मान की तलाश में है, तब तक यह विचार जीवित रहेगा।

