NRI Voting Rights vs Illegal Voters: चुनावी मोड में दौड़ता भारत, लेकिन वोट के हक़ पर दोहरी लड़ाई क्यों?

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भारत में एनआरआई वोटिंग और अवैध मतदाताओं पर बहस
Highlights
  • • एनआरआई वोटिंग सिस्टम की सबसे बड़ी खामियां • मतदाता सूची से अवैध अप्रवासियों को हटाने की प्रक्रिया • लोकतंत्र में अधिकार और सुरक्षा का टकराव • भारत में चुनावी सुधारों की ज़रूरत

भारत एक ऐसा देश है जो लगभग हर समय चुनावी मोड में रहते हुए भी तेज़ विकास की उड़ान भर रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद, भारत की चुनावी व्यवस्था आज दो ऐसे मुद्दों से जूझ रही है जो सीधे लोकतंत्र की आत्मा को छूते हैं। एक तरफ़ लाखों अप्रवासी भारतीय (NRI) हैं, जो भारतीय नागरिक होने के बावजूद वोट डालने से वंचित हैं। दूसरी तरफ़ अवैध अप्रवासी या संदिग्ध विदेशी नागरिक हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए चुनाव आयोग विशेष सत्यापन अभियान चला रहा है।

ये दोनों घटनाक्रम अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन असल में ये भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े एक बड़े विरोधाभास को उजागर करते हैं—किसे वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए और किसे नहीं।

NRI Voting Rights vs Illegal Voters और एनआरआई की वोटिंग समस्या

भारत में एनआरआई, जिनके पास वैध भारतीय नागरिकता है, उनके लिए अब तक कोई व्यापक या दूरस्थ मतदान प्रणाली लागू नहीं की गई है। मौजूदा नियमों के तहत, विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिक तभी मतदान कर सकते हैं जब वे भारत आकर अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर वोट डालें। यूरोप, अमेरिका, खाड़ी देशों या अन्य हिस्सों में बसे करोड़ों भारतीयों के लिए यह व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।

हालांकि संसद की एक संसदीय समिति ने प्रॉक्सी वोटिंग और ई-बैलेट जैसी प्रणालियों का सुझाव दिया है, ताकि एनआरआई अपने निवास देश से ही मतदान कर सकें, लेकिन यह प्रस्ताव अब तक कागज़ों से आगे नहीं बढ़ सका है। नतीजा यह है कि देश की राजनीति और नीतियों में गहरी रुचि रखने वाले, टैक्स देने वाले और भारत को हर साल अरबों डॉलर का रेमिटेंस भेजने वाले नागरिक अपने ही लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रह जाते हैं।

यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान एनआरआई के नाम हटने का खतरा सामने आता है, खासकर उन एनआरआई के लिए जिनका जन्म विदेश में हुआ है। केरल जैसे राज्यों में अनुमान लगाया जा रहा है कि लगभग पाँच लाख एनआरआई अपने जन्म स्थान से जुड़े दस्तावेज़ों की कमी के कारण मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।

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NRI Voting Rights vs Illegal Voters और अवैध अप्रवासियों पर कार्रवाई

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इसी समय, चुनाव आयोग देश में अवैध अप्रवासियों को मतदाता सूची से हटाने के लिए विशेष सत्यापन अभियान चला रहा है। बिहार सहित कई राज्यों में चल रहे इस ड्राइव के दौरान नेपाली, बांग्लादेशी और म्यांमार जैसे देशों से आए संदिग्ध विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची में पाए गए, जिन्हें हटाया गया।

चुनाव आयोग का तर्क स्पष्ट है—सिर्फ़ भारतीय नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए। किसी भी विदेशी नागरिक का धोखाधड़ी से मतदाता सूची में शामिल होना लोकतंत्र की निष्पक्षता और विश्वसनीयता के लिए सीधा खतरा है। यह अभियान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को शुद्ध रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि यह कदम उन राजनीतिक दलों के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है, जिन पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने चुनावी लाभ के लिए अवैध अप्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल कराए। इसी वजह से यह सत्यापन अभियान केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बन गया है।

NRI Voting Rights vs Illegal Voters और लोकतंत्र का विरोधाभास

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एनआरआई की वोटिंग समस्या और अवैध अप्रवासियों को हटाने की प्रक्रिया—ये दोनों घटनाएं भारतीय लोकतंत्र की दो अलग-अलग परतों को उजागर करती हैं। पहली परत लोकतांत्रिक अधिकार की सीमित पहुंच को दिखाती है। एनआरआई भारत की अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक छवि में अहम योगदान देते हैं, लेकिन उन्हें मतदान के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं।

दूसरी परत लोकतंत्र की सुरक्षा से जुड़ी है। अवैध अप्रवासी अगर मतदाता सूची में शामिल रहते हैं, तो वे चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग का सत्यापन अभियान लोकतंत्र को सुरक्षित रखने की अनिवार्य प्रक्रिया बन जाता है।

यही विरोधाभास इस बहस को और तीखा बना देता है—एक तरफ़ वैध नागरिक वोट नहीं डाल पा रहे हैं, और दूसरी तरफ़ अवैध लोग मतदाता सूची में घुसपैठ करने की कोशिश करते रहे हैं।

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NRI Voting Rights vs Illegal Voters और आगे का रास्ता

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विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब वोटिंग प्रक्रिया में तकनीकी और कानूनी सुधारों की ओर गंभीरता से बढ़ना होगा। सुरक्षित ई-वोटिंग, प्रॉक्सी वोटिंग या नियंत्रित रिमोट वोटिंग सिस्टम जैसे विकल्पों पर ठोस निर्णय लेना समय की मांग है। दुनिया के कई लोकतंत्र यह साबित कर चुके हैं कि तकनीक के सहारे पारदर्शी और सुरक्षित मतदान संभव है।

वोट देना हर भारतीय नागरिक का मूल अधिकार है। यदि एनआरआई—जो देश को आर्थिक मजबूती देते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े रहते हैं—अपने मताधिकार से वंचित रहते हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़ा करता है। साथ ही, मतदाता सूची की सटीकता बनाए रखने के लिए अवैध अप्रवासियों को हटाना भी उतना ही जरूरी है।

NRI Voting Rights vs Illegal Voters और लोकतंत्र की असली परीक्षा

भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे बड़ा है, लेकिन यह अभी भी पूर्ण नहीं है। एक ओर एनआरआई वोट देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और दूसरी ओर अवैध मतदाताओं को हटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चल रहे हैं। यह स्थिति दिखाती है कि लोकतंत्र का विस्तार और उसकी सुरक्षा—दोनों को संतुलित करना आज भी भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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