Holi and Freedom Struggle: 7 ऐतिहासिक घटनाएं, जब रंगों के पर्व ने जगाई आज़ादी की ज्वाला

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जब होली बनी आज़ादी और सामाजिक जागरण का प्रतीक
Highlights
  • • 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों की होली • 1854 में झांसी में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ का फरमान • रानी लक्ष्मीबाई द्वारा होली समारोह रद्द • 1926 में छह बब्बर अकालियों को होली के दिन फांसी • भगत सिंह का ‘प्रताप’ में रोषपूर्ण लेख • 1942 कानपुर में 45 क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी • सामाजिक सुधार और शिक्षा का माध्यम बनी होली

Holi and Freedom Struggle का अनोखा और भावुक इतिहास

Holi and Freedom Struggle का रिश्ता भारतीय इतिहास में बेहद गहरा और प्रेरणादायक रहा है। वर्ष 1920 में Mahatma Gandhi ने जब असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के इस्तेमाल की उनकी अपील ने देशभर में शक्तिशाली प्रभाव डाला।

इस अपील का असर इतना व्यापक था कि देशवासियों ने विदेशी कपड़ों तक की होली जला डाली। लेकिन Holi and Freedom Struggle का यह केवल एक पहलू नहीं था। उस दौर में होली का पर्व अंग्रेजी सत्ता और आज़ादी के दीवानों के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका था।

1853 की झांसी: जब होली पर बरपा ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ का कहर

Holi and Freedom Struggle के इतिहास में झांसी की घटना बेहद मार्मिक है। 21 नवंबर 1853 को झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर के निधन के बाद अंग्रेज गवर्नर जनरल Lord Dalhousie ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ के तहत झांसी को हड़पने की योजना बनाई।

7 मार्च 1854 को होली के दिन झांसी में फरमान भेजा गया कि अब शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि मेजर एलिस चलाएंगे।

Rani Lakshmibai ने इस फरमान को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने होली के सारे समारोह रद्द कर भविष्य की रणनीति बनाने का निर्णय लिया। झांसीवासियों ने भी उस दिन रंग नहीं खेले।

तब से डेढ़ शताब्दी से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उस ऐतिहासिक दिन की स्मृति में झांसी में होली न मनाने की परंपरा आज भी भावनात्मक रूप से याद की जाती है।

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1926: लाहौर की होली और छह बब्बर अकालियों की शहादत

Holi and Freedom Struggle का एक और करुण अध्याय 27 फरवरी 1926 को सामने आया, जब लाहौर सेंट्रल जेल में छह बब्बर अकाली आंदोलनकारियों को फांसी दे दी गई।

इन शहीदों के नाम थे—किशन सिंह गड़गज्ज, संता सिंह, दिलीप सिंह, नंद सिंह, करम सिंह और धरम सिंह।

उस समय Bhagat Singh कानपुर में रहकर गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र Pratap में कार्य कर रहे थे। उन्होंने ‘एक पंजाबी युवक’ नाम से लेख लिखकर इस बात पर गहरा रोष व्यक्त किया कि लाहौर शोक में डूबने के बजाय होली मना रहा था।

यह घटना Holi and Freedom Struggle के इतिहास में संवेदनशील और प्रेरक प्रसंग के रूप में दर्ज है।

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1942 कानपुर: तिरंगे की रक्षा में 45 क्रांतिकारी गिरफ्तार

1942 में कानपुर के हटिया बाजार स्थित रज्जन बाबू पार्क में होली के दिन क्रांतिकारी तिरंगा फहराकर होली खेल रहे थे। तभी अंग्रेजों के घुड़सवार सिपाही पहुंचे और तिरंगा उतारने लगे।

दोनों पक्षों में भीषण संघर्ष हुआ और अंततः 45 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

जैसे ही यह खबर फैली, पूरा कानपुर सड़कों पर उतर आया। छह दिन तक जनाक्रोश जारी रहा और सातवें दिन अंग्रेज प्रशासन को उन्हें रिहा करना पड़ा।

रिहाई के बाद उसी पार्क में जुलूस के साथ होली मनाई गई। तभी से कानपुर में सात दिन तक होली मनाने की परंपरा शुरू हुई।

सामाजिक सुधार और शिक्षा का पर्व बनी होली

Holi and Freedom Struggle के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों ने इस पर्व को सामाजिक सुधार और जागरण का माध्यम बनाया।

होली से महीनों पहले गाजे-बाजे के साथ फगुए गाए जाते, जिनमें स्वतंत्रता और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने का संदेश होता। धुलेंडी के दिन महिलाएं और बच्चे खादी पहनकर सुराजी गीत गाते थे।

जेलों में बंद स्वतंत्रता सेनानी भी कभी अनुमति लेकर, तो कभी अवज्ञा कर होली खेलते थे। उनकी होली का मुख्य संदेश सद्भाव, एकता और जागरूकता होता था।

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