‘जनेऊधारी शिव भक्त ब्राह्मण’ से पिछड़ों के मसीहा बनने की कवायद मृत्यु के 25 साल बाद कांग्रेस को याद आए सीताराम केसरी

7 Min Read

डॉ.शकील अहमद खान
(पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस महासचिव)
पिछले राजनीतिक पोस्ट में मैंने लिखा था कि राहुल गांधी जी और उनको ग़लत सलाह देने वाले कुछ लोग जो उनके आस पास बैठे हैं उन पर 10-20 पोस्ट लिखा जा सकता है। मगर जितना सोचता हूँ यह संख्या बढ़ती ही नज़र आती है। साथ रहकर ग़लत सलाह देने वालों की वजह से राहुल जी की छवि भी बहुत ख़राब होती है, पार्टी को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए। अभी बहुत दिन नहीं हुए कि ज़ोरशोर से यह कहा गया कि राहुल जी एक ‘जनेऊधारी शिव भक्त ब्राह्मण हैं ‘। यानी कि वह अगड़े समाज के भी शुभचिंतक हैं। मगर थोड़े दिन के बाद ही न केवल अति पिछड़े, दलित और आदिवासी के पक्ष में ज़ोर शोर से बातें होने लगी बल्कि समाज के अगड़े वर्ग को निशाना बनाया जाने लगा। यह सोच कर कि भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई है इस लिए मुसलमान तो मजबूरी में बिना मांगे ही वोट दे देगा, इस लिए मुसलमानों का नाम लेने की ज़रूरत भी नहीं है।
जो सदियों की सामाजिक व्यवस्था के कारण पीछे रह गए है उनके पक्ष में सकारात्मक कारवाई में कोई हर्ज नहीं, बल्कि यह स्वागत योग्य है। परन्तु उसके लिए उच्च वर्ग के ख़िलाफ़ बोलना और उन्हें अपमानित करना किसी भी तरह उचित नहीं है। और यह शिकायत किसी दूसरे से नहीं बल्कि राहुल गांधी जी से होने लगी थी। मुझे आज भी याद है कि एक डेढ़ साल पहले बिहार कांग्रेस मुख्यालय, सदाक़त आश्रम में राहुल गांधी जी का भाषण समाप्त होते ही ब्राह्मण समाज के एक पूर्व विधायक ने मुझ से कहा ‘ सर हम लोग अब कहां जायें ? लालू जी से गठबंधन के कारण हमारे भाई -भतीजे पहले से ही हमारा उपहास उड़ाते थे, अब राहुल जी की इस भाषा के बाद हमारे लिए क्या बचा है? ‘
यह सही है कि आजकल बिहार, उत्तर प्रदेश और मोटा मोटी हिंदी भाषा भाषी क्षेत्रों में उच्च वर्ग का वोट कांग्रेस को कम मिलता है, लेकिन हमारे कैडर्स में अभी भी उच्च वर्ग का बहुमत है। अगर इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल हुआ तो हमारे कैडर्स भी हम से अलग हो जाएंगे, जो हमारे लिए बहुत घातक होगा। हमें यह सोचना चाहिए कि उच्च वर्ग हम से अलग क्यों हुआ ? यह सभी जानते हैं की धीरे धीरे समाज का 3 वर्ग मुख्य रूप से पूरी तरह से हमारे समर्थक बच गए थे। यह 3 वर्ग दलित-आदिवासी, मुस्लिम और उच्च वर्ग थे। पिछड़े भी हमें कुछ वोट देते थे परन्तु संख्या थोड़ी कम होती थी। उनका आरोप था कि कांग्रेस उच्च वर्ग पर ही ध्यान देती है, परन्तु वोट मिले या नहीं मिले कांग्रेस के बड़े नेता कभी पिछड़ों के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं देते थे।
जो तीन वर्ग मुख्य रुप सें बचा था उसमें से बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद और भागलपुर तथा देश भर में हुए दंगों में हमारी भूमिका से निराश हो कर सबसे पहले मुस्लिम समाज हम से अलग हो गया। फिर पिछड़ों के मज़बूत नेताओं लालू जी और मुलायम सिंह जी के उदय और कांग्रेस के कमज़ोर होने के कारण उच्च वर्ग के मतदाता भाजपा की तरफ़ शिफ्ट हुए और दलित-आदिवासी वोट भी कांग्रेस के कमज़ोर होने के बाद विभिन्न भागों में बंट गया। उस दिन से बिहार में कांग्रेस इतनी कमज़ोर हो गयी कि आज तक मज़बूत नहीं हो पायी है।
मुसलमानों की कांग्रेस से नाराज़गी का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 1985 में जहां कांग्रेस से 27 मुस्लिम एमएलए जीते थे वहां अगले इलेक्शन 1990 में 27 में से 24 एमएलए चुनाव हार गए और सिर्फ़ 3 ही मुस्लिम एमएलए दोबारा जीत पाए। तीन जीतने वालों में एक स्व. हिदायतुल्लाह ख़ान साहेब, दूसरे फ़ुरक़ान अंसारी साहेब और तीसरा मैं था। 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव तक उच्च वर्ग के काफ़ी मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट दिया परन्तु लालू जी की 1995 में दोबारा जीत के बाद 1996 के लोकसभा चुनाव से उनमे से अधिकांश भाजपा की तरफ़ चले गए। 1995 के विधान सभा और 1996 के लोक सभा के चुनाव में कांग्रेस के वोटों का अन्तर इसको और स्पष्ट करेगा।
पिछड़ों के पक्ष में बोलने में कोई हर्ज नहीं है मगर उसके लिए उच्च वर्ग के ख़िलाफ़ बोलना उचित नहीं है। हमें कहना चाहिए कि ‘जो आगे बढ़ गया है हम उसे खींच कर पीछे नहीं करना चाहते, मगर जो पीछे छूट गये हैं हम उन्हें भी सहारा और अवसर देकर अगली पंक्ति में लाना चाहते हैं। ‘ किसी को बुरा नहीं लगेगा।
और क्या सिर्फ़ ज़बान से कह देने से पिछड़े यक़ीन कर लेंगे? हम अपने बड़े नेताओं की जयन्ती और पुण्यतिथि दोनों मनाते हैं, और अगर एक मनाना है तो जयन्ती मनाते हैं। क्या बिहार के पिछड़े नहीं समझते हैं कि बिहार चुनाव से ठीक पहले सीताराम केसरी जी की पुण्यतिथि क्यों मनाई गयी, और वह भी पहली बार केसरी जी की मृत्यु के 25 साल बाद !
और फिर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के बाद पिछड़ों के पक्ष में बोलने में कमी क्यों आ गई? पिछड़े वर्ग के लिए अच्छा काम कीजिए, उच्च वर्ग को अपमानित करने से वह भी खुश नहीं होंगे। उच्च वर्ग के ख़िलाफ़ बोलने के पहले उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का यह शेर याद रखना चाहिए-
‘ दुश्मनी जमकर करो, लेकिन इतनी गुंजाईश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों। ‘

Share This Article