Mahatma Gandhi Death Anniversary आज़ाद भारत की सबसे काली मेहमाननवाज़ी

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महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर शहीद दिवस
Highlights
  • • गांधी ने कहा था, 'हो सकता है मेरा मर जाना मनुष्यता के लिए अधिक मूल्यवान हो • गांधी को अपने अंत का आभास था • गांधी विचार सत्ता के लिए असुविधा थे, बाधा थे • गांधी पूछने लग थे- यह आज़ादी किसके लिए है? • गांधी नहीं मरे बल्कि भारत की नैतिक अंतरात्मा मरी

(30 जनवरी महात्मा गांधी शहादत दिवस पर विशेष)

लेखक-नीरज कृष्ण (वरिष्ठ स्तंभकार)

Mahatma Gandhi Death Anniversary 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाने का उद्देश्य केवल महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उन सभी वीरों को याद करना है, जिन्होंने देश की आज़ादी, एकता और अखंडता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए देश को स्वतंत्रता दिलाई। उनकी हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि मानवीय मूल्यों पर हमला थी। इसी कारण यह दिन राष्ट्रीय शोक और स्मरण का दिन बना। यह लेख में महात्मा गांधी शहादत दिवस पर उनके देहवासान के बाद देश कहां खड़ा है उसका विश्लेषण है।

Mahatma Gandhi Death Anniversary गांधी ने कहा था, ‘हो सकता है मेरा मर जाना मनुष्यता के लिए अधिक मूल्यवान हो

30 जनवरी 1948 का वह समय केवल इतिहास की तारीख़ नहीं, बल्कि एक असाधारण चेतना का अंतिम उजाला था। दिल्ली को हिंसा से बचाने के लिए 13 से 18 जनवरी तक अपने अंतिम आमरण अनशन के बाद महात्मा गांधी शारीरिक रूप से थके हुए थे, लेकिन नैतिक रूप से पहले से कहीं अधिक स्थिर और दृढ़। 27 जनवरी को बिड़ला हाउस में अमेरिकी पत्रकार विन्सेंट शिएन से हुई उनकी मुलाक़ात साधारण साक्षात्कार नहीं थी—वह जैसे आने वाले अंत का शांत स्वीकार थी। उसी बातचीत में गांधी ने कहा था, ‘हो सकता है मेरा मर जाना मनुष्यता के लिए अधिक मूल्यवान हो।’ यह मृत्यु–कामना नहीं थी, बल्कि मानवता में अटूट विश्वास की घोषणा थी।

Mahatma Gandhi Death Anniversary: गांधी को अपने अंत का आभास था

गांधी को अपने अंत का आभास था, फिर भी उनके व्यक्तित्व पर न भय था, न चिंता, न बेचैनी। उन्होंने न मृत्यु से बचने का प्रयास किया, न सुरक्षा की दीवार खड़ी की। उनके लिए मृत्यु कोई दुर्घटना नहीं, साधना की अगली कड़ी थी—एक ऐसी साधना जिसमें अहिंसा केवल विचार नहीं, साँस बन जाती है। जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों सत्य की सेवा में समर्पित हो जाते हैं। गांधी को अपनी हत्या का पूर्वाभास था, लेकिन उस ज्ञान में न भय था, न विचलन—केवल स्वीकार था।

30जनवरी 1948 की शाम 5 बजकर 17 मिनट पर, जब वे प्रार्थना के लिए बढ़ रहे थे, तब हत्यारा और महात्मा आमने–सामने थे; दोनों प्रणति की मुद्रा में। एक के हाथ में घृणा थी, दूसरे के भीतर केवल करुणा। गोली चली, देह गिरी, पर आत्मा अडिग रही। गांधी ने न चीख लगाई, न प्रतिकार किया। उनके होंठों पर अंतिम शब्द थे—’हे राम।’ यह मृत्यु नहीं थी, यह सत्य की अंतिम विजय थी -जहाँ हिंसा हार गई और अहिंसा अमर हो गई।

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Mahatma Gandhi Death Anniversary : एक ऐसा देश, जिसने सत्ता तो पा ली, पर विवेक खो दिया

गांधी की त्रासदी केवल यह नहीं है कि उन्हें गोली मार दी गई। उससे कहीं बड़ी, कहीं गहरी और कहीं ज़्यादा शर्मनाक त्रासदी यह है कि जिस हिंदुस्तान को उन्होंने बत्तीस वर्षों तक अपने शरीर, अपने सत्य और अपने उपवास से बचाया—उसी आज़ाद देश में वे केवल पाँच महीने, सिर्फ़ 169 दिन, जीवित रह सके! यह संख्या किसी कैलेंडर का आँकड़ा नहीं, बल्कि आज़ाद भारत के नैतिक दिवालियापन का प्रमाण है। जिस देश को गांधी ने आज़ाद कराया, उसमें वे मेहमान बनकर रह गए। और यह मेहमाननवाज़ी नहीं थी—यह हमारी ऐतिहासिक शर्म थी। एक ऐसा देश, जिसने सत्ता तो पा ली, पर विवेक खो दिया। जिसने तिरंगा तो थाम लिया, पर सत्य छोड़ दिया। जिसने गांधी के बिना ही भारत बनाना स्वीकार कर लिया।गांधी ने जिस देश को बचाया, उसी देश ने उन्हें शर्मिंदा किया—यह कोई सामान्य आरोप नहीं, बल्कि इतिहास का नंगा सच है। यह वह क्षण था, जब आज़ादी का उत्सव और नैतिकता का शोक एक साथ मनाया गया। 15 अगस्त 1947 को जब सत्ता हस्तांतरित हुई, तब गांधी सत्ता के केंद्र में नहीं थे। वे किसी मंत्रालय में नहीं, किसी मंच पर नहीं, किसी जुलूस में नहीं थे। वे दंगों की आग में खड़े थे—कलकत्ता, नोआखाली, दिल्ली की गलियों में। जहाँ सत्ता खुशियाँ बाँट रही थी, वहाँ गांधी इंसानियत बचाने में लगे थे। यह विरोधाभास ही बताता है कि गांधी और आज़ाद भारत की प्राथमिकताएँ एक नहीं थीं।

Mahatma Gandhi Death Anniversary : गांधी विचार सत्ता के लिए असुविधा थे, बाधा थे

आज का भारत अक्सर यह भूल जाता है कि गांधी आज़ादी के बाद असुविधाजनक हो गए थे। सत्ता को उनकी ज़रूरत नहीं थी। न उनके सवालों की, न उनके उपवासों की, न उनके नैतिक आग्रहों की। सत्ता को शांति चाहिए थी—लेकिन वह शांति नहीं, चुप्पी थी। गांधी उस चुप्पी को तोड़ते थे, इसलिए वे असहज थे।

गांधी के जाने से सत्ता निश्चिंत हो गई क्योंकि गांधी और सत्ता कभी एक भाषा नहीं बोलते थे। गांधी विचार सत्ता के लिए असुविधा थे, बाधा थे, आईना थे। सत्ता नियंत्रण चाहती है, गांधी विवेक। सत्ता आदेश चाहती है, गांधी प्रश्न। सत्ता स्थिरता चाहती है, गांधी नैतिक बेचैनी। यही कारण है कि आज़ादी के बाद सबसे बड़ी राहत सत्ता को मिली—गांधी से मुक्ति।

यह समझना ज़रूरी है कि गांधी की हत्या केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं थी; वह उस नैतिक दबाव का अंत थी, जो सत्ता की हर चाल पर सवाल खड़ा करता था। गांधी के रहते सत्ता निश्चिंत नहीं हो सकती थी क्योंकि गांधी पूछते थे कि क्या यह फैसला आख़िरी आदमी के पक्ष में है? क्या यह हिंसा को बढ़ा रहा है? क्या यह डर पर टिका है? सत्ता को ये सवाल नहीं चाहिए थे। उसे परिणाम चाहिए थे, आँकड़े चाहिए थे, भीड़ चाहिए थी। आज़ादी के बाद सत्ता ने राष्ट्र को अपने अनुसार परिभाषित करना शुरू किया। राष्ट्र अब नैतिक परियोजना नहीं, प्रशासनिक संरचना बन गया। गांधी इस रूपांतरण के सबसे बड़े विरोधी थे। वे कहते थे कि बिना नैतिकता के राष्ट्र केवल एक मशीन है जो कभी भी अपने नागरिकों को कुचल सकती है। सत्ता इस चेतावनी को सुनना नहीं चाहती थी।

Mahatma Gandhi Death Anniversary : पूछने लग थे- यह आज़ादी किसके लिए है?

गांधी धीरे-धीरे अप्रासंगिक घोषित किए गए। उनकी बातों को ‘आदर्शवादी’, ‘व्यावहारिक नहीं’, ‘बीते युग की’ कहकर किनारे किया गया। यह वही क्षण था जब सत्ता ने तय किया कि उसे गांधी नहीं चाहिए बल्कि उसे गांधी की तस्वीर चाहिए। तस्वीर सवाल नहीं करती, विचार करता है। गांधी का सबसे बड़ा अपराध यह था कि वे सत्ता के साथ नहीं, जनता के साथ खड़े थे और जनता भी नहीं, सबसे कमज़ोर के साथ। सत्ता के लिए यह असहनीय था क्योंकि सत्ता बराबरी से डरती है, करुणा से नहीं चल सकती, और सत्य से हमेशा असुरक्षित रहती है।

जिस कांग्रेस को गाँधी ने जन आंदोलन बनाया, आज़ादी के बाद वही कांग्रेस सत्ता–संरचना में बदल चुकी थी। गाँधी कांग्रेस के लिए तब तक उपयोगी थे, जब तक वे संघर्ष के नैतिक चेहरे थे। जैसे ही आज़ादी मिली, गाँधी सवाल बन गए। वे सत्ता के उत्सव में खलल डालने लगे। वे पूछने लगे—यह आज़ादी किसके लिए है? यह शासन आख़िरी आदमी तक पहुँचेगा या ऊपर ही ठहर जाएगा? यह राजनीति करुणा से चलेगी या डर से? कांग्रेस के लिए ये सवाल असुविधाजनक थे, क्योंकि अब उसे आंदोलन नहीं, शासन करना था। गांधी के जाने के बाद सत्ता को पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता मिली, बिना नैतिक पहरेदार के। यही आज़ाद भारत की सबसे काली मेहमाननवाज़ी थी। जिस व्यक्ति ने देश को बचाया, उसी को देश के लिए अनावश्यक बना दिया गया। यह केवल ऐतिहासिक अन्याय नहीं, बल्कि एक सतत राजनीतिक परंपरा की शुरुआत थी—जहाँ गांधी को सम्मान दिया गया, लेकिन सत्ता से बाहर रखा गया। सत्ता को गाँधी नहीं चाहिए होते—सत्ता को गाँधी की तस्वीर चाहिए होती है।

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Mahatma Gandhi Death Anniversary : गांधी नहीं मरे बल्कि भारत की नैतिक अंतरात्मा मरी

आज भी, जब सत्ता असहज होती है, तो गांधी फिर याद आते हैं -एक चेतावनी की तरह। क्योंकि गांधी विचार और सत्ता विचार आज भी एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं। और शायद यही टकराव गांधी को आज भी ज़िंदा रखता है। 169 दिन बाद जब 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या हुई, तब सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं मरा बल्कि भारत की नैतिक अंतरात्मा को गोली मारी गई। यह हत्या एक कट्टर व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की थी जो कहता था कि राष्ट्र नफ़रत से नहीं, संयम से बनता है; ताक़त से नहीं, सत्य से टिकता है।

गोली ने गांधी का शरीर छीना, लेकिन हमारी नासमझी ने उनके विचारों को भुला दिया। हमने उन्हें पूजा तो बहुत, पर उनके बताए रास्ते पर चले नहीं। उनका नाम याद रखा, पर उनकी बात नहीं मानी। सत्य हमें उपदेश लगा, अहिंसा हमें कमजोर लगी, और करुणा हमें बेकार लगी—इसलिए हम आगे बढ़ गए, बिना रुके, बिना सोचे। गांधी इसलिए नहीं हारे कि उन्हें मार दिया गया। गांधी इसलिए हारे क्योंकि हम खुद को बदलना नहीं चाहते थे। अगर हम उनकी बात समझ लेते, तो शायद हालात कुछ और होते। लेकिन हमने न समझकर गांधी को नहीं खोया—हमने अपना विवेक, अपनी संवेदना और अपने भीतर का इंसान खो दिया।

उपसंहार—

आज गांधी हर जगह हैं—चौराहों पर, नोटों पर, विश्वविद्यालयों के नामों में, सरकारी समारोहों में। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे हमारे व्यवहार में हैं? हमने उन्हें स्मृति में तो सुरक्षित कर लिया, पर जीवन से बाहर कर दिया। मूर्तियाँ बनाना आसान है, विचारों को जीना कठिन। शायद इसी कठिनाई से बचने के लिए हमने गांधी को पत्थर में बदल दिया। गांधी की हत्या से पहले वे अकेले थे। कांग्रेस सत्ता में थी, देश जश्न में था, और गांधी उपवास में। उनकी हत्या के बाद पूरा देश रोया। यह विडंबना बताती है कि हम अक्सर व्यक्ति के जाने के बाद उसके महत्व को समझते हैं। लेकिन क्या हमने उस समझ को व्यवहार में बदला?हर 30 जनवरी को हम दो मिनट का मौन रखते हैं। पर क्या बाकी 364 दिन हम उस मौन को तोड़ते हैं -सच बोलने के लिए, अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए ? अगर नहीं, तो वह मौन श्रद्धांजलि नहीं, औपचारिकता है।

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