One Man Dictatorship in 21st Century: कैसे लोकतंत्र व्यक्ति-पूजा में बदलता जा रहा है

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इक्कीसवीं सदी में दुनिया भर में लोकतंत्र एक व्यक्ति की सत्ता के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
Highlights
  • • आधुनिक तानाशाही कैसे लोकतंत्र के भीतर जन्म लेती है • संस्थाओं के कमजोर होने से व्यक्ति-पूजा का खतरा • रूस, चीन, अमेरिका और यूरोप से उदाहरण • जनता की निराशा और भय की राजनीति की भूमिका

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत को लोकतंत्र का स्वर्ण युग कहा गया था। तकनीक, इंटरनेट और वैश्वीकरण से यह उम्मीद जगी थी कि सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा और संस्थाएं पहले से अधिक मजबूत होंगी। लेकिन आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लोकतंत्र धीरे-धीरे एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। यह कोई एक चेहरा नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है — One Man Dictatorship in 21st Century।

आज की तानाशाही बंदूक और मार्शल लॉ के साथ नहीं आती। वह आती है राष्ट्रवाद के नारों, सुरक्षा के भय और इस दावे के साथ कि “मैं ही आख़िरी उम्मीद हूँ।” इसी क्षण लोकतंत्र की पहली हार होती है, जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है और आंख मूंदकर भरोसा करने लगती है।

One Man Dictatorship in 21st Century और चुनी हुई तानाशाही का खतरा

इतिहास में तानाशाह जनता के विरोध से डरते थे, लेकिन आज के तानाशाह जनता की तालियों से ताकत पाते हैं। सोशल मीडिया ने सत्ता को आईना दिखाने के बजाय उसे लोकप्रियता का मंच दे दिया है। जो असहमति जताता है, उसे देशद्रोही, विदेशी एजेंट या तथाकथित एलीट करार देकर खारिज कर दिया जाता है।

यही वजह है कि तानाशाही अब थोपी नहीं जाती, बल्कि चुनी जाती है। राजनीतिक विशेषज्ञ इसे “इलेक्टेड ऑटोक्रेसी” या “इललिबरल डेमोक्रेसी” कहते हैं, जहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन संस्थाएं धीरे-धीरे निष्प्रभावी कर दी जाती हैं।

One Man Dictatorship in 21st Century और संस्थाओं का खामोश पतन

हर एक-व्यक्ति की तानाशाही की शुरुआत संस्थाओं को कमजोर करने से होती है। अदालतों को “धीमा”, मीडिया को “पक्षपाती” और विश्वविद्यालयों को “अप्रासंगिक” बताया जाता है। इसके बाद कहा जाता है — “इन सबकी ज़रूरत नहीं, मैं ही पर्याप्त हूँ।”

जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, तो व्यक्ति देवता बन जाता है और देवताओं से सवाल नहीं पूछे जाते। यह लोकतंत्र की सबसे खामोश लेकिन सबसे खतरनाक हिंसा है।

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One Man Dictatorship in 21st Century के वैश्विक उदाहरण

हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन खुले तौर पर उदार लोकतंत्र को असफल बता चुके हैं। रूस में व्लादिमीर पुतिन ने मीडिया को नियंत्रित किया, विपक्ष को विदेशी एजेंट घोषित किया और संविधान बदलकर सत्ता को स्थायी बना लिया।चीन में शी जिनपिंग ने कार्यकाल सीमा हटाकर पार्टी और व्यक्ति के बीच का फर्क लगभग समाप्त कर दिया। वहीं अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश में डोनाल्ड ट्रंप का दौर दिखाता है कि लोकतंत्र भी भीतर से तानाशाही की ओर फिसल सकता है, जब व्यक्ति को संस्थाओं से ऊपर रख दिया जाए।

One Man Dictatorship in 21st Century के पीछे जनता की निराशा

तानाशाही अचानक नहीं उभरती। भ्रष्टाचार, धीमी न्याय प्रणाली, बढ़ती असमानता और आर्थिक असुरक्षा जनता को निराश करती है। लोग कहते हैं — “हमें आज़ादी नहीं, समाधान चाहिए।” इसी निराशा का फायदा तानाशाह उठाता है।

भय की राजनीति इसकी अगली कड़ी बनती है — आतंकवाद, शरणार्थी संकट और सांस्कृतिक असुरक्षा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। सोशल मीडिया संवाद नहीं, ध्रुवीकरण बढ़ाता है और नेता को मसीहा बना देता है।

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One Man Dictatorship in 21st Century और वैश्विक अस्थिरता

एक व्यक्ति की तानाशाही केवल किसी एक देश की समस्या नहीं होती। इससे युद्ध की आशंका बढ़ती है, मानवाधिकार कमजोर होते हैं और वैश्विक संस्थाएं अप्रासंगिक हो जाती हैं। यूक्रेन, गाजा और ताइवान जैसे संकट कहीं न कहीं व्यक्तिगत सत्ता के अहंकार से जुड़े हैं।

हर तानाशाही अपने चरम पर सबसे शक्तिशाली दिखती है, लेकिन वहीं से उसका पतन भी शुरू हो जाता है।

निष्कर्ष: असली लड़ाई सत्ता से नहीं, चेतना से है

इस संकट का समाधान किसी और “मज़बूत नेता” में नहीं है। समाधान है — मजबूत संस्थाएं, स्वतंत्र मीडिया, जागरूक नागरिक और असहमति का सम्मान। असली सवाल यह नहीं कि तानाशाह क्यों उभर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम नागरिक बने रहना चाहते हैं या भक्त?

क्योंकि जिस दिन नागरिक चुप हो जाते हैं, उसी दिन एक व्यक्ति इतिहास, राष्ट्र और भविष्य — सब पर कब्जा कर लेता है।

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