मकर संक्रांति से ठीक पहले बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्माती दिख रही है। लालू परिवार के इर्द-गिर्द बढ़ती हलचल, बंद कमरों की मुलाकातें और परंपरागत दही-चूड़ा भोज को लेकर चर्चाएं तेज हैं। यह मुलाकात केवल पारिवारिक दायरे तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे गहरे राजनीतिक संकेत देखे जा रहे हैं। बिहार की राजनीति में रिश्ते, रस्में और रणनीति अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, और यही वजह है कि यह घटनाक्रम राजनीतिक गलियारों में खास चर्चा का विषय बना हुआ है।
- Lalu Pariwaar Makar Sankranti : लालू आवास पहुंचने के सियासी मायने
- Lalu Pariwaar Makar Sankranti : सोशल मीडिया पोस्ट ने बढ़ाई हलचल
- Lalu Pariwaar Makar Sankranti : कोर्ट से घर तक, रिश्तों का बदलता समीकरण
- Lalu Pariwaar Makar Sankranti : दही-चूड़ा भोज: परंपरा या राजनीतिक मंच?
- Lalu Pariwaar Makar Sankranti : एनडीए की ओर बढ़ते कदम या दबाव की राजनीति?
Lalu Pariwaar Makar Sankranti : लालू आवास पहुंचने के सियासी मायने
Tej pratap Yadav और लालू परिवार की मुलाकात से निकले संकेत
लालू आवास पर पहुंचते ही सबसे पहले परिवार के मुखिया से मुलाकात हुई। आदर और अपनत्व के साथ मकर संक्रांति के दिन आयोजित दही-चूड़ा भोज में शामिल होने का आग्रह किया गया। इसके बाद माता से आशीर्वाद लिया गया, जो पारिवारिक परंपरा के साथ-साथ भावनात्मक संदेश भी देता है।
सबसे अहम पल वह रहा, जब छोटे भाई और नेता प्रतिपक्ष से मुलाकात कर उन्हें भी न्योता सौंपा गया। बिहार की राजनीति में यह कदम बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से रिश्तों में खटास की चर्चाएं लगातार सामने आ रही थीं। ऐसे में एक ही छत के नीचे यह आमंत्रण राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
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Lalu Pariwaar Makar Sankranti : सोशल मीडिया पोस्ट ने बढ़ाई हलचल
Tej pratap Yadav के X पोस्ट से मिला नरमी का संकेत

सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरों ने सियासी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। पिता, माता और भाई से मुलाकात की तस्वीरों के साथ लिखा गया संदेश भावनात्मक भी था और रणनीतिक भी। भतीजी को गोद में खिलाने की तस्वीर ने सख्त राजनीतिक माहौल के बीच मानवीय और पारिवारिक पहलू को उजागर किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पोस्ट सिर्फ निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह दिखाने की कोशिश भी है कि रिश्तों में पूरी तरह दरार नहीं आई है। बिहार की राजनीति में ऐसे दृश्य अक्सर बड़े सियासी घटनाक्रम से पहले दिखाई देते हैं।
Lalu Pariwaar Makar Sankranti : कोर्ट से घर तक, रिश्तों का बदलता समीकरण
Tej pratap Yadav और भाई के बीच दूरी और नजदीकी
कुछ दिन पहले दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में दोनों भाइयों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया था कि रिश्तों में दूरी बनी हुई है। सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे से दूरी ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की अटकलों को और हवा दी।
करीब सात महीने बाद पारिवारिक माहौल में यह मुलाकात इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि बिहार की राजनीति में परिवार और पार्टी अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। ऐसे में इस नजदीकी को आने वाले समय में सियासी समीकरणों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
Lalu Pariwaar Makar Sankranti : दही-चूड़ा भोज: परंपरा या राजनीतिक मंच?
Tej pratap Yadav के भोज से जुड़ी रणनीति
मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा भोज बिहार की पुरानी परंपरा है, लेकिन राजनीति में यह परंपरा शक्ति प्रदर्शन और संदेश देने का मंच भी बन जाती है। इस बार का भोज इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि इसमें सिर्फ पारिवारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मेहमानों की मौजूदगी पर भी सबकी नजर है।
हाल ही में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के यहां हुए दही-चूड़ा भोज में शिरकत और वहां दिए गए बयान ने अटकलों को और तेज कर दिया है। “वक़्त आने पर सब साफ़ हो जाएगा” जैसे शब्दों को सियासी संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
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Lalu Pariwaar Makar Sankranti : एनडीए की ओर बढ़ते कदम या दबाव की राजनीति?
Tej pratap Yadav को लेकर NDA की रणनीति
पिछले कुछ समय से एनडीए के नेताओं द्वारा ऑफर दिए जाने की चर्चाएं सामने आती रही हैं। हालांकि किसी भी तरह का स्पष्ट ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन लगातार मिल रहे संकेत यह जरूर बताते हैं कि राजनीतिक विकल्प खुले रखे गए हैं।
मकर संक्रांति से पहले आयोजित होने वाला यह दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक फैसलों का ट्रेलर माना जा रहा है। इसमें शामिल होने वाले चेहरे और वहां से निकलने वाले संदेश बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
बिहार की राजनीति में हर मुलाकात, हर तस्वीर और हर परंपरा अपने भीतर एक संदेश छुपाए रहती है। लालू आवास की यह दस्तक और दही-चूड़ा भोज का न्योता आने वाले दिनों में बड़े सियासी बदलावों की आहट दे रहा है। मकर संक्रांति के बाद बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
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