India Internal Crisis: 9 निर्णायक संकेत, जब भारत सभ्यतागत संक्रमण के सबसे कठिन दौर में खड़ा है

India Internal Crisis

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ट्रंप के दबाव के बीच भारत की रणनीतिक चुप्पी
Highlights
  • • भारत के आंतरिक तनावों का विश्लेषण • पहचान, इतिहास और राजनीति का टकराव • युवाओं और मीडिया की भूमिका • भविष्य की संभावित दिशा

India Internal Crisis और सभ्यतागत संक्रमण का दौर

भारत आज जिस आंतरिक दौर से गुजर रहा है, उसे केवल “राजनीतिक ध्रुवीकरण”, “सामाजिक अशांति” या “वैचारिक टकराव” जैसे शब्दों में सीमित करना एक सरलीकरण होगा। वस्तुतः यह एक सभ्यतागत संक्रमण का समय है, जहाँ अतीत की स्मृतियाँ, वर्तमान की चुनौतियाँ और भविष्य की आकांक्षाएँ एक-दूसरे से टकरा रही हैं। यही टकराव सड़कों पर, संसद में, सोशल मीडिया पर और आम परिवारों की बातचीत में दिखाई देता है।

भारत इस समय एक साथ कई युगों में जी रहा समाज है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।

India Internal Crisis में कई भारतों की एक साथ मौजूदगी

आज का भारत एकरूप नहीं है।
एक भारत ध्रुवीकरण के ज़रिये राजनीतिक समाधान खोज रहा है।
दूसरा भारत स्टार्टअप, स्पेस मिशन और डिजिटल भुगतान की दुनिया में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
तीसरा भारत कृषि संकट, बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता से जूझ रहा है।

एक भारत अपनी सभ्यता पर गर्व की पुनर्खोज कर रहा है, जबकि दूसरा भारत अपने ही अतीत से असहज महसूस कर रहा है। यही असमान यथार्थ India Internal Crisis का पहला और मूल कारण बनता है।

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India Internal Crisis और पहचान की राजनीति का उभार

आज भारत में पहचान को लेकर तीखी बहस दिखाई देती है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और लिंग पर आधारित विमर्श टकराव की दिशा में बढ़ता नज़र आता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या पहचान की राजनीति स्वयं समस्या है, या किसी गहरी बेचैनी का लक्षण?

लंबे समय तक सभ्यतागत पहचान को सार्वजनिक विमर्श से बाहर रखा गया। संस्कृति और परंपरा को निजी मामला घोषित किया गया। जब दशकों से दबी पहचानें अचानक सामने आती हैं, तो वे संतुलित नहीं, बल्कि आक्रामक रूप में उभरती हैं।

India Internal Crisis में इतिहास-बोध का संकट

जिस समाज को यह सिखाया जाए कि उसका अतीत केवल अंधविश्वास और शोषण से भरा था, उसके नायक मिथक थे और उसकी सामाजिक संरचना केवल उत्पीड़न थी—वह समाज या तो आत्म-ग्लानि में जीता है या फिर अतीत को राजनीतिक हथियार बना लेता है।

आज भारत में इतिहास को लेकर जो संघर्ष दिखता है, वह वास्तव में भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई है। India Internal Crisis का यह पहलू सबसे गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला है।

India Internal Crisis और राज्य बनाम समाज की खाई

भारत के भीतर एक और गंभीर चुनौती है—राज्य और समाज के बीच बढ़ता अविश्वास।
समाज को लगता है कि राज्य उसकी भावनाओं को नहीं समझता।
राज्य को लगता है कि समाज तर्क के बजाय भावना से संचालित हो रहा है।

इस टकराव में कानून को नैतिकता के विरुद्ध और नैतिकता को कानून के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाता है। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह स्थिति अत्यंत खतरनाक संकेत मानी जाती है।

India Internal Crisis में युवाओं की बेचैनी

भारत का युवा वर्ग सबसे अधिक आकांक्षी है और उतना ही असुरक्षित भी। शिक्षा का विस्तार हुआ है, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता नहीं। सूचना बढ़ी है, लेकिन दिशा की स्पष्टता नहीं।

युवा वर्ग तुरंत परिणाम चाहता है और संस्थागत प्रक्रियाओं से अधीर हो जाता है। यह ऊर्जा यदि सही दिशा न पाए, तो अस्थिरता में बदल सकती है। और यदि सही दिशा मिल जाए, तो यही ऊर्जा भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।

India Internal Crisis और मीडिया का बदला स्वरूप

एक समय था जब मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता था। आज वह अक्सर विवाद का उत्पादक बन गया है। जटिल मुद्दों को द्वंद्व में बदला जाता है, असहमति को देशद्रोह करार दिया जाता है और संवाद की जगह शोर ले लेता है।

सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को मंच दिया, लेकिन विवेक नहीं। परिणामस्वरूप समाज स्थायी उत्तेजना की स्थिति में पहुँच गया है।

India Internal Crisis, आर्थिक प्रगति और असमानता

भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन प्रश्न यह है कि यह वृद्धि किसके लिए है। कुछ वर्गों में समृद्धि तेज़ी से बढ़ी है, जबकि बड़ी आबादी अभी भी अनिश्चितता में जी रही है।

जब आर्थिक विकास सामाजिक न्याय से नहीं जुड़ता, तो असंतोष सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप लेकर सामने आता है। यही असंतोष भ्रम और दिशाहीनता के साथ खतरनाक स्वरूप ग्रहण करता है।

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India Internal Crisis: समाधान की दिशा

इस स्थिति का समाधान किसी एक नीति, एक दल या एक विचारधारा में नहीं है। समाधान है—
इतिहास को संतुलन से समझने में,
पहचान को गरिमा देने में, हथियार बनाने में नहीं,
असहमति को संवाद मानने में,
शक्ति के साथ संवेदना जोड़ने में।

भारत को मजबूत राज्य के साथ-साथ परिपक्व समाज भी चाहिए। India Internal Crisis दरअसल संकट से अधिक निर्णय का क्षण है।

भारत न टूट रहा है, न पूरी तरह स्थिर है। वह स्वयं को पुनः परिभाषित कर रहा है। इतिहास गवाह है—भारत जब भी अपने भीतर झांकता है, पहले बेचैन होता है और फिर स्वयं को नया रूप देता है। आज वही समय है।

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