Indian Democracy Debate: भारत में लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं, पूरी तरह खतरे में भी नहीं

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ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
Highlights
  • • लोकतंत्र पर अतिवादी दावों की सच्चाई • संस्थाओं और सत्ता के बदलते रिश्ते • न्याय में देरी का लोकतांत्रिक असर • कमजोर विपक्ष और नागरिक थकान • संघीय ढांचे पर बढ़ता दबाव

भारत में लोकतंत्र को लेकर आज दो अतिवादी दावे आम हो चुके हैं। एक तरफ यह कहा जा रहा है कि लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है, तो दूसरी ओर यह दावा लगातार तेज हो रहा है कि लोकतंत्र पूरी तरह खतरे में है। इन दोनों दावों के बीच खड़े नागरिक के सामने भ्रम की स्थिति स्वाभाविक है। सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र न तो ढह चुका है और न ही वैसा सशक्त बचा है जैसा संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी। वह नाटकीय तरीके से नहीं, बल्कि चुपचाप, योजनाबद्ध और संस्थाओं के भीतर रहते हुए बदला जा रहा है। यही कारण है कि सवाल लोकतंत्र के अस्तित्व का नहीं, उसके संतुलन और जवाबदेही का बनता जा रहा है।

Indian Democracy Debate: संविधान मौजूद है, पर संतुलन क्यों सवालों में है?

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यह सच है कि देश में चुनाव हो रहे हैं। सरकारें बन रही हैं। संसद सत्र बुलाए जा रहे हैं। अदालतें काम कर रही हैं। पहली नजर में सब कुछ सामान्य दिखता है। लेकिन लोकतंत्र केवल इन औपचारिक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं होता। लोकतंत्र का वास्तविक आधार संस्थाओं के बीच संतुलन, सत्ता पर नियंत्रण और असहमति की स्वीकृति पर टिका होता है।

आज चिंता इस बात की है कि संस्थाएं खत्म नहीं की जा रही हैं, बल्कि उन्हें सत्ता के अनुकूल ढाला जा रहा है। नियम वही हैं, कानून वही हैं, लेकिन उनका प्रयोग चयनात्मक होता जा रहा है। यही चयनात्मकता लोकतांत्रिक संतुलन को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है।

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Indian Democracy Debate: सत्ता और संस्थाओं का बदलता रिश्ता

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लोकतंत्र में संस्थाएं सत्ता को नियंत्रित करती हैं। लेकिन वर्तमान समय में यह रिश्ता उलटता हुआ दिखाई देता है। जांच एजेंसियां कानून के औजार से अधिक राजनीतिक उपकरण की तरह देखी जाने लगी हैं। संसद बहस का मंच कम और औपचारिक मुहर लगाने वाली संस्था अधिक बनती जा रही है।

यह स्थिति अचानक नहीं बनी। जिन लोगों ने लंबे समय तक सत्ता संभाली, उन्होंने भी संस्थाओं को अपने अनुकूल बनाए रखा था। फर्क इतना है कि तब यह प्रक्रिया सामान्य मानी जाती थी, और आज उसका प्रभाव व्यापक रूप में सामने आ रहा है। इसलिए जब सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल उठते हैं, तो असहजता स्वाभाविक है।

Indian Democracy Debate: न्याय में देरी और उसका राजनीतिक प्रभाव

न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे अहम स्तंभ मानी जाती है। लेकिन जब संवेदनशील मामलों में सुनवाई तो होती है, पर फैसले लगातार टलते रहते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं रह जाती। “तारीख पर तारीख” अब केवल फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि आम नागरिक की हकीकत बन चुका है।

लोकतंत्र में देरी तटस्थ नहीं होती। देरी भी एक राजनीतिक प्रभाव पैदा करती है। प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद जब परिणाम अधूरे रहते हैं, तो न्याय पर भरोसा कमजोर होता है और यही कमजोरी लोकतांत्रिक ढांचे को अंदर से खोखला करती है।

Indian Democracy Debate: कमजोर विपक्ष, मजबूत सत्ता

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अक्सर कहा जाता है कि मजबूत विपक्ष मजबूत लोकतंत्र की पहचान होता है। लेकिन भारत में विपक्षी राजनीति आज गंभीर संकट से गुजर रही है। सर्वदेशीय दावे करने वाले दल क्षेत्रीय सीमाओं में सिमटते जा रहे हैं। विरोध तो दिखाई देता है, लेकिन स्पष्ट वैचारिक विकल्प और दीर्घकालिक रणनीति का अभाव साफ नजर आता है।

दिशाहीन विपक्ष सत्ता को चुनौती देने के बजाय उसे वैधता देता है। इसका सीधा असर नागरिकों पर पड़ता है। जब विकल्प कमजोर होते हैं, तो नागरिक भी धीरे-धीरे थकान महसूस करने लगता है। यही थकान लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।

Indian Democracy Debate: असहमति से थकान तक का सफर

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जब असहमति को अव्यवस्था कहा जाने लगे, बहस को विकास में बाधा बताया जाने लगे, तब नागरिक का सवाल पूछना भी संदिग्ध ठहराया जाने लगता है। थका हुआ नागरिक सत्ता के लिए सबसे सुरक्षित नागरिक होता है।

लोकतंत्र तब नहीं मरता जब संविधान बदला जाता है। वह तब कमजोर पड़ता है जब नागरिक सवाल पूछना छोड़ देते हैं। यही चुप्पी लोकतंत्र की सबसे खतरनाक अवस्था होती है।

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Indian Democracy Debate: संघीय ढांचे पर बढ़ता दबाव

भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसका संघीय ढांचा है। लेकिन राज्यों की स्वायत्तता सिमटती हुई दिखाई दे रही है। वित्तीय केंद्रीकरण, राज्यपालों की भूमिका और केंद्रीय एजेंसियों का बढ़ता हस्तक्षेप संघीय संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

यह संकेत लोकतंत्र के अंत का नहीं, बल्कि उसके स्वरूप के बदलने का है। भाषा बदली जा रही है, प्रक्रियाएं वही हैं, लेकिन शक्ति का केंद्र लगातार संकुचित हो रहा है।

असली सवाल क्या है?

भारतीय लोकतंत्र समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि वह पूरी तरह स्वस्थ अवस्था में नहीं है। असली सवाल यह नहीं है कि लोकतंत्र रहेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या वह जवाबदेह रहेगा, संतुलित रहेगा और नागरिकों की आवाज को जगह देता रहेगा?

लोकतंत्र का भविष्य संस्थाओं से अधिक नागरिकों की जागरूकता पर निर्भर करता है। सवाल पूछते रहना ही लोकतंत्र की सबसे मजबूत सुरक्षा है।

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