मुझे ठंड दिखती है।
और मुझे मेरा हक भी दिखता है—
जो किताब में लिखा है,
पर जिंदगी में नहीं।
मैं बारह साल का हूं।
मां है—
“बच्चे को ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।”
पर ठंड में सोच अपने आप हो जाती है।
हम पुल के नीचे रहते हैं।
सरकार कहती है—
हर बच्चे को सुरक्षित आश्रय का अधिकार है।
मुझे नहीं पता “अधिकार” क्या होता है,
लेकिन मुझे पता है—
पुल के नीचे हवा बहुत तेज चलती है।
रात को मां साड़ी मेरे ऊपर डाल देती है।
खुद ठंड में कांपती रहती है।
मैं जानता हूं —
अगर मैं बच्चा न होता,
तो शायद मुझे भी “मज़दूर” कह दिया जाता।
कल काका मर गए।
वो भी कभी बच्चा रहे होंगे।

उनके भी कुछ हक़ रहे होंगे—
जो ठंड में कहीं गिर गए।
सुबह कुछ लोग आए।
काका को उठाकर ले गए।
एक अंकल बोले—
“ठंड से मर गया।”
मुझे समझ नहीं आया—
ठंड जेल क्यों नहीं जाती?
मां कहती है—
भारत ने बच्चों के अधिकारों पर दस्तखत किए हैं।
मुझे दस्तखत नहीं दिखते,
बस सिग्नल दिखता है
जहां मैं गुलाब बेचता हूँ।
लोग कहते हैं—
हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है।
मैं स्कूल गया था।
मास्टर जी अच्छे थे।
पर किताब से ज्यादा
मुझे मां की भूख याद आती थी।
जब पेट खाली हो,
तो किताब भारी हो जाती है।
अब मैं काम करता हूँ।
लोग कहते हैं—
बाल श्रम अपराध है।
पर जब मैं काम नहीं करूं,
तो अपराध कौन रोकता है—
भूख या ठंड ?
आज एक गाड़ी के अंदर
एक बच्चा बैठा था।
उसके हाथ में मोबाइल था।
मेरे हाथ में गुलाब।
हम दोनों बच्चे थे।
पर हमारे अधिकार अलग-अलग थे।
संविधान कहता है—
हर बच्चे को जीवन का अधिकार है।
मैं रोज देखता हूं —
जीवन कैसे धीरे-धीरे ठंडा होता है।
रात को अलाव जला।
लकड़ी कम थी।
आग कम थी।
हम ज़्यादा थे।
एक छोटा बच्चा रो रहा था।
मैंने अपनी जैकेट आधी उसे दे दी।
किसी ने ताली नहीं बजाई।
कोई एनजीओ नहीं आया।
मां ने कहा—
“बेटा, तू अच्छा इंसान बनेगा।”
मैं सोचता हूं —
अच्छा इंसान बनने से पहले
जिंदा रहना भी तो जरूरी है।
सरकार कहती है—
हर बच्चे को स्वास्थ्य का अधिकार है।
पिछली सर्दी मेरी खांसी ठीक नहीं हुई।
अस्पताल में लाइन लंबी थी।
दवा मुफ्त थी,
पर बिस्तर नहीं।
डॉक्टर ने कहा—
“ठंड में ध्यान रखना।”
मैंने सोचा—
काश ठंड भी किसी कानून से डरती।
सुबह अख़बार में लिखा था—
“शीतलहर से बच्चों पर खतरा।”
मैंने मां से पूछा—
“मां, हम बच्चे नहीं हैं क्या ?”
मां ने कुछ नहीं कहा।
मां तब चुप हो जाती है,
जब सच बोलना भारी हो।
मैंने सुना है—
बाल अधिकार संरक्षण आयोग होता है।
शायद वो हमारे पुल का रास्ता भूल गया है।
अगर मेरे पास एक अधिकार मांगने का मौका हो,
तो मैं खिलौना नहीं मांगूंगा,
मोबाइल नहीं मांगूंगा।
मैं सिर्फ यह मांगूंगा —
ठंड में मरने से बचने का अधिकार।
क्योंकि
जब कोई बच्चा ठंड से मरता है,
तो वो सिर्फ़ बच्चा नहीं मरता—
संविधान भी कांपता है,
समाज भी ठिठुरता है।
लेकिन फर्क बस इतना है—
बच्चे की ठंड
किसी को दिखती नहीं।
मुझे ठंड दिखती है।
और मुझे मेरा हक़ भी।
बस
मेरा हक
मुझ तक
अब तक
नहीं पहुंचा।

