देश की राजनीति में महंगाई और रोजगार का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। संसद से लेकर सड़कों तक इस सवाल पर सियासी घमासान तेज होता दिख रहा है। विपक्ष जहां लगातार कीमतों में वृद्धि और युवाओं में रोजगार संकट को लेकर सरकार पर हमलावर है, वहीं सरकार आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर स्थिति को नियंत्रण में बता रही है। यही अंतर—सरकारी दावों और जमीनी अनुभवों के बीच—आज की बहस का सबसे बड़ा आधार बन गया है।
- Inflation And Unemployment Issue India : खाद्य महंगाई ने तोड़ा आमजन का बजट
- Inflation And Unemployment Issue India : रोजगार संकट पर संसद में घमासान
- Inflation And Unemployment Issue India : राहत योजनाएं बनाम स्थायी समाधान
- Inflation And Unemployment Issue India : न्यायिक विमर्श से बढ़ी सियासी गर्मी
- Inflation And Unemployment Issue India : चुनावी मौसम में बढ़ेगा असर
Inflation And Unemployment Issue India : खाद्य महंगाई ने तोड़ा आमजन का बजट
हाल के महीनों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। सब्जियां, दालें, खाद्य तेल और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुएं महंगी हुई हैं, जिसका सीधा असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के घरेलू बजट पर पड़ा है। रसोई का खर्च बढ़ने से परिवारों की बचत क्षमता घट रही है।
वित्त मंत्रालय ने कीमतों में वृद्धि को मौसमी कारणों, आपूर्ति व्यवधानों और परिवहन लागत में वृद्धि से जोड़ा है। सरकार का कहना है कि निर्यात-आयात नीति में बदलाव, बफर स्टॉक जारी करने और सप्लाई चेन मजबूत करने जैसे कदमों से दबाव कम किया जा रहा है।
लेकिन विपक्ष इस तर्क से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि “अस्थायी दबाव” पिछले कई महीनों से जारी है, जिससे आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर हुई है। विपक्षी दलों का आरोप है कि महंगाई केवल आंकड़ों में सीमित दिखाई जा रही है, जबकि बाजार में इसका असर कहीं ज्यादा गहरा है।
Inflation And Unemployment Issue India : रोजगार संकट पर संसद में घमासान
महंगाई के साथ-साथ बेरोजगारी का मुद्दा भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। संसद के भीतर विपक्षी दलों ने युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता को लेकर सरकार को घेरा।
सरकार का पक्ष है कि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। ईपीएफओ पंजीकरण में वृद्धि, स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को रोजगार सृजन के संकेत के रूप में पेश किया जा रहा है।
हालांकि आलोचकों का तर्क है कि असंगठित क्षेत्र में रोजगार की गुणवत्ता, आय स्तर और स्थायित्व को लेकर पर्याप्त पारदर्शी डेटा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा। उनका कहना है कि रोजगार के अवसर तो बन रहे हैं, लेकिन स्थायी और सम्मानजनक आय वाले अवसर सीमित हैं।
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Inflation And Unemployment Issue India : ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दोहरा दबाव
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई का प्रभाव केवल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक आय पर भी दबाव बना रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी वृद्धि की रफ्तार धीमी बताई जा रही है, जिससे मांग में सुस्ती आई है।
उपभोग आधारित उद्योगों—जैसे एफएमसीजी, दोपहिया वाहन और सस्ते उपभोक्ता उत्पाद—की वृद्धि दर कई राज्यों में अपेक्षा से कम दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार जब तक ग्रामीण आय में ठोस सुधार नहीं होगा, तब तक मांग आधारित आर्थिक वृद्धि पर असर बना रहेगा।
Inflation And Unemployment Issue India : राहत योजनाएं बनाम स्थायी समाधान

सरकार ने राहत उपायों के तौर पर कई कदम गिनाए हैं, जिनमें मुफ्त अनाज योजना का विस्तार, एलपीजी सब्सिडी, और आवश्यक वस्तुओं पर आयात शुल्क में संशोधन शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इन कदमों से कमजोर वर्गों को सीधी राहत मिल रही है।
विपक्ष का आरोप है कि ये कदम केवल तात्कालिक राहत हैं, दीर्घकालिक समाधान नहीं। उनका कहना है कि रोजगार सृजन के लिए विनिर्माण, एमएसएमई और श्रम-प्रधान उद्योगों में बड़े निवेश की जरूरत है, जिस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।
Inflation And Unemployment Issue India : न्यायिक विमर्श से बढ़ी सियासी गर्मी

आर्थिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ी कुछ याचिकाएं शीर्ष न्यायालय में लंबित हैं। यद्यपि इनका सीधा संबंध महंगाई या बेरोजगारी से नहीं है, फिर भी व्यापक आर्थिक नीति और सरकारी जवाबदेही पर सवालों ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि न्यायिक विमर्श का परोक्ष असर राजनीतिक नैरेटिव पर पड़ता है, खासकर तब जब आर्थिक मुद्दे चुनावी विमर्श का हिस्सा बन रहे हों।
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Inflation And Unemployment Issue India : चुनावी मौसम में बढ़ेगा असर

कई राज्यों में चुनावी गतिविधियां तेज होने के साथ ही महंगाई और रोजगार का मुद्दा और अहम हो गया है। मतदाता व्यवहार पर इन दोनों का सीधा प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक दल जमीनी मुद्दों को केंद्र में लाकर चुनावी रणनीति बना रहे हैं।
सरकार वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था की तेज़ वृद्धि दर को अपनी उपलब्धि बता रही है। वहीं विपक्ष इसे “आंकड़ों की वृद्धि बनाम आम आदमी की वास्तविकता” की बहस कह रहा है।
फिलहाल तस्वीर दो हिस्सों में बंटी दिख रही है—एक तरफ सरकारी दावों में स्थिरता और नियंत्रण का भरोसा है, तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर राहत की मांग तेज़ होती जा रही है। महंगाई और रोजगार का सवाल केवल आर्थिक बहस नहीं रहा; यह राजनीतिक समीकरणों को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। आने वाले हफ्तों में संसद और सियासत—दोनों जगह इस मुद्दे पर और तीखी टकराहट देखने को मिल सकती है।
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