Hollywood Narrative: 7 चौंकाने वाले तथ्य,कैसे हॉलीवुड और अमेरिकी मीडिया युद्धों को हीरोइज़्म में बदल देते हैं

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हॉलीवुड फिल्मों के ज़रिये गढ़ा गया युद्ध नैरेटिव
Highlights
  • • हॉलीवुड कैसे युद्धों को हीरोइज़्म में बदलता है • अमेरिकी मीडिया और नैरेटिव मशीनरी • इराक और वियतनाम युद्ध के उदाहरण • बॉलीवुड की सीमाएं और धुरंधर का प्रभाव • भारत के लिए नैरेटिव की नई शुरुआत

दुनिया की राजनीति में सिर्फ हथियार और सेनाएं ही ताकत नहीं होतीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा ताकत होती है नैरेटिव की। ताज़ा घटनाक्रम में जिस तरह वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मडुरो की गिरफ्तारी और उन्हें न्यूयॉर्क लाए जाने की बात सामने आई, उसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि वैश्विक शक्तियां अपने हर कदम को सही ठहराने के लिए किस तरह नैरेटिव गढ़ती हैं। यह कोई साधारण सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी घटनाओं में गिनी जा सकती है। और ऐसे हर मौके पर अमेरिका खुद को एक ‘रैंबो राष्ट्र’ के रूप में पेश करने से नहीं चूकता।

Hollywood Narrative और युद्धों का ग्लैमर

हॉलीवुड दशकों से अमेरिकी सत्ता का सबसे प्रभावशाली हथियार रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर आज तक, उसने हर उस लड़ाई को ग्लैमरस बना दिया जिसमें अमेरिका शामिल रहा। वियतनाम युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सोलह वर्षों तक चले इस युद्ध में असंख्य निर्दोष लोग मारे गए, आधुनिक हथियारों का खुला इस्तेमाल हुआ, लेकिन हॉलीवुड ने इसे ऐसे पेश किया मानो अमेरिकी सैनिक क्रूरता के शिकार हों और वियतनामी छापामार अमानवीय हों।

युद्ध की भयावह सच्चाई को छुपाकर, फिल्मों के ज़रिये एक ऐसा भावनात्मक परसेप्शन बनाया गया जिसने अमेरिकी जनता और दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि अमेरिका जो कर रहा है, वह सही है।

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American War Propaganda में मीडिया की भूमिका

सिर्फ फिल्में ही नहीं, बल्कि मीडिया भी इस नैरेटिव मशीनरी का अहम हिस्सा है। इराक युद्ध के दौरान सीएनएन जैसे चैनलों के संवाददाता अमेरिकी सैनिकों के साथ युद्धभूमि में गए। हजारों रिपोर्ट्स ऐसी थीं जिनमें आक्रांता को ही रक्षक के रूप में दिखाया गया। सद्दाम हुसैन को खलनायक बनाकर पेश किया गया और अमेरिका को लोकतंत्र का मसीहा।

बाद में जब यह साफ़ हुआ कि इराक में महाविनाश के हथियार थे ही नहीं, तब वही मीडिया संस्थान खामोश हो गए। न माफी, न आत्ममंथन। यही नैरेटिव की असली ताकत होती है—जो सच से ज़्यादा प्रभावशाली होती है।

Narrative Power: हॉलीवुड, मीडिया और वैश्विक धारणा

टाइम मैगज़ीन, न्यूज़वीक, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे संस्थान भी इसी प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। ये अपने देश की गलतियों को ‘आवश्यक बुराई’ बताकर पेश करते हैं और दूसरे देशों के नेताओं को तानाशाह या खतरे के रूप में दिखाते हैं। इससे वैश्विक जनमत अमेरिका के पक्ष में स्वतः झुक जाता है।

Bollywood और Narrative Failure

भारत के पास भी दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है, लेकिन अब तक वह किसी ठोस वैश्विक नैरेटिव को गढ़ने में असफल रहा है। भारत-पाक या भारत-चीन युद्धों पर बनी फिल्में—जैसे बॉर्डर या लक्ष्य—ने सैनिकों की वीरता तो दिखाई, लेकिन वे कोई दीर्घकालिक राजनीतिक या रणनीतिक संदेश नहीं दे पाईं।

Dhurandhar Film Narrative: एक अपवाद

इसी पृष्ठभूमि में फिल्म धुरंधर एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इस फिल्म ने सीधे हमला करने के बजाय पाकिस्तान के कराची शहर की अराजकता, आतंक और अव्यवस्था को दिखाया। कहानी, अभिनय और कंटेंट इतना सशक्त रहा कि एक स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया—पाकिस्तान खुद जल रहा है और भारत को भी जलाने की कोशिश कर रहा है।

फिल्म की शुरुआत इंडियन एयरलाइंस विमान अपहरण से होती है, जो सरकार और खुफिया एजेंसियों की विफलताओं को भी उजागर करती है। मुंबई हमलों की वॉयस रिकॉर्डिंग का प्रयोग भारतीय सिनेमा में पहली बार हुआ और इसने फिल्म को असाधारण ताकत दी।

Narrative Strategy: विक्रम सूद की दृष्टि

रॉ के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद अपनी किताब The Ultimate Goal में बताते हैं कि कैसे बड़े देश फिल्मों, मीडिया, साहित्य और इतिहास के ज़रिये नैरेटिव गढ़ते हैं। नैरेटिव सच होना ज़रूरी नहीं होता, बल्कि वह एक रणनीतिक परसेप्शन होता है—जो किसी कार्रवाई को जायज़ ठहराने के लिए रचा जाता है।

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सोशल मीडिया और नई Narrative लड़ाई

पहले यह काम टीवी चैनल करते थे, जहां बीबीसी जैसे संस्थान नैरेटिव निर्माण में माहिर थे। अब सोशल मीडिया इस युद्ध का नया मैदान है। अमेरिका और यूरोप इसमें आगे हैं, जबकि भारत अब जाकर इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

निष्कर्ष: नैरेटिव ही असली शक्ति है

धुरंधर की अपार सफलता यह साबित करती है कि अगर आवाज़ दमदार हो, तो वह दूर तक सुनी जाती है। खाड़ी देशों में प्रतिबंध के बावजूद इस फिल्म ने विदेशी बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़े। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारत की ओर से नैरेटिव युद्ध में एक ठोस शुरुआत है। अब इसके दूसरे पार्ट से उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं।

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